मुंडे का राजनैतिक उत्तराधिकार

मंगलवार, 3 जून को सुबह 7.45 बजे फोन आया कि गोपीनाथ मुंडे की दुर्घटना में…..। खबर किसी भूकंप की तरह थी। भूकंप कुछ क्षणों का ही होता है, परंतु उसके कारण धरती के ऊपर का विश्व उलट-पलट जाता है। गोपीनाथ मुंडे का अकस्मात निधन भी राजनैतिक भूकंप ही है। इसका परिणाम तुरंत न सही, पर भविष्य में जरूर होगा। महाराष्ट्र की सत्ता के समीकरण बदलने का सामर्थ्य गोपीनाथ मुंडे में था। उनकी मृत्यु के कारण अब इस राजनैतिक चौसर की नई बिसात बिछाई जाएगी। पिछले कई सालों में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, शिवसेना और भाजपा इन चार कोनों में महाराष्ट्र की राजनीति विभाजित है। अब नव निर्माण सेना पांचवां कोना निर्माण करने की कोशिश कर रही है, परंतु उसका महत्व उत्पात मचाने से अधिक नहीं बढ़ सका है। कांग्रेस के पीछे दिल्ली के गांधी घराने का बल है। पिछले कई सालों में महाराष्ट्र (विलासराव देशमुख को छो़डकर) स्वयं की ताकत का नेता ख़डा करने में असमर्थ रहा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस के पीछे भी शरद पवार के व्यक्तित्व का हाथ है। शिवसेना बाला साहब ठाकरे की विरासत लेकर ख़डी है। भाजपा की संस्कृति इन तीनों से अलग है। वह किसी भी एक वंश या व्यक्ति के बलबूते पर नहीं ख़डी है। फिर भी ऐसी परिस्थिति में महाजन और मुंडे ने स्वयं के कर्तृत्व के बल पर महाराष्ट्र की राजनीति में अपने व्यक्तित्व की छाप छो़डी और आपात काल के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में अपना स्थान बनाया । जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन व आपात काल ने केवल महाराष्ट्र ही नहीं, वरन संपूर्ण देश के राजनैतिक घटनाक्रम में क्रांतिकारी परिवर्तन किया था। इससे युवा नेतृत्व की एक पीढ़ी तैयार हुई। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार इत्यादि नेता उसी से आगे आए। इससे भी महत्वपूर्ण पहली बात यह थी कि विपक्ष में यह विश्वास पैदा हो गया कि कांग्रेस को हराया जा सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि विपक्ष की नई पीढ़ी की मानसिकता में मूलगामी परिवर्तन हुआ। आपात काल तक कांग्रेस ने व्यावहारिक राजनीति की और विपक्ष को सैद्धांतिक राजनीति करने का श्रेय दिया। आपात काल के बाद अन्य पार्टियों की नई पीढ़ी में यह विश्वास बना हुआ था कि सत्ता में आने के बाद हम भी कांग्रेस की व्यावहारिक राजनीति का मुंहतो़ड जवाब दे सकते हैं। इस नई पीढ़ी ने न केवल कांग्रेस को, बल्की अपनी पार्टी की पुरानी सैद्धांतिक राजनीति को भी व्यावहारिक राजनीति की दिशा दी। इससे एक नई राजनैतिक संस्कृति का निर्माण हुआ। इस संस्कृति पर भली-बुरी टिप्पणियां हुईं परंतु इसके कारण लोग अपने अधिकारों के प्रति जागृत हुए। अब वह स्थिति नहीं थी कि चाहे जैसी भी राजनीति की जाए लोग उसे पचा लेंगे।

