यह पार्टी किस आम आदमी की?

चार दिन की गुजरात यात्रा पर निकलने से पहले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया था कि वे गुजरात जाकर वहां नरेंद्र मोदी के विकास के दावों की असलियत देखना चाहते हैं। वे देखना चाहते हैं कि बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार इत्यादि क्षेत्रों में मोदी गुजरात के जिस विकास की बात करते हैं उसमें कितना दम है? और 5 मार्च को गुजरात पहुंचकर केजरीवाल का आधा दिन भी नहीं बीता कि अपने रोड़ शो के रास्ते में पड़े इक्का-दुक्का गांवों में आम आदमी पार्टी समर्थकों की छोटी-मोटी टोलियों के साथ थोड़ी देर बात करके ही उन्होंने जान लिया कि गुजरात में विकास का मोदी का हर दावा ‘झ्ाूठा’ है और भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं! केजरीवाल अगर यही ‘जानने’ और कहने के लिए गुजरात गए तो उन्हें यह कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं थी। गुजरात कांग्रेस के नेता तो पिछले दस साल से यही बातें कह रहे हैं. बस, मुश्किल यह है कि गुजरात की जनता उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देती। केजरीवाल ने भी गुजरात कांग्रेस के नेताओं की वही बातें और आरोप दोहराए। यह भी दिलचस्प है कि गुजरात के दौरे से ठीकपहले केजरीवाल जिस उत्तर प्रदेश में रोड़ शो करके आए वहां उन्हें न तो बिजली (जो शीत ऋतु में 8-10 घंटे और गर्मियों में 12-16 घंटे गायब रहती है), पानी, सड़कों, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन की बदहाली दिखी, और न ही अखिलेश यादव सरकार के लगभग दो साल के कार्यकाल में 100 से अधिक दंगे नजर आए। समाजवादी पार्टी सरकार के बारे में दो-चार सामान्य बातें कहकर उन्होंने अपना रुख गुजरात की ओर मोड़ लिया। और आधे दिन के प्रवास में ही वे जान गए कि गुजरात ‘देश का सबसे समस्याग्रस्त राज्य’ है!

दिल्ली में शासन चलाने के राजधर्म से पल्ला झाड़कर फिर सड़क पर आ उतरे केजरीवाल जिस तरह मोदी को निशाना बना रहे हैं उससे यह संदेह प्रबल होता है कि क्या केजरीवाल और उनकी पार्टी की सारी ‘नई, वैकल्पिक राजनीति’ मोदी के विरोध में, उन्हें रोकने के लिए ही तैयार की गई है? क्या वे उनके आंदोलनकारी साथी मोदी को इसलिए रोकने निकले हैं क्योंकि अपनेे दस वर्षों के शासन में भ्रष्टाचार और कुशासन की पर्याय बन चुकी सोनिया गांधी-राहुल गांधी-मनमोहन सिंह की कांग्रेस में मोदी के अश्वमेध के अश्व को रोक लेने की हिम्मत बाकी नहीं रही, और उसने युद्ध शुरू होने से पहले ही हथियार डाल दिए? और इस तरह क्या केजरीवाल ने पस्तहाल कांग्रेस को मोदी पर आक्रमण करने के लिए अपना कंधा मुहैया करा दिया है? या कि केजरीवाल के कंधे को मजबूती ही इसलिए दी गई ताकि जब कांग्रेस को लगे कि वह लाख जतन करके भी देश में मोदी के बढ़ते जनसमर्थन को नहीं रोक पाएगी, और राहुल की सभाओं में भीड़ के बावजूद मतदाता, खास तौर पर युवा मतदाता जुनून की हद तक मोदी के समर्थन-ज्वार में धंसता चला जाएगा तो केजरीवाल मोदी के विरूद्ध कांग्रेस की लड़ाई लड़ेंगे? केजरीवाल परिवर्तन के लिए आतुर निम्न-मध्यम और मध्यम वर्ग तथा बेचैन युवा भारत की आवाज बुलंद करते हुए मोदी की चमक छीन लेंगे, उनके प्रति बढ़ते जन-समर्थन की आंधी को थाम लेंगे और इस तरह मोदी को देश का प्रधान मंत्री बनने से रोक देंगे?
बेशक केजरीवाल ने कांग्रेस नेताओं को भी निशाना बनाया है, यूपीए के कुछ बड़े और प्रभावी मंत्रियों पर ‘भ्रष्ट’ का तमगा जड़ा है, और राहुल गांधी को चिट्ठी वगैरह लिखी है। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि दिल्ली में शीला दीक्षित के 15 वर्षों के कांग्रेस शासन को नेस्तनाबूद करने का चमत्कार करके उसी कांग्रेस के बल पर दिल्ली में सरकार बनाने के बाद से ही केजरीवाल ने धीरे-धीरे कांग्रेस के बारे में चुप्पी साध ली। और तब तक चुप्पी साधे रहे जब तक कि मीडिया में उनकी आलोचना तेज नहीं हो गई। अपनी सरकार के अंतिम दिनों में वे कांग्रेस के कुछ मंत्रियों-खास तौर से पूर्व पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री मुरली देवड़ा और वर्तमान पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली के विरूद्ध अचानक ही तब आक्रामक हुए जबपूर्व कैबिनेट सचिव टी.एस.आर. सुब्रमण्यन की एक शिकायत केजरीवाल की दिल्ली सरकार को मिली।

