कंधा किसान का, बंदूक मोदी विरोध की

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में आंदोलन होना कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी भी जारी है। शाहीन बाग के बाद दिल्ली में किसान आंदोलन की गूंज है। पंजाब और हरियाणा के किसान दिल्ली में आकर प्रदर्शन कर रहे है। ये प्रदर्शन मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानून के विरोध में किये जा रहे हैं। किसानों का इस तरह प्रदर्शन करना न तो लोकतंत्र के विरुद्ध है और न तो भारतीय इतिहास के। चूंकि संसद में जब कोई कानून पारित किया जाता है तो वह पूरा का पूरा सभी को मान्य होगा या उसमें कुछ बातें छूटी नहीं होंगी, ऐसा कभी नहीं होता। अत: यह मानना आवश्यक है कि कुछ संशोधनों की गुंजाइश तो हो ही सकती है। और अगर किसान सरकार से इस बारे में कुछ सवाल कर रहे हैं, अगर उनकी कुछ शंकाएं हैं, तो उन शंकाओं का पूरी तरह से निरसन करना भी सरकार का ही काम है।

किसानों का सबसे बड़ा डर एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइज) और एपीएमसी को लेकर है। अभी तक एमएसपी एक तरह से किसानों के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है, क्योंकि अगर किसान खुले बाजार में अपनी उपज नहीं बेच पाता या उसे बाजार में अपेक्षित मूल्य नहीं मिलता तो सरकार उसकी उपज को एमएसपी पर खरीदती थी। आंदोलन कर रहे किसानों को अभी यह लग रहा है कि सरकार उनका यह सुरक्षा कवच हटाना चाहती है। सरकार के द्वारा एमएसपी पर जो खरीदारी की जाती थी, वह एपीएमसी के माध्यम से ही की जाती थी। अब सरकार एपीएमसी के साथ ही निजी क्षेत्र को भी यहां उतारना चाहती है, जिससे किसान अपनी उपज सीधे निजी क्षेत्र को बेच सकें। किसान सोचते हैं अगर निजी कंपनियां इस क्षेत्र में आती हैं तो पहले तो वे उपज का अच्छा दाम देंगी, परंतु जब किसान उन पर निर्भर हो जाएंगे तो वे मनमानी करने लगेंगी और किसानों को उपज का मूल्य एमएसपी पर नहीं मिलेगी। किसानों के इस डर को खत्म करना सरकार के लिए अत्यावश्यक है। उन्हें सरकार के एमएसपी और एपीएमसी को खत्म न करने का वादा लिखित स्वरूप में अपेक्षित है।

हालांकि सरकार ने निजी क्षेत्र की किसी भी तरह की मनमानी के विरुद्ध किसानों को अब सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट के साथ ही अदालत जाने की भी छूट दी है। परंतु सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट और अदालतों पर वैसे ही पुराने केसेज का दबाव होता है। इसलिए किसान सोच रहे हैं कि उनके नए मामलों का निराकरण करने में काफी लंबा समय चला जाएगा। किसानों की यह सोच पूरी तरह से गलत भी नहीं है, अत: निकट भविष्य में सरकार इस ओर विचार करके अगर किसानों के लिए कोई अन्य न्यायपद्धति विकसित कर सकती हो तो शायद किसान अधिक खुश होंगे।

वास्तव में कृषि कानून का दायरा केवल किसानों तक सीमित नहीं है। यह ग्राहक, भंडारण का काम करने वालों, प्रसंस्करण करने वालों, थोक तथा फुटकर बिक्री करने वालों इत्यदि तक फैला हुआ है। इसके साथ ही कृषि का अर्थ केवल अनाज उत्पादन नहीं है, वरन सब्जी, फल, दूध इत्यादि का उत्पादन भी इसी क्षेत्र में आता है। इसलिए प्रश्न यह उठता है कि दिल्ली में जो किसान आए हैं वे किसी विशिष्ट स्थान और फसल का उत्पादन करने वाले क्यों हैं? यहां आंदोलन कर रहे अधिकतम किसान केवल पंजाब और हरियाणा के ही क्यों हैं? क्या शेष भारत के किसानों को इस कानून से कोई परेशानी नहीं है? और ऐसी कौन सी बात है जिससे पंजाब-हरियाणा के किसानों को परेशानी है परंतु अन्य किसानों को नहीं। जबकि पंजाब में तो एपीएमसी एक्ट लागू होने के कारण सारा पंजाब ही कृषि उपज के लिए बाजार बना हुआ है। और तो और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंदर सिंह स्वयं रिलायंस को पंजाब के कृषि क्षेत्र में पदार्पण का न्यौता दे चुके हैं परंतु अब आंदोलन कर रहे पंजाब के ये किसान कृषि में निजी कंपनियों के प्रवेश से डर रहे हैं। ये सारे मुद्दे इस आंदोलन को केवल किसान आंदोलन कहने पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं तथा इस बात की पुष्टि भी कर रहें हैं कि किसान आंदोलन की आड़ में कुछ लोग अपने स्वार्थ के बीज बो रहे हैं। भारतीय किसान सामान्यत: मेहनतकश, निस्वार्थ और भोलाभाला माना जाता है। उसकी इस प्रतिमा की आड़ में अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने वालों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे अपने अन्नदाता के साथ गलत व्यवहार कर रहे हैं।
आंदोलन जब स्वार्थ और राजनीति से प्रेरित हो जाता है तो उसका मूल मुद्दा भटक जाता है। सीएए का विरोध करते-करते शाहीनबाग के आंदोलन का हश्र क्या हुआ यह हम सभी ने देखा था। सीएए क्या है यह समझे बिना प्रदर्शन करने उतरे आंदोलनकारियों ने मुफ्त में ही अपना कंधा उन लोगों के हवाले कर दिया था जो मोदी विरोध की कुंठा से ग्रसित थे। अत: इस आंदोलन का स्वरूप मोदी विरोध से देशविरोधी गतिविधियों तक बनता चला गया।

यही हाल किसान आंदोलन का भी देखने मिल रहा है। किसानों की मुख्य समस्याओं, उनकी वाजिब मांगों को खालिस्तान समर्थित नारों और पोस्टरों ने दबा दिया। कृषि कानून का विरोध करते-करते ये किसान कब देश का विरोध और खालिस्तान का समर्थन करने लगे यह पता ही नहीं चला। रही सही कसर विपक्षी पार्टियों ने पूरी कर दी थी। कांग्रेस की रसोई अचानक से इन किसानों को भरपेट भोजन परोसने लगी, जबकि लॉकडाउन में अपने-अपने घरों की ओर वापिस लौट रहे मजदूरों की मदद करने के लिए उन्हें न तो रसोइए मिले थे, न टेंट लगाने वाले कॉन्ट्रैक्टर। खैर, कांग्रेस की नीयत से तो पिछले कुछ वर्षों में भारत की जनता वाकिफ हो ही चुकी है, परंतु आंदोलन कर रहे किसानों को इन मुद्दों पर गौर करना ही चाहिए कि कहीं वे भी अपना कंधा कुछ ऐसे लोगों को तो नहीं दे रहे हैं जो केवल अपने राजनैतिक स्वार्थ और मोदी विरोध की बंदूक ताने खड़े हैं। क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो किसान आंदोलन का स्वरूप बिगड़ने में देर नहीं लगेगी और अन्नदाता को ही खाली थाली लिए लौटना होगा।

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