महाराष्ट्र में प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे ने अपने कर्तृत्व के कारण इस नवीन राजनैतिक प्रवाह का नेतृत्व किया। निश्चित ही इसके पीछे वसंतराव भागवत की तपस्या और कर्तृत्व था। उन्हें इस नवीन परिवर्तन का अंदाजा था। प्रमोद महाजन की बुद्धिमत्ता, उनकी राजनैतिक क्षमता, राजनैतिक दांव-पेंच चलने की क्षमता को मुंडे जैसे लोकनेता का साथ मिला और कुछ विशिष्ट विभागों तक सीमित रहने वाला पूर्व का जनसंघ और अब भाजपा पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। इस परिवर्तन को श्री राम जन्मभूमि आंदोलन ने गति प्रदान की और गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व ने महाराष्ट्र को नया आयाम दिया।

महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के नेतृत्व की इतनी छाप थी कि दिल्ली के गांधी परिवार को भी उनसे डर लगता था। अत: दिल्ली का आधार लेकर शरद पवार के विरुद्ध राजनीति करना महाराष्ट्र के अंतर्गत सत्ता संगठन का एक भाग बन चुका था। इस पर मात करने के लिए शरद पवार ने पृष्ठभूमि को नजरअंदाज कर ऐसे लोगों को अभय देना शुरू कर दिया जो राजनैतिक दृष्टि से ताकतवर हैं। उन्हें अपने राजनैतिक पंखों का आसरा दिया। इसके परिणाम स्वरूप महाराष्ट्र में गुनाहों की संख्या बढ़ गई। दाउद इब्राहिम, पप्पू कलानी, ठाकुर जैसी प्रवृत्तियां प्रबल हो गईं। ऐसी परिस्थिति निर्माण हो गई थी कि मुंबई ‘माफिया सिटी’ कहलाने लगी। शरद पवार ने अपनी राजनैतिक कुशलता के कारण विपक्षी दलों के लोगों को भी अपना मित्र बना लिया था। महाराष्ट्र के अनेक पत्रकार, साहित्यकार, सांस्कृतिक क्षेत्र के अनेक मान्यवर लोग विभिन्न कारणों से उनके प्रेमपाश में बंधे थे। अत: विरोधी पार्टियों के नेता भी शरद पवार के सामने गूंगे बन जाते थे। महाराष्ट्र के गुनाह जगत की ज़डें कितनी गहरी थीं इसका अंदाजा सन 1993 में हुए बम धमाकों से लग चुका था। इस पार्श्वभूमि पर शरद पवार की राजनीति को चुनौती दे सके, ऐसे दमदार नेता की अवश्यकता थी। गोपीनाथ मुंडे ने यह कमी पूर्ण कर दी। प्रारंभ में वे अकेले ही यह ल़डाई ल़ड रहे थे। वे भले ही अकेले हों, परंतु वह लाखों लोगों के मनोभावों को व्यक्त कर रहे थे, इस बात की कल्पना महाराष्ट्र के नेताओं को तो क्या, स्वयं उनकी पार्टी के भी बहुतांश नेताओं को भी नहीं थी। जैसे-जैसे गोपीनाथ मुंडे का जनसमर्थन बढ़ने लगा, वैसे-वैसे उनकी पार्टी के लोगों को उन्हें संज्ञान में लेना प़डा। इसके बाद हुई संघर्ष यात्रा ने महाराष्ट्र का चेहरा ही बदल दिया। संघर्ष यात्रा ने महाराष्ट्र की राजनीति में मुंडे की छाप छो़डी। किसी आंदोलन के कारण नेतृत्व प्राप्त करने वाले और आंदोलन के खत्म होने पर नेतृत्व खोने वाले लोग राजनीति में बहुत मिलते हैं। परंतु गोपीनाथ मुंडे के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण था कि उन्होंने राजनीति में समाज के विभिन्न घटकों को सहभागी व सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनीति के बारे में जब बात होती है तो जातियों का उल्लेख टाला नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस की राजनीति लगभग मराठा जाति की राजनीति बन गई थी। अपरिहार्य रूप में अन्य जातियों को उनका थो़डा बहुत हिस्सा दे दिया जाता था। परंतु वे कभी भी सत्ता का अनुभव नहीं प्राप्त कर सके। शिवसेना ने ओबीसी और अन्य पिछ़डी जनजातियों के लिए राजनीति के दरवाजे खोल दिए। परंतु मुंडे ने उसका शास्त्रीय विस्तार किया। महाराष्ट्र की राजनीति की नींव व्यापक की। महाराष्ट्र