समय रहते चेत गया हमारा देश

माइक्रो ब्लॉगिंग सोशल मीडिया साइट्स ने संवाद के स्थान पर अफवाह के तंत्र को मजबूत करने का काम किया है। देश को आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर बनाने वाले षड्यंत्रों का हिस्सा बनने का काम किया है। यह अच्छा हुआ कि हमारा देश समय रहते चेत गया है।

सीनेट कॉमर्स ऐंड जूडिशरी कमेटी ने मार्क जुकरबर्ग से दो साल पहले फेसबुक डाटा लीक पर सवाल पूछा था। फेसबुक अपने यूजर्स की जानकारी किस तरह इकट्ठा करता है और उसे किसके पास भेजता है, यह कैसे संभव है कि फेसबुक यूजर्स के डेटा से पैसा कमाता है और कहता है कि यूजर अपने डेटा का खुद ही मालिक है? क्या चीन और रूस के साथ फेसबुक डाटा शेयर करता है? कुछ इस तरह के सवाल उनसे पूछे गए थे। उनसे पूछा गया कि क्या फेसबुक को अपने यूजर के वैचारिक झुकाव की जानकारी होती है? क्या फेसबुक अपने उपभोक्ताओं की उत्तेजना बढ़ाने के लिए डोपामाइन फंक्शन पर विशेषज्ञों की मदद लेता है, ताकि उनके उपभोक्ता अधिक से अधिक समय फेसबुक पर बिताएं।

उसके बाद पूरी दुनिया ने देखा कि किस तरह सीनेट कॉमर्स ऐंड जूडिशरी कमेटी के सामने मार्क जुकरबर्ग ने माफी मांगी। जुकरबर्ग ने कमेटी के सामने कहा -“आज हमारे पास प्राइवेसी, सेफ्टी और डेमोक्रेसी को लेकर कई सारे गंभीर विषय हैं और मैं जानता हूं कि आपके पास मुझे लेकर कई मुश्किल सवाल हैं जिसका जवाब मुझे देना है कि हमने ऐसी तैयारी नहीं कि जिससे हम किसी भी माध्यम द्वारा डाटा के गलत इस्तेमाल को रोक सके। इसमें फेक न्यूज से लेकर विदेश में होने वाले चुनाव से लेकर हेट स्पीच और डाटा पायरेसी जैसे मुद्दे शामिल हैं। हमने अपनी जिम्मेवारी नहीं समझी और यह एक बड़ी गलती थी। ये मेरी गलती थी और मैं इसके लिए माफी मांगता हूं। फेसबुक की शुरूआत मैंने की थी, मैं इसे चलाता हूं और यहां जो कुछ भी होता है, उसकी जिम्मेवारी भी मेरी ही है। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने जो कुछ भी किया है, हम उसकी तह तक जाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें फिलहाल इस बात की जानकारी है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के करोड़ों यूजर्स से संबंधित जानकारी चुराने का अपराध किया है। जब हमने पहली बार कैम्ब्रिज एनालिटिका से संपर्क किया तो उन्होंने डाटा को डिलीट कर दिया है लेकिन एक महीने पहले ऐसी रिपोर्ट्स आईं कि वो सरासर गलत था।”

इस माफी के बाद भी सोशल मीडिया मंचों के रवैए में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया। वह दिन प्रतिदिन और शक्तिशाली होते जा रहे हैं। इतने शक्तिशाली कि सरकारों के निर्णयों को प्रभावित कर सकें।

