भारतीय बाल फिल्में

हिन्दी फिल्मों के सौ वर्षों के इतिहास में कई बाल फिल्मों जैसे ‘बचपन’, ‘सन ऑफ इंडिया’, ‘अलाउद्दीन और जादुई चिराग’, ‘राजा और रंक’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘घर-घर की कहानी’, ‘दो कलियां’, ‘एक ही भूल’, ‘थोड़ी सी बेवफाई’, ‘मासूम’, ‘थ्री ईडियट्स’, ‘तारे जमीं पर’, ‘स्लम डॉग मिलियनेअर’ में समकालीन सामाजिक समस्याओं के कई पहलुओं को दर्शाया गया। उस समय के बच्चों को ध्यान में रखकर बनी फिल्म ‘घर-घर की कहानी’ में बाल कलाकार मास्टर सचिन और जूनियर मेहमूद के विपरीत स्वभाव और रहन-सहन द्वारा उस समय के विद्यालयीन बच्चों को अच्छी और बुरी आदतों से परिचित कराया गया। बाल कलाकार डेजी ईरानी ने कई पौराणिक फिल्मों में अपने अभिनय द्वारा बाल दर्शकों का मनोरंजन किया।
धर्मनिरपेक्ष छवि का जीता-जागता रूप बच्चे हैं और इसको दर्शाया गया फिल्म ‘नन्हा फरिश्ता’ में। जिसमें तीन डकैत, प्राण (हिन्दू), अनवर हुसैन (मुस्लिम) और अजीत (ईसाई) में एक छोटे से बच्चे की वजह से बदलाव आता है। 1970 और 1980 के दशक में बाल कलाकारों ने अपनी फिल्मों में अपने माता और पिता के टूटे रिश्तों को जोड़ कर दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। उनमें से ‘दो कलियां,’ ‘एक ही भूल’ और ‘थोड़ी सी बेवफाई’ दर्शकों द्वारा काफी सराही गयी। इन फिल्मों ने यह संदेश दिया कि बच्चे घर में कभी-कभी अपने बड़ों से भी ज्यादा अच्छी सूझ-बूझ का परिचय देते हैं।

2000 के दशक में तीन भारतीय फिल्मों ‘स्लम डॉग मिलियनेअर’, ‘थ्री ईडियट्स’ और ‘तारे जमीं पर’ ने राष्ट्रीय ही नहीं वरन् अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय फिल्मों की पहचान को स्थापित कर दिया।

‘स्लम डॉग मिलियनेअर’ में बाल अभिनेताओं ने अपने अभिनय द्वारा झुग्गी झोपड़ीवासियों की जिंदगी की सच्चाई सामने लाकर रख दी।

‘थ्री ईडियट्स’ में कलाकारों ने अपने अभिनय द्वारा बालकों और युवाओं को उच्च शिक्षा द्वारा अपना भविष्य संवारने का पारंपरिक मापदंड बदलने की दिशा में प्रेरित किया, साथ ही साथ अभिभावकों को भी यह संदेश दिया कि वे अपने बच्चों पर स्वयं के निर्णय न थोपें और उन्हें उनकी रूचि के अनुसार उच्च शिक्षा का चुनाव करने के लिए प्रोत्साहन दें।

अभिनेता आमिर खान द्वारा निर्देशित ‘तारे जमीं पर’ में बाल कलाकार दर्शिल सफारी ने डिसलेक्सिया नामक बीमारी के रोगी के अभिनय के माध्यम से बताया कि भले ही इस बीमारी की वजह से पढ़ने, सीखने में दिक्कत आती हो लेकिन अपने अंदर छुपी अन्य प्रतिभाओं जैसे रंग चित्रकला द्वारा भी अपने आपको सफल साबित कर सकता है। इस फिल्म में शिक्षकों को पढ़ाने के नवीनतम तरीकों को अपनाने की प्रेरणा दी गयी।

इसी वर्ष 2013 में बनी फिल्म ‘ओस-द ड्यू ड्रॉप’ के निर्देशक अभिनव शिव तिवारी ने इस फिल्म में बच्चों के देह-व्यापार से संबंधित समस्या उजागर की है। इसी वर्ष 2013 में बच्चों की समस्या पर बनी फिल्म ‘ब्ल्यू माऊन्टेन्स- चेंजिंग शेड्स ऑफ ह्यूमन बीईंग’ के निर्देशक सुमन गांगुली के अनुसार उन्होंने इस फिल्म में आज के बालकों और युवाओं को यह संदेश दिया है कि प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि सिर्फ जीतना। यह फिल्म उन बालकों के लिए है जो अपनी इस कम उम्र में ‘टैलेन्ट हंट कांटेस्ट’ जैसी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं और हार जाते हैं और निराश हो जाते हैं। इस फिल्म में उन्होंने यह संदेश दिया है कि हार से निराश होने की जरूरत नहीं। अपनी प्रतिभा पर विश्वास रखकर फिर से संघर्ष करके भी सफलता की ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है।

इस तरह भारतीय बाल फिल्में हमेशा से बाल दर्शकों को नये रूप में मनोरंजन व शिक्षा देती रही हैं।
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