आस्था का केंद्र है प्रयाग का माघ मेला

माघ महीना। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश। सूर्य के मकर राशि में आने से ही बदल जाती है संक्रांति। इसी मकर संक्रांति से शुरू हो जाता है प्रयाग का माघ मेला। प्रयाग की पावन धरती पर शुरू हो जाता है साधु-संतों का जमावड़ा। सजधज जाता है अखाड़ों का पंडाल। श्रद्धालु जुटने लगते हैं मेले में। इस दौरान लोग एक माह तक करते हैं कल्पवास। प्रयाग एक ऐसा धर्म स्थल है, जहां माघ माह में सभी देवता निवास करते हैं। ऐसे तीर्थस्थल पर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए माघ महीने में कल्पवास करते हुए वेणुमाधव का स्मरण एवं आराधना में जुट जाता है। कल्पवास के दौरान मनुष्य संयम एवं साधना के माध्यम से मोह को छोड़ने का प्रयास करता है।

माघ माह में अधिकांश गृहस्थ ही कल्पवास करते हैं। वे साधु-संतों के संपर्क में रहते हैं और भजन, कीर्तन, हवन, यज्ञ में समय गुजारते हैं। वे बालू की रेत पर बिस्तर लगा कर सोते हैं। एक वक्त भोजन करते हैं। सुबह-शाम संगम में स्नान करते हैं। कल्पवास हमारी वेदकालीन संस्कृति है। एक माह व्यतीत होने के बाद कल्पवासी घर से लाए हुए खाद्य पदार्थों को वहीं छोड़ देता है और उसके बदले प्रसाद के रूप में ले जाते हैं गंगा जल और बालू। बावजूद इसके बदलते दौर के साथ कल्पवास में भी बदलाव आ गया है। कल्पवासी पहले फूस की झोपड़ियों में रहते थे अब वे खूबसूरत तंबुओं में रहने लगे। जमीन पर सोने की बजाए वे अब तख्तों पर सोते हैं। कहने का मतलब अब कल्पवास का स्वरूप बदलता जा रहा है, लेकिन आत्मा अभी भी नहीं बदली है। यह तप एवं त्याग का जरिया बना हुआ है।

माघ मेले में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। विदेशी पर्यटक या श्रद्धालुओं को संतों से संपर्क करने में आनंद आता है। वे नागा साधुओं के पास बैठकर यज्ञ पूजा करते हैं, उनसे आशीर्वाद लेते हैं। कुछ लोग तो उनके साथ गांजे की सुगंध भी लेने लगते हैं। पूरा मेला कई खंडों में बंटा होता है। विभिन्न नामों से सड़कें बनाई जाती हैं। मुख्य सड़क का नाम काली एवं लाल सड़क। इन सड़कों पर बड़े अखाड़ा वाले साधु संत निवास करते हैं।

अनेक सरकारों के पंडाल लगे होते हैं। अनेक प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है। हमेशा भजन, कीर्तन, प्रवचन की वाणी पूरे मेला क्षेत्र में गूंजती रहती है। राज्य प्रशासन द्वारा बेहतर सुविधा मुहैया कराने का प्रयास होता है। हर जगह स्वास्थ्य शिविर लगे होते हैं। खाद्य पदार्थों के लिए सरकारी दुकानें उपलब्ध होती हैं।

विशेषकर शाम के वक्त कल्पवासी एवं अन्य लोग संतों के प्रवचन का श्रवण करने के लिए निकल पड़ते हैं। हमेशा ज्ञान की गंगा बहती रहती है। सुरक्षा के बेहतर इंतजाम होते हैं। सुबह-शाम गंगा यमुना सरस्वती का पावन तट लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। सुबह संगम तट पर सूर्योदय के समय ऐसा लगता है जैसे सूर्य देव संगम में स्नान करने के लिए उतर आए हैं। इस दौरान नौकाओं में सुरक्षाकर्मी टहलते रहते हैं। पक्षियों का कलरव शोभा में चार चांद लगा देता है। शाम के वक्त गंगा आरती का दृश्य मन को मोह लेता है। यहीं किले के पास ही लेटे हुए हनुमान का मंदिर है। जहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इसी के आसपास ही होता है भूले-बिसरों का शिविर। यह शिविर 24 घंटे चलता रहता है। भटके हुए लोग यहां आकर शिविर को जानकारी देते हैं। शिविर उन्हें मिलाने के लिए शुरू कर देता है अपना काम। माघ मेले में शाम का नजारा अद्भुत होता है। शास्त्री पुल के ऊपर से देखने से ऐसा लगता है मानों स्वर्ग जमीं पर उतर आया हो। गंगा यमुना में बहते दिए और इसी के बीच तारों की छाया शोभनीय होती है। बिजली की दूधिया रोशनी से पूरा मेला जगमगाता रहता है।