देश के अंदर समानांतर बढ़ती ऐसी कोई भी विदेशी ताकत किसी देश की संप्रभुता के लिए खतरा हो सकती है। इस खतरे को सबसे पहले चीन ने समझा और ऐसे किसी भी सोशल मीडिया मंच को अपने देश में दाखिल ही नहीं होने दिया। उसने जरूर अपने लिए रेनरेन और पेंग यू जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म बनाए। ब्लॉगिंग के लिए उनके पास अपना टेनसेन्ट वायबो है। क्यू-क्यू का इस्तेमाल वाट्सएप की तरह होता है। यूट्यूब की तरह उनके पास यूक्यू है। चैटिंग के लिए उनके पास अपना वी चैट है। जिसके 10 करोड़ उपभोक्ता हैं। गूगल मैप की जगह वे जीपैंग का इस्तेमाल करते हैं। भारत ने वर्ष 2014 के बाद तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की दिशा में प्रयास करना प्रारंभ किया है। 2020 के बाद वह प्रयास कू एप और इसरो के मैप माइ इंडिया जैसे उदाहरणों के तौर पर कुछ क्षेत्रों में फलीभूत होता भी नजर आ रहा है।

मनमानी पर लगी लगाम

भारत में ट्विटर की मनमानी की वजह से देश में कई भ्रामक सूचनाएं फैल रही थीं। अफवाह फैलाने वालों को ट्विटर मंच मुहैया करा रहा था। किसान आंदोलन को लेकर फर्जी और भ्रामक सूचनाओं की तो सोशल मीडिया पर बाढ़ सी आई हुई थी, जिस पर भारत सरकार सख्त हुई। उसने ट्विटर को अफवाह फैलाने वाले अकाउंट को ब्लॉक करने का निर्देश दिया। खालिस्तान और पाकिस्तान से संबंधित 1178 अकाउंट की पहचान सरकार ने की। उसने ट्विटर को इन्हें बंद करने का आदेश दिया लेकिन ट्विटर ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इससे समाज के बीच यह संदेश गया कि टूलकिट प्रकरण में कहीं भारत के अंदर ट्विटर के अधिकारियों की मिलीभगत तो नहीं; क्योंकि किसान आंदोलन के माध्यम से जो हिंसा फैलाने की योजना थी, उसमें एक अहम योगदान ट्विटर से फैलने वाली अफवाहों का भी था।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को ट्विटर की मनमानी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना पड़ा। श्री प्रसाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा- ट्विटर को भारत के कानून के हिसाब से चलना होगा। सोशल मीडिया से अफवाह फैलाने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती है। चाहे वह ट्विटर हो, फेसबुक हो, चाहे वह लिंक्डइन हो या कोई हो या वाट्सएप  हो, मैं विनम्रता से आग्रह करूंगा कि भारत में आप काम करिए। आपके करोड़ों फॉलोअर्स हैं, हम उसका सम्मान करते हैं, पैसे कमाइए, लेकिन भारत के संविधान, भारतीय कानून का आपको हर हाल में पालन करना होगा, ऐसा नहीं करने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। हिंसा भड़काने और भ्रामक जानकारी फैलाने का किसी को अधिकार नहीं दिया जाएगा।

श्री प्रसाद के इस बयान के बाद ट्विटर ने विवादित अकाउंट्स को बंद कर दिया। अब भी कई सारे अकाउंट सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने में दिन रात लगे हुए हैं। ऐसे अकाउंटस से उपभोक्ता के नाते हम सबको सावधान रहना है और अपने आस-पास के मित्रों को सावधान रखना है। भारत सरकार की तरफ से ट्विटर से ’भड़काऊ कंटेंट’ से संबंधित पोस्ट करने वाले जिन अकाउंट्स को ब्लॉक करने की मांग की गई थी, वे सब ऐसे खाते थे, जो भारत विरोधी, किसान जनसंहार जैसे हैशटैग का इस्तेमाल कर रहे थे।

सोशल मीडिया मंचों के विरोधाभासी रवैए की चर्चा अब देश में आम आदमी भी कर रहा है। इसी का परिणाम है कि अब देश में माइक्रो ब्लॉगिंग के लिए स्वदेशी सोशल मीडिया एप की मांग तेजी से बढ़ी है।

