समाज जीवन को विकास की दिशा देने वाला नेता

नियति इंसान के सामने कभी-कभी काफी उलझी हुई पहेलियां रख देती है। उसके पास दया नहीं होती। नियति ऐसे प्रतिभावान लोगों को संसार से अचानक उठा लेती है, जो समाज को अपने से लगते हैं; जिनकी अनुभव संपन्नता का, विद्वत्ता का समाज और देश को लाभ हो सकता है। दुनिया के रंगमंच पर जब नाटक अत्यधिक रोमांचक हो जाता है तो नियति अपनी इच्छा के अनुरूप निष्ठुरता से भलेभलों को अपने साथ ले जाती है। 3 जून को हुई स़डक दुर्घटना में गोपीनाथ मुंडे की असमय मृत्यु की खबर सुनकर मेरा नियति के संदर्भ में उक्त विचार और पक्का हो गया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग ही है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे की विजय का आनंदोत्सव ‘अंतिम संस्कार’ जैसी दुखद घटना में परिणित हो गया। नियति का यह खेल देश और भाजपा को आघात देने वाला और इससे भी कई गुना अधिक महाराष्ट्र का नुकसान करने वाला है।

आज भाजपा भारत की सत्ताधारी पार्टी है। महाराष्ट्र में विपक्ष के रूप में भी वह जोरदार काम कर रही है। आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा की ओर सत्ता के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है। आज की सफल भाजपा की अगर मिमांसा करनी है तो हमें थो़डा पीछे जाना होगा। राजनीति में परिवर्तन, विकास की प्रक्रिया, केवल सभा, भाषणबाजी और पोस्टर तक ही सीमित नहीं होती। यहां समाज को खंगालना प़डता है। विकास के मुद्दों को सतत जनता के सामने लाना होता है। संस्कृति से संबंधित, विद्यार्थियों से संबंधित तथा जनता के मन में उठने वाले अन्य सवालों के उत्तर ढूं़ढने के लिए आंदोलन करने होते हैं। ऐसे छोटे-ब़डे आंदोलनों के एकत्रित परिणाम के रूप में ही दूरगामी राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तन होते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण गोपीनाथ मुंडे ने महाराष्ट्र के कार्यकर्ताओं के सामने रखा। आपात काल के बाद महाराष्ट्र की राजनीति की जब-जब मिमांसा की जाएगी तब-तब गोपीनाथ मुंडे के दमदार कार्यों की चर्चा की जाएगी। सन 1995 में महाराष्ट्र की सत्ता में आई भाजपा, वर्तमान में प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में भाजपा और आने वाले विधानसभा चुनावों में फिर एक बार सत्ता के पास पहुंचने वाली भाजपा यह सभी गोपीनाथ मुंडे की क़डी मेहनत का ही परिणाम है।

मराठवाडा के ग्रामीण क्षेत्र के युवा गोपीनाथ मुंडे ने सन 1972 में रा.स्व. संघ पुणे की शाखा में मुख्य शिक्षक के रूप में कार्य प्रारंभ किया। शरीर पर मैला शर्ट, धूल भरा पाजामा और मिट्टी से सने हुए पैर; गोपीनाथ मुंडे की इस अवस्था को देखकर पुणे के स्वयंसेवकों को आश्चर्य हुआ। ‘यह ल़डका हमें योग सिखाएगा?’ यह प्रश्न उनके सामने था। परंतु कुछ दिनों में ही अपनी आत्मविश्वासपूर्ण संवाद शैली और मित्रवत स्वभाव के कारण वे पुणे के स्वयंसेवकों के नेता बन गए। उनकी कार्य पद्धति के कारण शाखाओं की संख्या बढ़ी। गोपीनाथ मुंडे के काम और संवाद कौशल को देखकर श्रीपति शास्त्री ने संघ और जनसंघ के पदाधिकारियों से कहा था यह ‘लंबी रेस का घो़डा’ है।

