होली के रंग बापू के संग

‘मुझे अपने आप पर  गुस्सा आने लगा कि मैंने गांधीजी को भारत की वास्तविकता बता दी। वे होली के रंग देखना चाहते थे, मैंने बदरंग दिखा दिए परन्तु मैं भी क्या करता?”

फागुन के महीने में आम के वृक्ष पर बौर क्या आ गया मेरा मन भी बौराने लगा। बौराया मन कुछ भी अंड-बंड सोचने लगता है। मैंने सोचा कि इस फागुनी बयार में होली के दिन गांधीजी से मुलाकात हो जाए तो कैसा रहे? वैसे आधुनिक पीढ़ी तो आज के गांधीवादी अन्ना जैसों को ही गांधी मानती है। गांधीजी भले ही आउटडेटेड हो गए उनके नाम का सिक्का आज भी चल रहा है। होली की रंगीनी के तरंग में इस तरह की बातें संभव तो हैं, पर वास्तव में  होती नहीं परन्तु गणित के सवाल की तरह माना कि गांधीजी मिल ही गए तो क्या होगा? लेकिन मान लिया कि आकर मेरे सामने खड़े हो गए। उनकी दुबली – पतली काया को देखकर पहले तो मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि बेकार है स्वर्ग में रहकर भी वेसे ही किडीकान्ट याने कृषकाय बने हुए हैं- कृष 1, 2, 3, या 4 नहीं बन सके।

उन्हें प्रणाम करके औपचारिकतावश उनसे आने का कारण पूछा, ‘बापू आप यहां कैसे’?

‘स्वर्ग में वैष्णव जन गाते-गाते आत्मा ऊब गई थी सोचा चलकर भारत में होली का आनंद लिया जाए’, गांधीजी बोले।

‘बापू आपके साथ कौन होली खेलेगा? इस पुरानी लंगोटी पर रंग कौन डालेगा, चोराहे के मुन्ना भाइयों ने पकड़कर जादू की झप्पी देकर एकाध पसली चटका दी तो गांधीगिरी के लायक भी नहीं रहोगे, फिर मैं जिम्मेदार नहीं।’

‘मैं होली खेलना नहीं देखना चाहता हूं’, गांधीजी उवाच।

‘आप भले न खेलो मुझे तो होली खेलना है। अभी तैयार होकर चलते हैं’, मैंने फटाफट जगह – जगह से फटी हुई नए फैशन की जींस और टी शर्ट पहन ली।

‘ये कौन से फटे कपड़े पहन लिए, होली के दिन तो सफेद कुर्ता पजामा पहनते हैं इस पर टेसू से बनाया रंग कितना खिलता है।’

‘बापू आजकल जींस पहनकर ही होली मनाते हैं। आपको मेरे साथ चलना हो तो चलो या फिर स्वर्ग लौटकर वैष्णव जन गाओ।’

गांधीजी को होली देखने की बाल सुलभ उत्सुकता थी इसलिए मेरे साथ चल दिए।

जैसे ही बाहर निकले चौराहे पर पन्द्रह से पच्चीस वर्ष के  झूमते युवाओं की टोली मिल गई। उन सबकी आंखें चढ़ी हुई थीं, सब मस्त थे और होली है का नारा बार-बार लगा कर गालियों से युक्त अलंकारिक भाषा का उपयोग करके जता रहे थे कि वाकई में आज होली ही है।

‘होली पर युवा शक्ति कितनी मस्त होती है, परंतु अमर्यादित भाषा का उपयोग क्यों कर रहे हैं?’

‘बापू यह होली की मस्ती और भाषा की शक्ति सब राष्ट्रीय पेय का कमाल है।”

“हमारा राष्ट्रीय पेय तो दूध है, हां कुछ लोग उस समय  चाय भी पीने लगे थे।”

“दूध नहीं बापू… आजकल हमारा राष्ट्रीय पेय मदिरा, शराब, वाइन हो गई है।”

‘इतनी कम उम्र में शराब पीने लगे?’