सोशल मीडिया मंचों का विरोधाभासी रवैया

पिछले दिनों अमेरिकी संसद भवन में हुई हिंसा और भारत के अंदर दिल्ली के लाल किले में किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा के समय सोशल मीडिया मंचों की भूमिका विरोधाभासी रही। अमेरिका में हुई पुलिसिया कार्रवाई को जिन सोशल मीडिया मंचों पर समर्थन मिल रहा था, उन्हीं मंचों पर दूसरी तरफ लाल किले वाली घटना पर अलग रुख देखने को मिला। एक सी घटना पर दो अलग-अलग प्रतिक्रिया का क्या अर्थ निकाला जाए? कोई भी संप्रभुता सम्पन्न देश ऐसे दोहरे मापदंड को कैसे स्वीकार कर सकता है? विदेशी कंपनियां भारत में काम करें, पैसे कमाएं लेकिन साथ ही उन्हें भारत के संविधान और देश के कानूनों का भी पालन तो करना ही होगा।

इस संबंध में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का मानना है कि सरकार मीडिया की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही साथ देश में कानून व्यवस्था और सुरक्षा भी उसकी चिंता में समान रूप से शामिल है। देश का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है लेकिन अनुच्छेद 19 (2) में यह भी जिक्र है कि यह स्वतंत्रता देश की ’संप्रभुता और अखंडता’ को ध्यान में रखते हुए यथोचित रोक के अंतर्गत आती है।

 भारतीय भाषाओं के साथ कू एप है बाजार में

ट्विटर का भारत विरोधी रवैया उस पर भारी पड़ा क्योंकि बड़ी संख्या में ट्विटर को लोगों ने अपने मोबाइल से अन इंस्टॉल करना प्रारंभ कर दिया है। ट्विटर से लोगों की बेरुखी का सबसे अधिक लाभ कू एप को मिला। उसके डाउनलोड्स इस एक हफ्ते में ही 20 गुना बढ़ गए। उनकी वेबसाइट पर आने जाने वालों की संख्या 50 गुना बढ़ गई। कू एप माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट है। कू एप में ट्विटर की सारी सुविधाएं मौजूद हैं। एप ने कई नए फीचर भी जोड़े हैं। जो इसे ट्विटर से अलग बनाता है। ट्विटर के खराब रवैए की वजह से कई केंद्रीय मंत्री, भाजपा नेता, सेलेब्रिटीज समेत कुछ सरकारी विभाग भी कू एप पर नजर आने लगे। इतना ही नहीं, जिन्होंने कू एप को अपनाया, उन्होंने लोगों से अपील भी की कि लोग इस देशी ऐप को अपनाए।

कू ऐप मार्च 2020 में लॉन्च हुआ था। इसे बेंगलुरु की बॉम्बीनेट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड ने बनाया है। ऐप को भारत के ही युवा उद्यमी और निवेशक अप्रमेय राधाकृष्ण और मयंक बिद्वतका ने डिजाइन किया है। इस प्लेटफॉर्म पर 400 कैरेक्टर्स में अपनी बात रखी जा सकती है। एक मिनट का वीडियो या ऑडियो भी साझा कर सकते हैं। ये ऐप अंग्रेजी के साथ अभी कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मराठी और हिन्दी जैसी भारतीय भाषाओं में मौजूद है। आने वाले समय में कंपनी इसमें संस्कृत समेत अन्य 12 भारतीय भाषाओं को भी जोड़ने की तैयारी कर रही है।

ट्विटर के दो करोड़ में से अधिकांश उपभोक्ता अंग्रेजी वाले हैं। स्वदेशी कू एप को भारतीय भाषाओं में काम करने वाले उपभोक्ताओं के साथ अपना कारोबार आगे बढ़ाना है।

राहत देने वाली खबर

माइक्रो ब्लॉगिंग सोशल मीडिया साइट्स ने संवाद के स्थान पर अफवाह के तंत्र को मजबूत करने का काम किया है। देश को आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर बनाने वाले षड्यंत्रों का हिस्सा बनने का काम किया है। यह अच्छा हुआ कि हमारा देश समय रहते चेत गया है। अब सोशल के नाम पर एंटी सोशल गतिविधियों में लिप्त मीडिया साइटस पर लगाम लग रही है। यह खबर राहत देने वाली है।

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