माघ मेले में आए लोग महराज आश्रम, श्रृंगवेरपुर भी जाते हैं। प्रयाग में स्थापित मंदिरों के दर्शन करते हुए पूरा एक माह भगवान की भक्ति में लगा कर अपने मोक्ष की कामना करते हैं। मेला क्षेत्र की दिनचर्या ही अलग होती है। संतों-महात्माओं, विद्वानों से सत्संग में रहना ही मूल उद्देश्य होता है। बहरहाल प्रयाग के माघ मेले का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व है, जो इतिहास में स्वर्णाक्षरों मे अंकित है।

धार्मिक उत्सव का पर्व माघ मेला

सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही शुरू हो जाता है प्रयाग का माघ मेला। प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा जाता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही सभी देवता प्रयाग में निवास करने लगते हैं। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है -माघ मकर रवि गति जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई। इसी कारण माघ मेला हिंदुओं का श्रेष्ठ धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला है। हिंदू कलेंडर के अनुसार 14 या फिर 15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन से यह मेला शुरू हो जाता है। प्रयाग का यह मेला विश्व का सबसे बड़ा मानव मेला होता है। इस मेले में दुनिया भर से श्रद्धालु या पर्यटक आते हैं। मेला शुरू होते ही शुरू हो जाता है साधु-संतों का जमावड़ा। आम लोग पूरे एक माह कल्पवास करते हैं। कल्पवास करने का मतलब होता है सांसारिक जीनव से दूर रह कर भगवान का स्मरण करना तथा गंगा, यमुना एवं सरस्वती के पावन संगम में स्नान करके मोक्ष की कामना करना है। संगम में स्नान करना इनका मुख्य उद्देश्य होता है। यह मेला केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं होता है, बल्कि अनेक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है। धार्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा पारंपरिक हस्त शिल्प, दैनिक उपयोग की पारंपरिक वस्तुओं की बिक्री भी होती है।

धार्मिक महत्त्व के अलावा यह मेला एकता एवं विकास का मेला भी है। इसमें राज्य सरकार अपने विभिन्न विभागों की विकास योजनाओं को प्रदर्शित करती है। प्रयाग का माघ मेला दुनिया में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि माघ के धार्मिक अनुष्ठान के फलस्वरूप प्रतिष्ठानपुरी के नरेश पुरुरवा को अपनी कुरूपता से मुक्ति मिली थी। इंद्र को भी माघ स्नान से ही श्राप से मुक्ति मिली थी। पद्म पुराण में भी माघ स्नान का उल्लेख मिलता है।

प्रयाग का माघ मेला इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता है, जो भारत के सभी पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। पुराणों के मुताबिक सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा द्वारा इसे तीर्थो का राजा कहा गया है, जिन्होंने तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर यज्ञ किया था। हमारे पवित्र धर्मग्रंथों, वेदों और रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्यों और पुराणों में भी इस स्थान को प्रयाग कहे जाने के साक्ष्य मिलते हैं। उत्तर भारत में जलमार्ग के द्वारा इस शहर के सामरिक महत्व को समझते हुए मुगल सम्राट अकबर ने पवित्र संगम के तट पर एक शानदार किले का निर्माण कराया है।
वैसे भी मकर संक्रान्ति हिंदुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी शुरू होती है, इसलिए इसे कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में पवित्र गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर हर वर्ष आयोजित होनेवाला विश्व प्रसिद्ध माघ मेला जनवरी में शुरू होगा। मेले के पहले दिन ही लाखों श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाते हैं। फरवरी में महाशिवरात्रि के दिन यह मेला समाप्त होता है।

संगम तट पर माघ मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में श्रद्धालुओं के लिए क़ई पुल बनाए जाते हैं। माघ मेला 14 जनवरी से 27 फरवरी तक चलेगा। मेले में छह महत्वपूर्ण स्नान पर्व पड़ेंगे।

प्रयाग का विशेष धार्मिक महत्व है। प्रयाग का मतलब है यज्ञों की बहुलता का स्थल। प्रयाग का अक्षय वट इस स्थल की प्राचीनता का प्रमाण है। प्रलयकाल में भी जिसका क्षय नहीं होता, वह अक्षय वट है। अक्षय वट की रक्षा भगवान शंकर करते हैं। सम्पूर्ण देवताओं के द्वारा रक्षित इस प्रयाग में मनुष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए एक मास तक निवास करना चाहिए।

आपकी प्रतिक्रिया...