‘बापू आजकल शराब पीना राष्ट्रीय संस्कृति और शराब बनाना राष्ट्रीय उद्योग बन गया है।’ मैंने गांधीजी का हाथ पकड़कर आगे चलने का प्रयास किया। उनका हाथ धीरे- धीरे कांप रहा था। वे मुड़-मुड़ कर जिनके हाथों में भारत का भविष्य था उनकी ओर देख रहे थे।

अगले चौराहे पर कुछ लोग तरह-तरह के रंग के कपड़े अपने सर पर कफन की तरह बांधे हुए थे। सबके सर पर किसी न किसी रंग का कपड़ा बंधा था। सबके कपड़ों और हाथों पर लाल रंग लगा था।

‘देखो होली खेलने वालों के रंग सब कितने रंगीन लग रहे हैं…’, बापू खुश होकर बोले।

‘बापू इन पर होली का रंग नहीं खून लगा है, कोई नक्सलवाद की होली खेल रहा है, कोई धर्म की, कोई जातिवाद की, कोई आतंकवाद की और कोई अलगाववाद की होली खेल रहा है। इनके वादों के चक्कर में जो निर्दोष मारे गए हैं। उनका ही खून सबके हाथों और कपड़ों पर फैला हुआ है।’ गांधीजी से यह दृश्य देखा नहीं गया। वे तेजी से आगे बढ़ गए। उनकी आंखों में क्रोध का भाव था।

आगे चलने पर वी. आई. पी. लोगों का क्लब नजर आया। इस क्लब में बड़े संभ्रांत अधिकारी, बड़े व्यापारी, बड़े नेता, बड़े फिल्म स्टार जैसे समाज और राष्ट्र को चलाने वाले उच्च  प्रतिष्ठितों की भीड़ थी, जो होली खेलती नहीं दिखती थी। सत्ता के असली सूत्र इन्हीं अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के पास थे। सभी के चमकदार चेहरों पर काली गुलाल लगी थी। वे सब अपना काला मुंह न देखकर बड़ी सभ्यता से एक दूसरे को काले चेहरे वाला कह रहे थे।

‘इनके मुंह पर काली गुलाल किसने लगाई है और यह सब बहस क्यों कर रहे है?’ बापू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

‘बापू यहां से जल्दी निकल चलो वर्ना अपने मुंह पर भी भ्रष्टाचार की काली गुलाल लग जाएगी, यह संपन्न और प्रतिष्ठित तबका है। इनके यहां कोई कमी नहीं है परन्तु अगली सात पीढ़ियों की चिंता में बिना भ्रष्टाचार किए नहीं रह सकते। इन्हें दूसरों का ही काला मुंह दीखता है; लेकिन इनमे एकता बहुत है सुख-दुःख में एक दूसरे का साथ अवश्य देते हैं।’

हम दोनों बातें करते हुए एक विशाल और सुंदर आश्रम के सामने पहुंच गए। आश्रम का वातावरण बहुत रंगीन था। चारों तरफ रंग-बिरंगे साधु, साध्वियां घूम रहे थे। तभी आश्रम में हलचल तेज हो गई। विशाल द्वार के सामने कई विदेशी गाडियों की लाइन लग गई। सबसे मंहगी कार में से आश्रम के मुख्य संत बाहर निकले। उनके चेहरे पर मेकप का तेज था। चारों तरफ शांति छा गई। भक्त पैर छू रहे थे। धर्मभीरु भारतीय की तरह हम दोनों ने स्वाभाविक रूप से संतजी को हाथ जोडकर नमस्कार किया। उनके पास भी हम पहुंच नहीं सकते थे। संतजी हम जैसे तुच्छ भक्तों की ओर बिना दृष्टि डाले आगे बढ़ गए।

‘भारतीय संस्कृति के विस्तार में संतों-महात्माओं का बहुत योगदान है..’, गांधीजी ने संत की ओर देखते हुए कहा।

‘हां बापू, यह बहुत महान संत हैं बड़े-बड़े नेता, अधिकारी, इनके चरण छूते हैं। महल जैसा आश्रम है। लाखों शिष्य और शिष्याएं हैं। काले को सफेद और सफेद को काला कर सकते हैं। इनकी माया अपरम्पार है…’ मैंने सहमति व्यक्त करते हुए कहा।

‘क्या बहुत पहुंचे हुए हैं?’, गांधीजी ने उत्सुकता से पूछा।

‘पहुंचे हुए का तो मुझे पता नहीं लेकिन इनकी पहुंच बहुत है। भूलोक से लेकर स्वर्गलोक का कोई भी काम हो ये सब कर सकते हैं। आपका स्वर्ग में कोई काम अटका हो उसे भी करवा देंगे… बस अंटी में रुपया होना चाहिए।’

‘गांधीजी झल्लाकर बोले, जीते जी किसी सत्ताधारी से कोई काम नहीं कराया अब मर कर अपनी आत्मा को कलुषित क्यों करूं?’ हां इनकी शान-शौकत और तड़क-भड़क से आश्चर्यचकित अवश्य हूं।’