सन 1980 के दशक में वसंत भागवत ने गोपीनाथ मुंडे के रूप में महाराष्ट्र की राजनीति को एक ग्रामीण चेहरा दिया। शहरी छाप वाली भाजपा को ग्रामीण क्षेत्र में आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी वसंत भागवत ने नियोजित रूप से गोपीनाथ मुंडे को दी। जोखिम उठाने की आंतरिक क्षमता वाले गोपीनाथ मुंडे ने खेती, पानी, बांध और गन्ने की कटाई से संबंधित सभी समस्याएं कुशलता से हल की। किसानों के हक और फसलों के उपयुक्त दामों के लिए मोर्चे निकाले। गरीब, बहुजन वर्ग के किसानों के जीवन में भी आनंद हो, इसके लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहते थे। अत्यंत मेहनत के बाद उन्होंने भाजपा की ब्राम्हणों-पंडितों की पार्टी की प्रतिमा को बदला और ग्रामीण भाग में नेतृत्व निर्माण किया। जिस काल में महाराष्ट्र में कोई शरद पवार के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोलता था, उस समय गोपीनाथ मुंडे ने शरद पवार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। इस कृति के पीछे गोपीनाथ मुंडे की रणनीति कुछ विशेष थी। महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार काफी शक्तिशाली थे। मुंडे जानते थे कि बल स्थान पर प्रहार करना अर्थात मुख्य समस्या पर प्रहार करना। अत: शरद पवार के चंगुल से महाराष्ट्र को छु़डाने के लिए गोपीनाथ मुंडे ने शरद पवार के विरोध में आक्रामक होने की चाल चली। शरद पवार को लक्ष्य बनाकर उन्होंने भाजपा को सफलता दिलाई। सन 1990 के दशक में गोपीनाथ मुंडे ने शरद पवार पर आरोपों की झ़डी लगाकर उन्हें सत्ता से दूर करने का महत्वपूर्ण काम किया। शरद पवार के समाज विरोधी घटकों से कथित संबंध, जमीन से जु़डे विवादास्पद लेन-देन, राजनीति में बढ़ते गुनाहों पर प्रहार करते समय गोपीनाथ मुंडे ने कई ब़डे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को झुकाया। इसके लिए उन्होंने अनेक बार पूरा महाराष्ट्र मथ डाला। युद्ध में चलने वाली किसी तोप की तरह वे हमेशा ध़डध़डाते रहे। महाराष्ट्र में मुंडे नाम का बवंडर घूमने लगा। इसके कारण वे लोगों के बीच जुझारू और अन्याय के विरोध में ल़डने वाले नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। सन 1994 में उन्होंने संघर्ष यात्रा करके पूरे महाराष्ट्र का राजनैतिक वातावरण बदल दिया था। सन 1995 में महाराष्ट्र की कांग्रेस की सत्ता भाजपा-शिवसेना गठबंधन के हाथों में खींच लाने में गोपीनाथ मुंडे का बहुत ब़डा हाथ था।

आपातकाल के बाद दो सालों में ही जनता पार्टी की सरकार गई और इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का पुनरागमन हुआ। उस समय गोपीनाथ मुंडे राजनीति के प्रत्यक्ष पाठ पढ़ रहे थे। कुछ समय बाद इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर उठी। देश की तरह ही महाराष्ट्र में भी भाजपा कार्यकर्ता निराश हो चुके थे। ऐसे समय में भाजपा की जिम्मेदारी गोपीनाथ मुंडे पर आ गई। अपनी उम्र के केवल पैंतीसवें प़डाव पर उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार की। धूप-बारिश, दिन-रात की परवाह किए बगैर वे पूरा महाराष्ट्र घूमे। अनुसूचित जातियों में, बहुजन समाज में भाजपा के प्रति विश्वास निर्माण करने का कार्य उन्होंने किया। अतः बहुजन समाज की ओर से जितनी आत्मीयता गोपीनाथ मुंडे को मिली उतनी किसी और को नहीं मिली। शिवसेना के साथ इतने लंबे समय तक गठबंधन, गांव स्तर तक पहुंची पार्टी, पार्टी के समीप आए उद्योगपति, कार्यकर्ताओं का बढ़ा हुआ उत्साह तथा पार्टी का सकारात्मक रूप से बढ़ा स्वरूप इन सब के कारण सन 1995 में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बनी। इन सब का श्रेय महाजन-मुंडे की जोड़ी को देना पड़ेगा।

