कविता में आंदोलन की गूंज

आपातकालीन हिन्दी काव्य: एक अनुशीनल- 
अजीत कुमार पुरी
तदर्थ प्रवक्ता , हिन्दी विभाग
पीजीडीएवी महाविद्यालय ,दि.वि.
संपर्क सूत्र -9968637345

एक लंबे संघर्ष और बलिदान के पश्चात ही भारत स्वधीन हो सका और देश मेंं गणतन्त्र कि स्थापना हुई । इसके पूर्व सुल्तानों और अंग्रेजों का शासन कैसा था, यह सर्वविदित है । ब्रिटिश सरकार ने रौलेट एक्ट बनाकर पंजाब में उसे कैसे लागू किया, यह ‘जालियांवाला बाग’ की घटना से सहज ही समझा जा सकता है । जनता की आवाज को किसी भी प्रकार कुचल देना अंग्रेजी सरकार के लिए सामान्य बात थी। देशवासियों ने हर मोर्चे पर इसका ड़टकर विरोध किया था , इतिहास इसका साक्षी है । हिन्दी के साहित्यकार भी भारतेन्दु के बताए हुये रास्ते पर चलते हुए लगातार स्वतन्त्रता की भावना से देश को ओतप्रोत कर रहे थे । यही काम उन्होंने आपातकाल के समय भी किया था, जब पूरा देश अपनी ही सरकार के दमन की चक्की में पिस रहा था ।

स्वतंत्र भारत की कहानी भी कुछ कम नहीं है । नेहरू और शास्त्री के बाद जन सरोकार वाली कांग्रेस सरकार एकाएक कैसे तानशाह बन जाती है , भारत के आम आदमी ने इसे 1975-77 में देखा – भोगा । इन्दिरा गांधी की सरकार ने राजनीति के सत्ताशन से सम्पूर्ण देश पर आपातकाल थोप कर सबको सकते में डाल दिया था । एक बार फिर जनमानस उद्वेलित हुआ । छात्रों ,पत्रकारों ,साहित्यकारों ,नेताओं सहित आम जनता भी आपातकाल का सामना करने के लिए उठ खड़ी हो गयी । सरकार ने दमन चक्र चलाये। हजारों लोग कारागार में डाल दिये गए, लाठियाँ,गोलियां भी चलीं किन्तु 1977 में जनता ने जनता पार्टी की सरकार बनवाकर यह सिद्ध कर दिया की लोकतंत्र भारतीयों के रक्त में है । कोई तानाशाही सरकार अपने क्रूर दमन के बल पर इसका गला नहीं घोट सकती। ‘आपातकालीन काव्य:एक अनुशीलन’ नामक पुस्तक इसका प्रमाण है ।

‘आपातकालीन काव्य ; एक अनुशीलन’ नामक पुस्तक में आपातकालीन कवियों साहित्यकारों के मर्मस्पर्शी उद्गारों को विश्लेषित करते हुए डॉ. अरुण कुमार भगत यह कहतेे हैं कि ‘स्वतन्त्रता मिलने से जनता की ‘स्वराज’ की आकांक्षा पूरी हुई ; परंतु स्वतंत्र भारत के राजनेता उस ‘स्वराज्य’ को ‘सुराज्य’ नहीं बना सके और उसमें स्वधर्म का अंश भी खत्म करने लगे ।‘ इस पुस्तक के द्वारा डॉ. भगत ने उन्ही आपातकालीन कवियों की रचनाओं को अपनी समर्थ लेखनी से मूल्यांकित कर वर्तमान बौद्धिक जगत को सचेत करने का सफल प्रयास किया है और हमें सावधान भी कर दिया है कि अगर हम किसी मुगालते में रहे तो हमें कभी भी इस ‘गणतन्त्र’ में ही आपातकाल के दिन देखने पड़ सकते ह््ैं।