‘बापू आप भूल रहे हैं यह आपका जमाना नहीं है। आपने तो एक लंगोटी से काम चला लिया। आज ऐसे घूमते तो कोई पूछता नहीं। पांच रूपये भी दान में नहीं मिलते। इनको देखो भक्त इन्हें लाखों रूपये भेंट करते हैं इसलिए भक्त भी लाखों में हैं। संत हैं तो क्या हुआ भक्तों को प्रभावित करने के लिए यह सब करना पड़ता है।’

बापू वितृष्णा से बोले, ‘तब ये बड़े – बड़े आश्रम क्यों बना रखे हैं? दुकान खोल लेते…।’

‘आश्रम भी एक तरह की दुकान ही है बापू , ग्राहक आते हैं, रूपये देकर आत्मिक शांति ले जाते हैं ।’ गांधीजी गुस्से में तेजी से आगे बढ़ गए।

बहुत दूर जाने पर पांच सितारा होटल जैसा बहु मंजिला महल नुमा मंदिर दिखा। वहां से भजन, आरती, श्लोकों, प्रार्थनाओ की आवाजें आ रही थीं। मंदिर देखकर गांधीजी पूरी श्रद्धा से कहने लगे, ‘चलो मंदिर में भगवान के दर्शन कर लें।’

‘बापू आप वहां मत जाइए… ये मंदिर नहीं है।’ मैंने उन्हें टालते हुए कहा।

‘आज की पीढ़ी तो बिलकुल नास्तिक हो गई है…’ गांधीजी नाराज होकर मेरा हाथ पकड़कर खींचते हुए मुझे अंदर ले गए। मंदिर के गर्भगृह में एक चमचमाती कुर्सी रखी हुई थी। भक्त उसकी पूजा कर रहे थे, आरती उतार रहे थे, राग दरबारी में भजन गा रहे थे, कुछ भक्त कुर्सी चालीसा का पाठ कर रहे थे, तो कोई मक्खन की भेंट चढ़ा रहा था। यह सब देखकर गांधीजी भौचक्के होकर कहने लगे, ‘यह कैसा मंदिर है… भगवान की मूर्ति के स्थान पर कुर्सी रखी है।’

उनके आश्चर्य को दूर करते हुए मैंने कहा, ‘बापू आज का असली भगवान यही कुर्सी है। जिस पर यह प्रसन्न हो जाए उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और  इस लोक में संपूर्ण सुख भोगकर परलोक जाता है।’ मंदिर के प्रांगण में बहुत सारे भक्त तरल पदार्थ को चरणामृत की तरह घूंट लगाकर पी रहे थे।

गांधीजी मुस्कुराते हुए कहने लगे, ‘भारत में होली की कल्पना भांग के बिना पूरी नहीं हो सकती।’ मैंने फिर से उन्हें टोकते हुए कहा, ‘बापू आप फिर गलती कर रहे हैं। ये भांग नहीं घोटाले के घूंट और सत्ता की शराब पीकर मदमस्त हो रहे हैं।’

गांधीजी ने ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘धन्य हैं आज का भारत और भारत की जनता।’ गांधीजी की उदासी बढ़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि मेरी कल्पना के बापू भी जल्दी से जल्दी इस धर्म क्षेत्र से विदा होना चाहते थे। मुझे अपने आप पर गुस्सा आने लगा कि काल्पनिक गांधीजी को भी भारत की वास्तविकता बता दी। वे होली के रंग देखना चाहते थे। मैंने बदरंग दिखा दिए परन्तु मैं भी क्या करता? यही तो एक त्यौहार है जिसमें कोई कुछ नहीं छुपा सकता। सबके असली रंग सामने आ जाते हैं। वर्ना चेहरों पर लगे मुखौटों से इन्हें कौन पहचान सकता है? काल्पनिक गांधीजी धीरे – धीरे अनंत आकाश में विलीन होने लगे। मैं हतप्रभ सा देश के राजमार्ग के चौराहे खड़ा था। तभी मेरे चेहरे पर रंग के छींटें पड़ने लगे, मैं अपनी कल्पनाओं से बाहर आ गया। सामने देखा तो एक पांच-सात साल की छोटी सी बच्ची अपनी पिचकारी से मेरे ऊपर रंग डाल रही थी और हंसते हुए चिल्लाकर कह रही थी, होली है अंकल, होली है… मैंने उसे गोद में उठाकर चूमकर कहा, ‘हां बेटा, आज होली है। तुमने मुझ पर सबसे अच्छा रंग डाला है।’

 

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