सुब्रमण्यन ने पूर्व नौसेनाध्यक्ष एल. रामदास, केंद्र सरकार में सचिव रहे रामस्वामी अय्यर तथा एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर गहरे समुद्र से निकाली जा रही प्राकृतिक गैस की कीमतें दोगुनी करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती दे रखी है जिसमें उन्होंने प्राकृतिक गैस की कीमतें दोगुनी करने में “रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और सत्तातंत्र (केंद्र सरकार) के बीच सांठगांठ” की सीबीआई या एसआईटी से जांच कराने की मांग है। समुद्र में गैस की खोज तथा बिक्री का ठेका रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास है।

सुब्रमण्यन की इस शिकायत को आधार बनाकर केजरीवाल सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी, देवड़ा, मोइली तथा एक अन्य पूर्व नौकरशाह के विरूद्ध फटाफट एफआईआर दर्ज कर ली तो उसके कारण भी समझे जा सकते हैं। एक कारण तो यह हो सकता है कि रिलायंस के तेल कुएं समुद्र के जिस हिस्से में हैं वह गुजरात में है। अंबानी गुजराती हैं और गुजरात में भी उनके उद्यम हैं। वे मोदी के सुराज के प्रशंसक माने जाते हैं और दूसरे तमाम उद्योगों समेत रिलायंस भी मोदी सरकार की औद्योगिक नीति की कायल समझ जाती है। दूसरा कारण यह कि सुप्रीम कोर्ट मेें याचिका करने वाले पूर्व नौसेनाध्यक्ष रामदास केजरीवाल के कट्टर समर्थक हैं। केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए जब नामांकन दाखिल करने गए तो रामदास उनके साथ थे। रामदास की पत्नी लीला रामदास आम आदमी पार्टी की महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनी एक समिति की प्रमुख हैं। रामदास और केजरीवाल का एक और संबंध है-रामदास की बेटी कविता एन. रामदास दक्षिण एशिया में उस अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन की प्रमुख हैं जिससे केजरीवाल और उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ को कई वर्षों तक लाखों अमेरिकी डॉलर (आरोप है कि पिछले तीन साल में करीब 4 लाख अमेरिकी डॉलर) का अनुदान मिला है। फोर्ड फाउंडेशन के एक अधिकारी ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया है कि केजरीवाल और सिसोदिया को सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम करने के लिए फाउंडेशन से अनुदान मिला। केजरीवाल ने बार-बार लगे इस आरोप का कभी कोई जवाब नहीं दिया कि सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम करने लिए फोर्ड फाउंडेशन से मिले अनुदान का इस्तेमाल उन्होंने ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के तहत आंदोलन चलाने के लिए किया। यह भी एक संयोग ही है कि केजरीवाल को मिले रैमन मैगसायासाय अवार्ड की फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन करता है। केजरीवाल और सिसोदिया के एनजीओ को विदेशी अनुदान के इस गोरखधंधे के विरूद्ध दिल्ली हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर है और कोर्ट के निर्देश पर दिल्लीपुलिस इसकी जांच कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय भी ऐसे विदेशी अनुदान की पड़ताल कर रहा है।