प्रदेशाध्यक्ष, नेता विपक्ष, उप मुख्ममंत्री, संसद के उपनेता और फिर ग्रामीण विकास मंत्री, गोपीनाथ मुंडे इस तरह एक-एक पद पर चढ़ते गए। इस यात्रा में उनके एक आह्वान पर लाखों कार्यकर्ता उनका साथ देते थे। उनके लिए मेहनत करते थे। उन्हें सफलता भी मिल रही थी। जिम्मेदारी निभाने की हिम्मत के कारण भाजपा में उनका कहा कोई टालता नहीं था। गोपीनाथ मुंडे का गृहमंत्री के रूप में किया गया कार्य विशेष उल्लेखनीय है।

सन 1990 से महाराष्ट्र में राजनैतिक आश्रय के कारण विभिन्न गुनहगार टोलियों ने आतंक मचा रखा था। इस दशा को परिवर्तित करने की चुनौती गृहमंत्री होने के नाते गोपीनाथ मुंडे के सामने थी। इस चुनौती का उन्होंने सफलता प्ाूर्वक समाधान किया। उन्होंने कई गुंडों को पकड़वाया तो कई पुलिस मुठभेड़ में मारे गए।

तेज़ तर्रार वक्तव्य, कड़ी मेहनत करने की तैयारी और किसी भी सीधे साधे कार्यकर्ता के गले में हाथ डालकर दिल खोलकर बातचीत करने के स्वाभाव के कारण मुंडे कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय थे। उनके बोलने में कोई आडंबर नहीं होता था। सीधी-सादी ग्रामीण भाषा में वे अपने विरोधियों को पटखनी देते थे। कोई भी कागज हाथ में लेकर गोपीनाथ मुंडे धारा प्रवाह भाषण करते थे। देखने-सुनने वालों को ऐसा लगता था कि उस कागज में बहुत सारी जानकारी है। परंतु असल में वह कागज कोरा ही होता था। वसंतराव भागवत गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन को भली भांति पहचानने वाले निर्देशक थे और वे दोनों कलाकार थे। वसंतराव भागवत ने उन्हें जो भूमिका दी, इन दोनों ने अच्छी तरह से निभाई। अतः जब मुंडे महाराष्ट्र के सामाजिक विषयों पर बोलते थे तो कोई उनका विरोध नहीं करता था। उनके विचारों को उनके सामाजिक कार्यों के कारण कृतिरूप मिला था। इन सबका श्रेय वसंतराव भागवत को जाता है। किसी कार्यकर्ता के गुणों को पहचानकर उसे सही दिशा देने वाले नेता आज बहुत कम दिखाई देते हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का मुद्दा उस समय ज्वलंत विषय था। गोपीनाथ मुंडे ने बाबा साहब आंबेडकर का बड़प्पन समाज को समझाया। मराठवाड़ा की जनता ने उसे समझा और स्वीकार किया, एक बड़ा संघर्ष होने से बच गया। यह गोपीनाथ मुंडे के द्वारा वसंत राव भागवत को दी गई गुरु दक्षिणा थी।

गोपीनाथ मुंडे के चारों ओर सतत कार्यकर्ताओं का जमावड़ा होता था। इसका कारण था उनका स्वभाव। अपना पद आदि भूलकर कार्यकर्ताओं की जरूरत के समय मदद का हाथ बढ़ाना, उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना उनके स्वाभाव में था। उसमें कभी भी कोई अंतर नहीं आया। मैं स्वयं का अनुभव यहां बताना आवश्यक समझता हूं। हिंदी विवेक के बोरीवली कार्यालय के उद्घाटन समारोह के समय मुंडे प्रमुख वक्ता के रूप में आमंत्रित थे। वे नियत समय से एक घंटा पूर्व ही कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गए थे। यह हम सभी के लिए आश्चर्यजनक था। तब उन्होंने ही कहा, ‘आप लोग चिंता न करें मैं ही जल्दी आया हूं। भाजपा का एक कार्यकर्ता और मेरा मित्र एड. विकास आगवेकर बीमार है। काफी दिनों से उससे बातचीत नहीं हुई। आज बोरीवली आया हूं तो उससे बात करने के लिए भी समय निकाल लिया। विकास का घर मुझे पता नहीं है। आप किसी ऐसे कार्यकर्ता को मेरे साथ भेजें जो उसका घर जनता हो। मैं विकास से मिलकर आता हूं।’ उनके इतना कहते ही हमने मिलिंद मराठे को उनके साथ भेजा। एड.विकास आगवेकर किडनी की बीमारी से ग्रसित थे। अत्यंत वेदना में दिन गुजार रहे विकास आगवेकर के जीवन में आनंद के कुछ पल गोपीनाथे मुंडे ने अनजाने ही डाल दिए। कुछ दिनों बाद विकास आगवेकर की मृत्यु हो गई। परंतु खुद गोपीनाथ मुंडे उनसे आकर मिले इस बात की ख़ुशी अंत तक उनकी बातों से जाहिर होती रही। बड़े पदों पर जाने के बाद सहकर्मियों को भूल जाने वाले लोग कदम-कदम पर मिलते हैं। गोपीनाथ मुंडे इसका अपवाद थे। वेदनामय और दुखी जीवन जीने वालों के चेहरे पर हास्य लाना आसान काम नहीं है। मैंने स्वयं उनको यह काम करते देखा है। प्रमोद महाजन की मृत्यु, उससे निर्माण हुआ गृह-कलह आदि के कारण उनके मन की अस्वस्थता उन्होंने कभी छुपाई नहीं। धीरे-धीरे उनके चहरे का स्मित खो गया था। विरोधी राजनैतिक पार्टियों ने घर के टुकड़े कर दिए, इस बात की नाराजगी भी उन्होंने व्यक्त की थी। परंतु कठिन प्रसंगों पर मात करते हुए उनका संघर्ष चल ही रहा था।

