परमभाग्य

मंदिर यह पवित्र स्थान होता है इसलिए हम मंदिर के बाहर ही चप्पल-जूते निकालकर मंदिर में प्रवेश करते है. मंदिर में भगवान के समक्ष सुंदर सुंगंधित फुल चढाते है. हमें मंदिर की पवित्रता का ध्यान रखना पड़ता है और उसके अनुरूप ही मन में पवित्र विचार आते है क्योंकि मंदिर में भगवान रहते है.

हमारे इच्छाओं के अनुसार भगवान का साक्षात दर्शन तो नहीं होता क्योंकि वह निर्गुण, निराकार, अव्यक्त होता है परंतु हमारा मन निर्गुण और अव्यक्त की कल्पना भी नहीं कर सकता. इसलिए हमने उसे प्रतिमा के रूप में साकार रूप दिया.

ईश्वर नित्य परमानंद देनेवाला, सुखों की वृद्धि करनेवाला और सर्वगुण संपन्न होता है. यह सारी खूबियां हम व्यक्ति में ढूंढने लगते है और ऐसे व्यक्ति को देखना हो तो हमारे आँखों के सामने अनायास ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी की तस्वीर आ जाती है.

राम ईश्वर के निर्गुण का सगुण रूप, नित्यानंद का साक्षात दर्शन, सभी दैवीय शक्तियों एवं गुणों के खान, मानव रूप में उन्होंने जन्म लिया और ईश्वरीय गुण संपदा भी उनके साथ ही आई.

सत्य, सदाचार, नीति मर्यादा का पालन करने के कारण राजा राम, श्रीराम बने. मानव जीवन में हम अधिकार का विचार नहीं करते बल्कि कर्तव्य का विचार करते है. पुत्र, भाई, पती, पिता, मित्र, राजा, मार्गदर्शक आदि अनेक भूमिकाओं में देहधारी राम ने अपना जीवनयापन किया. उन्होंने अपनी इन सभी भूमिकाओं में एक आदर्श स्थापित किया.

राम की पूजा यह आदर्शों की पूजा है. धनुर्धारी राम की पूजा है. राम के आदर्शों को हमने हजारों वर्षों से सहेज कर रखा है. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हम संस्कारित करते रहे. यह हमारी परंपरा का हिस्सा बन गया. राम के आदर्शों से प्रेरित होकर चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य, शिवाजी, जैसे अनेक राजा-महाराजा हुए. वाल्मीकि, विवेकानंद जैसे महान कवी एवं तत्व ज्ञानी हुए. आधुनिक समय में लोकमान्य तिलक-गांधी हुए. राम के आदर्शों को लेकर कैसे जिया जाता है यह उन्होंने सिद्ध कर दिखाया.

ऐसे राम का जन्म अयोध्या में हुआ. उनका जन्मस्थान परम पवित्र, जिस भूमि पर उन्होंने घुमा, वह भूमि पवित्र, जिस मिट्टी में उन्होंने खेला वह मिट्टी अत्यंत पवित्र, जिस सरयू जी में उन्होंने स्नान किया वह नदी तीर्थ बन गई.

वहीं अयोध्या में हमारे आदर्शों के प्रतिक निर्गुण, निराकार के साकार रूप श्रीराम का भव्य दिव्य मंदिर निर्माण हो रहा है. प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय के राम अयोध्या में बन रहे मंदिर में विराजमान होने वाले है. युगों-युगों में आनेवाला यह अद्भुत क्षण है. राम जन्मोत्सव की ही तरह यह आनंद, मंगल और पवित्रता का महोत्सव है.

जब हम राम जी के आदर्शों पर चलते थे तब भारत को हमने स्वर्णभूमि बनाया और जब हमने राम के आदर्शों को भुला दिया तब यह स्वर्णभूमि दरिद्रभूमि में परिवर्तित हो गई. रामजन्मभूमि पर राममंदिर का पुन: निर्माण यह स्वर्णयुग की ओर जाने का प्रवास है. अपने ह्रदय में बसे राम को भी साथ में लेकर जाना है, भुलाना नहीं है. अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से राम के आदर्शों को शामिल कर आगे बढ़ना है.

जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का संकल्प इसलिए लिया गया है. यह दैवीय संकल्प है, इस दैवीय संकल्प में हम सभी सहभागी हो रहे है. इस ईश्वरीय कार्य में शामिल होने का हमें सुअवसर मील रहा है यह हम सभी का परम भाग्य है, युगों-युगों में अत्यंत कष्टों के बाद आनेवाला परम भाग्य…

आपकी प्रतिक्रिया...