191 पृष्ठों की पुस्तक में आपातकालीन काव्य रचनाओं का मूल्यांकन विश्लेषण करना किसी भी दृष्टि से सरल कार्य नहीं हो सकता । यह तो लेखक की लेखनी का सामर्थ्य है कि वह इस पूरे काल को समेंटने में बहुत हद तक सफल हो सकी है । रचनाएँ तो और भी होंगी किन्तु लेखक ने बहुत सी अप्राप्य कृतियों को सामने लाकर हिन्दी जगत पर बड़ा उपकार किया है । पूरी पुस्तक पाँच अध्यायों में विभाजित है । प्रथम अध्याय में आपातकाल की पृष्ठभूमि और उसके सामाजिक परिदृश्य का विश्लेषण मूल्याकंन प्रभावित करता है । बिहार का छात्र आंदोलन और उसका सरकारी दमन उस समय चरम पर पहुँच गया जब 1974 में गया में निहत्थे छात्रों पर गोली चलवा दी गयी। इस घटना से बिहार प्रांत ही नहीं अपितु पूरा देश तिलमिला उठा था । लोकनायक जयप्रकाश ने इसी छात्र आंदोलन को देशव्यापी बनाया था। यही वह समय था जब कविवर गोपीवल्लभ सहाय, रवीद्र राजहंस , देवेंद्र दीपक , दयाकृष्ण विजयवर्गीय आदि अनेक कवियों ने तत्कालीन शासन के दमन एव उत्पीड़न का अपनी कविताओं के माध्यम से घोर विरोध किया था । डॉ. भगत की इस पुस्तक में उस समय के अधिकांश कवियों की रचनाओं को स्थान दिया गया है । जिससे इस पुस्तक की प्रामाणिकता एव महत्ता दोनों बढ़ जाती है ।

देश को अँग्रेजी शासन से स्वतंत्र कराने में जनता को दुर्धर्ष संघर्ष करना पड़ा था , कुछ ऐसा ही आपातकाल के दौर में भी चला । इसका प्रभाव तत्कालीन हिन्दी साहित्य विशेषकर कविता पर गहराई से पड़ा । कवियों ने विपुल मात्रा में साहित्य सर्जना कर संघर्ष को बल प्रदान किया था । काल के निर्मम थपेड़ों और बौद्धिक उदासीनता के कारण यह सारा साहित्य विस्मृत होता जा रहा था । प्रस्तुत पुस्तक विस्मृति के गर्त में जा चुके उन कवियों और उनकी रचनाओं को एक बार पुनः हमारे सामने उपस्थित कर देती है और अपने को जाँचने परखने के लिए हमें एक अवसर भी दे देती है ।

आपातकालीन कविताओं में सत्ता की तानाशाही प्रवृत्ति एवं आतंक का पुरजोर विरोध ध्वनित होता है । इस पुस्तक से यह भी मालूम होता है कि ‘सम्पूर्ण क्रांति के पुरोधा लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने स्वयं भी कवितायें लिखीं और एहसास किया कि इसमें भी जनजागरण की क्षमता है ।‘ हमें यह भी मालूम होता है की अटल बिहारी बाजपेयी केवल एक राजनेता ही नहीं थे बल्कि आल्हा और कुण्डलिया छंद में समर्थ कविता का सृजन कर सकने वाले समर्थ कवि भी थे । जिनकी रचनाएँ ‘आल्हा स्वामी’ और ‘मीसा तंत्र महान’ आम जनता में भी लोकप्रिय हो गयी थीं।

तत्कालीन कवियों की चोट कितनी तीखी थी यह नागार्जुन ,रवीद्र राजहंस ,बाबूलाल मधुकर ,भवानी प्रसाद मिश्र ,देवेंद्र दीपक ,डॉ। रामप्रसाद मिश्र आदि कि कविताओं के पाठ से पता चलता है । यह पुस्तक उन जैसे और कवियों को उनकी रचनाओं के साथ हमारे सामने प्रस्तुत कर देती है । आपातकाल का समय अंग्रेजों के शासन से भी अधिक डरावना था । अंतर इतना था कि उस समय ‘रौलेट’ के स्थान पर ‘मीसा‘ आ गया था । सरकार मीसा का भय दिखाकर जनता कि जुबान बंद करना चाह रही थी । संजय गांधी का आतंक सिर चढकर बोल रहा था । जिसकी प्रति ध्वनि हमें ‘मीसा तंत्र महान ‘और ‘छोटे सरकार ‘ जैसी रचनाओं में सुनने को मिलती है, किन्तु देश की आम जनता, साहित्यकार, पत्रकार आदि लोकनायक जयप्रकाश की अगुआई में आपातकाल का कड़ा प्रतिरोध कर रहे थे । यहाँ डॉ. भगत से सहमत होना पड़ता है कि ‘तथ्यों के आलोक में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि बिहार हो या बंगाल , दिल्ली हो या महाराष्ट्र सर्वत्र जेपी आंदोलन की गूंज सुनाई पड़ रही थी और साहित्यकारों ने खुलकर इसका विरोध किया था ।‘