केवल आश्वासनों की भरमार का अर्थ राजनीति नहीं, वरन जनता के दुखों को कम करके उनके जीवन को गतिमान बनाने का अर्थ राजनीति है। इसके जानकार के रूप में ही गोपीनाथ मुंडे का परिचय था। उनका यही परिचय और रूप उनको लोकनेता बनाता था। स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र के सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र ने अनेक नेता देखे। परंतु लोक नेताओं की संख्या कम ही थी। यशवंतराव चव्हाण, शरद पावर, बाला साहब ठाकरे और गोपीनाथ मुंडे इतने ही नाम लिए जा सकते थे। हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में भाजपा को सफलता मिली है, इसका श्रेय गोपीनाथ मुंडे को ही जाता है। उन्होंने भाजपा-शिवसेना गठबंधन की ‘सोशल इंजीनियिरंग’ के नए समीकरण ढूंढें। गठबंधन के मतों का विभाजन होने से रोका। केंद्र की नई मोदी सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायत मंत्री पद को स्वीकार करते हुए उन्होंने न केवल महाराष्ट्र के बल्कि पूरे भारत के ग्राम विकास का स्वप्न देखा। ‘देश का विकास करने के लिए मैं महाराष्ट्र की राजनीति से देश की राजनीति में आया हूं। अब मुझे घर-घर तक विकास पहुंचाना है। इन शब्दों के साथ उन्होंने अपनी नई जिम्मेदारी की पहचान कराई थी।’ महाराष्ट्र के अविकसित क्षेत्र के इस जुझारू नेता ने महाराष्ट्र को नेतृत्व देने के लिए जो कष्ट सहे, वह सभी ने देखा है। अतः मुंडे की ग्रामीण विकास की कल्पना पर देश को विश्वास था। अपने प्रिय नेता के स्वप्नों को शुभकामनाएं देने के लिए पूरा मराठवाड़ा उनके जन्म स्थान परली पहुंचा था, तभी गोपीनाथ मुंडे की दुर्घटना में मृत्यु का समाचार नियति ने पूरे देश को दिया। महाराष्ट्र ने एक बेधड़क, आक्रामक और जुझारू नेता खो दिया। महाराष्ट्र के बहुजन समाज को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करने वाले गोपीनाथ मुंडे का महाराष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा। प्रस्थापित नेता की हेकड़ी उतारने की इच्छाशक्ति रखने वाले और पार्टी के हित के लिए अपार कष्ट सहने वाले नेता के स्मरण से कई कार्यकर्ता खड़े होंगे। विशाल ध्येय संकल्प के अधिष्ठान के बिना निरंतर अनेक वर्ष दॄढ प्रतिबद्धता और तन्मयता से अपना कार्य करते रहना आसान नहीं है। गोपीनाथ मुंडे ने असंभव बातें संभव कर दिखाईं। महाराष्ट्र के परिवर्तन और विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया। महाराष्ट्र इसे कभी नहीं भूल सकेगा। उनके जीवन कार्य से निर्मित प्रेरणा हजारों कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करेगी।

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