में पिछले 15 सालों में भले ही भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार न हो, लेकिन बहुजन समाज की राजनीति के केंद्र मुंडे ही रहे। शरद पवार जिस वर्ग का राजनैतिक नेतृत्व कर रहे थे उसकी वैकल्पिक संस्कृति का नेतृत्व मुंडे कर रहे थे। अत: महाराष्ट्र की राजनीति में गोपीनाथ मुंडे का महत्व जितना शरद पवार समझ सकें उतना और कोई नहीं समझ सका। गोपीनाथ मुंडे की राजनैतिक यात्रा को खत्म करना शरद पवार और अजीत पवार दोनों का महत्वपूर्ण उद्देश्य था। इसके लिए उन्होंने गोपीनाथ मुंडे के रिश्तेदारों में मनमुटाव पैदा करने से लेकर जो भी कुछ संभव था, वह सब किया। इस बार के लोकसभा चुनावों में गोपीनाथ मुंडे को पराजित करने के लिए भी उन्होंने हर संभव कोशिश की। इतना सब करने के बावजूद भी चुनावों के जो परिणाम आए वे सभी को आश्चर्यचकित कर देने वाले थे। इन चुनाव परिणामों के कारण महाराष्ट्र की सत्ता का समीकरण बिलकुल बदल गया है। कांग्रेस तो अपने अस्तित्व की ल़डाई ल़ड रही है। शिवसेना के साथ ऐसा तो नहीं है, परंतु एक तरफ राज ठाकरे और दूसरी ओर अपना राजनैतिक संदर्भ, इन दोनों के बीच शिवसेना फंसी है। अत: यह निश्चित था कि शरद पवार का अस्तित्व और गोपीनाथ मुंडे के द्वारा उसे दी गई चुनौती के बीच ही आगामी विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। इस नाटक की शुरुवात होने से पहले ही गोपीनाथ मुंडे ने रंगमंच से एक्जिट कर ली।
लोकसभा के परिणाम जो भी हों, परंतु अभी भी महाराष्ट्र की स्थानीय संस्थाओं और राजनीति पर राष्ट्रवादी की मजबूत पक़ड है। इस पक़ड को बनाए रखने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस ने जिस राजकीय संस्कृति को संजोया है, उसमें दादागिरी, भ्रष्टाचार, जाति संघर्ष और समाज कंटकों का प्रमुख स्थान है। शरद पवार की बुद्धिमत्ता, राजनैतिक क्षमता, महाराष्ट्र की समस्याओं की जानकारी, यहां की राजनीति पर पक़ड इत्यादि वादातीत मुद्दे हैं। जिस संस्कृति का वे प्रतिनिधत्व करते हैं वह महाराष्ट्र को विनाश की कगार पर ले जाने वाली है। गोपीनाथ मुंडे इसी संस्कृति को चुनौती दे रहे थे। उनका स्वभाव, उनका जनसंपर्क, उनका वक्तृत्व, उनकी हाजिर जवाबी, अनेक लोगों को दी हुई मदद कई बार सामने आई है। अब महाराष्ट्र की राजनीति में यह प्रश्न ख़डा हो गया है कि जिस संस्कृति के विरोध में मुंडे ख़डे थे उस मुद्दे का सामना अब किस तरह किया जाए। उनकी मृत्यु महाराष्ट्र की राजनीति के लिए कुछ इस प्रकार है, जैसे ब़डे भूकंप के कारण कोई इमारत ढह जाती है। आपात काल के बाद के कालखंड में महाराष्ट्र पर प्रभाव डालने वाली त्रिमूर्ति में से अब बाला सहब ठाकरे और गोपीनाथ मुंडे काल के गाल में समा चुके हैं। आगामी चुनावों में राष्ट्रवादी कांग्रेस अपना प्रभाव टिकाए रखने के लिए, उसे बढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश करेगी, इसमें कोई शंका नहीं है। लोकसभा में आई मोदी लहर का ध्यान रखा भी जाए तो भी इस चौसर पर नेतृत्व का दूसरा केंद्र क्या होगा? मुंडे का राजनैतिक उत्तराधिकारी कौन होगा यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

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