सम्पूर्ण पुस्तक में विषयानुसार कहीं वेदना की गहनता तो कहीं कवि की ललकार अपनी पूरी तन्मयता से प्रकट होती है । उस समय के कवि लोक मानस के कितने निकट थे , इसकी गूंज हमें अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘आल्हा स्वामी ‘ में सुनने को मिलता है । इसी प्रकार उस समय की और भी कई कवितायें यथा ‘बजेगी रणभेरी’, ‘महाभारत होता है ‘, ‘जनता जानती है ‘,तुम्हारा झूठ हारेगा’ आदि बहुत सी रचनाओं में आम जनता की वाणी को स्वर प्रदान किया गया था। डॉ. भगत बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने उन सभी को आधार बनाकर इस पुस्तक को न केवल महत्त्वपूर्ण वरन संग्रहणीय भी बना दिया है ।

भारतेन्दु युग के समय से ही व्यंग्य साहित्यकारों का एक प्रमुख अस्त्र बन गया था। इस अस्त्र का प्रयोग कर वे तत्कालीन अंग्रेज़ शासकों के शोषण एवं अत्याचार का पर्दाफाश करते थे। आपातकालीन कवियों ने भी इस अस्त्र के माध्यम से आपातकालीन स्थितियों को साक्षात प्रकट करने का काम किया। पुस्तक के पाँचवें अध्याय ‘आपातकालीन कविताओं में व्यंग्य’ में लेखक आपातकालीन कविताओं में व्यक्त चुटीले व्यंग्य की मीमांसा करते हैं और बताते हैं कि कवि और कविता तत्कालीन शासन के भय से कितनी आतंकित थी कि कवियों को व्यंग्य का सहारा लेना पड़ा । नागार्जुन ने तो व्यंग्यों के सहारे तत्कालीन सत्ताधीशों पर कडा प्रहार किया ही किन्तु अन्य कवियों जैसे डॉ. देवेंद्र दीपक ,तपेश्वर नाथ ,दयाकृष्ण विजयवर्गीय ,सुंदरलाल कथुरिया ,रामप्रसाद मिश्र आदि की रचनाओं यथा ‘शब्द चाबुक’, ’समाजवाद आ गया’ ‘अच्छा किया’, ‘मृत्युंजय जयप्रकाश’, ‘ में भी नागार्जुन से भी अधिक निर्भीक होकर आपातकालीन अत्याचार और दमन का उदघाटन किया गया है । इस कारण भी लेखकीय कर्म कि महत्ता बढ़ जाती है। डॉ. भगत साधुवाद के पत्र हैं कि इन कवियों को साहित्य संसार के सामने लाकर उन्होंने हिन्दी आलोचकों कि ओर से कुछ ऋण चुका सकने का प्रयास किया है । नहीं तो हमारे ख्यातिलब्ध आलोचकों ने तो अपनी प्रगतिशीलता के नशे में इन्हें नेपथ्य में डालने का पूरा इंतजाम कर ही लिया था । ऐसा इस पुस्तक के अध्यन के उपरांत कहा जा सकता है।

इस पुस्तक की एक और विशेषता यह भी है कि लेखक ने तत्कालीन राजनीतिक , सामाजिक घटनाओं की साक्षी के लिए स्थान-स्थान पर महत्वपूर्ण लेखकों , पत्रकारों कि किताबों से साक्ष्य लेकर जहां इस पुस्तक कि प्रामाणिकता बढ़ा दी है वहीं अपने को जनवादी प्रगतिशील रचनाकर सिद्ध करने वाले कलमकारों कि करतूतों का भान्डा फोड़कर अपनी निष्पक्षता भी साबित कर दी है । आम जनता के अथक परिश्रम एवं उसकी अदम्य जिजीविषा का प्रकाशन कर लेखक ने सदियों से चली आ रही भारतीय जनता की जीवटता, देश के प्रति समर्पण की भावना एवं अन्याय के प्रति न झुकने के भाव को ही प्रस्तुत कर दिया है ,जिसके द्वारा यह कृति जहां एक ओर आपातकाल के दोषियों को हमारे सामने लाती हैं वही भूमंडलीकरण के इस दिशाहीन दौर में भी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य भावना और न्याय की निष्ठा से जुड़े देशवाशियों को आश्वस्त भी करती कि चाहे कितना ही अत्याचारी , अन्यायी सत्ता अपनी मनमानी करे, इस देश की जनता इतनी समर्थ है की वह उसका मुक़ाबला भी कर सकती और उसे परास्त भी कर सकती है ।

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