हालांकि गैस की कीमतों के मामले में केजरीवाल सरकार की दर्ज की हुई एफआईआर अंबानी के अलावापूर्व और वर्तमान पेट्रोलियम मंत्रियों के विरूद्ध है लेकिन कैसा आश्चर्य है कि केजरीवाल देवड़ा और मोइली का जिक्र तक नहीं कर रहे हैं लेकिन अंबानी के साथ मोदी का नाम जोड़कर देश में यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं मानो प्राकृतिक गैस के दाम यूपीए सरकार नहीं, मोदी बढ़ाने जा रहे हैं! जबकि गैस की कीमतों से न तो मोदी का, न उनकी गुजरात सरकार का ही कोई लेनादेना है। सुब्रमण्यन की शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करने में केजरीवाल सरकार की बिजली की-सी तेजी की वजह भी समझी जा सकती है। अंबानी के जरिए मोदी को निशाना बनाने का मौका, चाहे झूठ से ही सही! दिल्ली भाजपा के नेता हर्षवर्द्धन और अब दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली भी केजरीवाल को ‘सबसे बड़ा झूठा’ करार देते नहीं थकते। लगातार झूठ बोलने का आरोप उनके पूर्व सहयोगी और आम आदमी पार्टी (निष्कासित) विधायक विनोद कुमार बिन्नी और पार्टी के कई अन्य नेता भी लगा चुके हैं। आम आदमी पार्टी को मिले विदेशी चंदे को लेकर भी केजरीवाल और उनके सहयोगियों के जवाब गोलमोल हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता का गुणगान करने वाली इस पार्टी ने बार-बार पूछे जाने के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्रालय को अब तक इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं की है।

अब जरा उन केजरीवाल को याद कीजिए जो 2011 में जन लोकपाल का आंदोलन चलाने के लिए अण्णा हजारे को रालेगण सिद्धि से दिल्ली लेकर आए थे। दिल्ली के पढ़े-लिखे लोग केजरीवाल को सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता के रूप में जानते थे। उन्हें केजरीवाल-सिसोदिया के एनजीओ-कबीर, परिवर्तन और ‘नया परिवर्तन’ की कोई कहानी मालूम नहीं थी। और न ही यह मालूम था कि उनके एनजीओ किस विदेशी अनुदान पर चल रहे थे। तब अण्णा को शायद ही अंदाज रहा होगा कि उनके आभामंडल में चमक रहे केजरीवाल और उनके सहयोगियों के लिए जन लोकपाल आंदोलन राजनीति में उतरने का लॉन्चिगपैड़ बन रहा है। यूपीए सरकार के कार्यकाल के भयंकर भ्रष्टाचार, महंगाई और काले धन के किस्सों से गुस्साए आम लोग और बेरोजगार नौजवान अण्णा में आशा की किरण देख रहे थे। लेकिन धीरे-धीरे अण्णा इस फलक से बाहर हो गए और केजरीवाल तथा उनके सहयोगी अण्णा के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के रूप में राजनैतिक पार्टी बनाकर दिल्ली की जनता के बीच उतर आए। लोग उनसे वैसे ही जुड़ते गए जैसे अण्णा से जुड़े थे। दिल्ली विधानसभा का चुनाव आते-आते केजरीवाल दिल्ली का भरोसा जीत चुके थे। लेकिन देश की गद्दी के लिए राजधानी के लोगों की पसंद तब भी मोदी ही थे। चंद मुट्ठियों में कैद राजनैतिक व्यवस्था को खास लोगों से आजाद कर सही मायने में आम लोगों के हाथों में पहुंचाने के नारे के साथ सियासत में उतरे केजरीवाल के लिए दिल्ली ही नहीं, देश भर भारी सदिच्छा जन्मी। ऊंचे पदों का भ्रष्टाचार खत्म करने और चुनावों में पैसे का खेल रोकने के उनके नारे आकर्षक थे। हाल के वर्षों में उभरा नया मध्यम वर्ग, असंगठित क्षेत्र के छोटे कारोबारी, कारीगर, और कर्मचारियों को उम्मीद थी कि केजरीवाल लोकतंत्र की आत्मा यानि-अपने बारे में फैसले करने में लोगों की वास्तविक सहभागिता-को संकीर्ण राजनीति के पिंजरे से आजाद करेंगे। लेकिन उनकी पार्टी अंतत: उसी लीक फर चली जिस पर दूसरे राजनैतिक दल चलते हैं। पानी के मामले में मुफ्त सुविधा की खैरात और बिजली बिल पर सब्सिडी का धंधा वही था जिसे स्थापित दलों की सरकारें वोट हासिल करने के लिए कामयाबी से आजमा रही हैं। आम आदमी पार्टी ने भी जाति-धर्म-वर्ग की वही राजनीति चलाई जो दूसरे चलाते हैं। अपने बेलगाम मंत्रियों को बचाने के लिए केजरीवाल ने जिस तरह धरने पर बैठ पूरी दिल्ली को 48 घंटे से भी ज्यादा बंधक बनाए रखा, वह भी कोई नई नहीं पुरानी राजनीति का ही नमूना था। भ्रष्टाचार दूर करने के नाम पर केजरीवाल ने कुछ सैकड़ा निचले सरकारी कर्मचारियों पर कार्रवाई करके छुट्टी पा ली और ‘दिल्ली में भ्रष्टाचार में 25 फीसदी कमी’ आने का हास्यास्पद दावा करते हुए दिल्ली भर में बड़े-बड़े होर्डिंग लगवाए जिस पर उनकी अपनी पार्टी के लोगों ने भी शायद ही भरोसा किया। केजरीवाल कहते रहे कि वे कड़ा से कड़ा जन लोकपाल लाएंगे और किसी भ्रष्टाचारी को नहीं बख्शेंगे। आम जनता भी यही चाहती थी। लेकिन सचाई यह है कि संसद जिस लोकपाल कानून को पारित कर चुकी है कोई भी राज्य सरकार उससे ऊपर कोई कानून बना ही नहीं सकती थी। क्या केजरीवाल इसे नहीं जानते थे? लेकिन झांसेबाजी जारी रही।

इसके बावजूद देश में केजरीवाल के प्रयोगों को उत्सुकता और उम्मीद से देखा जा रहा है तो उसकी मुख्य वजह स्थापित राजनैतिक दलों की आलाकमान, कुनबे, पैसे, चाटुकारिता और खास लोगों तक सीमित राजनीति रही है। देश की राजनैतिक जमात की साख इस समय रसातल में है। इस राजनैतिक पीढ़ी का आज के युवा, उभरते भारत की आशाओं और आकांक्षाओं से कोई तालमेल नहीं जो सुशासन और विकास चाहता है लेकिन सम्मान के साथ। कमजोर मनमोहन सिंह के दस साल के सोनिया गांधी निर्देशित राजकाज से आजिज देश में एक मजबूत और ईमानदार नेता की आस जगी थी। जब मोदी अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से इस आस के प्रतिनिधि बनकर उभर रहे थे उसी समय सामान्य कार्यकर्ता वाली छवि के केजरीवाल ने भी देश की इन्हीं उम्मीदों को छुआ। स्वयंसेवी संगठन की पृष्ठभूमि और वैचारिक रूप से नव-उदार वामपंथी तेवर की वजह से देश भर के स्वयंसेवी संगठन, जिनमें कुछ हिंसा-विरोधी नक्सल समर्थक समूह भी हैं, धीरे-धीरे केजरीवाल की पार्टी की ताकत बनते गए। आज देश भर में आम आदमी पार्टी का जो कैडर एकाएक उभर आया है उनमें अधिकतर सक्रिय, पूर्णकालिक कार्यकर्ता स्वयंसेवी संगठनों के हैं जो समाज जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में पहले से ही काम कर रहे हैं तथा अपनी संस्थाओं के वेतनभोगी हैं। इनमें से कई संगठनों को विदेशी संस्थाओं से नियमित अनुदान मिलता है. कइयों का अपने-अपने कार्यक्षेत्र में असर भी है। केजरीवाल उनके लिए इस असर को लोकप्रिय समर्थन में तब्दील करने की धुरी बन गए हैं। लेकिन अलग-अलग हितों के पोषण के कारण यह कुनबा अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों से भी अटा आ है। ऐसे ही वैचारिक अंतर्विरोधों का नतीजा था कि केजरीवाल 50 दिन भी सरकार में नहीं टिक पाए। उन्हें समर्थन देने वाला दिल्ली महानगर इससे निराश है। नाजुक मुकाम पर खड़ा देश आज ऐसी निराशा में फंसने का जोखिम नहीं ले सकता। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि स्थापित राजनैतिक दल विकल्प पेश करें, मोदी की अगुआई ही काफी नहीं है। देश ने मोदी को कबूल कर लिया है। लेकिन उनके साथ संसद में जाने वाले प्रतिनिधि भी साफ-सुथरे, ईमानदार और कार्यक्षम होने चाहिए। राज्य सरकारों को भ्रष्टाचार, खास तौर पर ऊंचे पदों पर स्थित लोगों के विरूद्ध सिर्फ बातें नहीं, कार्रवाई करते दिखने की जरूरत है। चुनावों में धन का अंधाधुंध इस्तेमाल रोकने की शुरूआत करना भी जरूरी है। और सुशासन का मतलब सिर्फ खैरात बांटना नहीं है। वैकल्पिक राजनीति के साथ वैकल्पिक कार्यक्रम भी चाहिए। वरना मध्यम वर्ग के बड़े तबके को केजरीवाल और झोलावालों के उनके दल की छापामार शैली आकर्षित करती रहेगी। और अगर इसकी वजह से खिचड़ी सरकार की खिड़की खुली तो यह देश के लिए कुछ शुभ नहीं होगा।
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