महिला दिवस: एक दिन का सम्मान और फिर दासी!

भारत को एक पुरुष प्रधान देश के रुप में देखा गया है। सदियों से यहां पुरुष बाहरी काम काज देखते है और महिलाओं को घर के अंदर के काम की जिम्मेदारी गयी है हालांकि कुछ वीर महिलाओं के उदाहरण इतिहास में मौजूद है जिन्होने पुरुषों से भी बढ़ कर काम किया है लेकिन बावजूद इसके महिलाओं को पर्दे में रखने की प्रथा चली आ रही है लेकिन यह प्रथा अब धीरे धीरे खत्म होती जा रही है क्योंकि महिलाएं अब चूल्हे से चांद तक जा पहुंची है। अभी तक ऐसी मान्यता थी कि महिलाओं की जगह सिर्फ रसोई में है और उनका काम भोजन पकाना और बच्चों को संभालना है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश की महिलाओं ने इस अवधारणा को तोड़ने में सफलता पाई है। नए भारत की नई तस्वीर गढ़ रही ये महिलाएं न केवल गृह विज्ञान में निपुण हैं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान पर भी इनकी उतनी ही मजबूती है। आज की महिलाएं अपने घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियां संभालने के साथ ही अपनी नौकरी और पेशों के उत्तरदायित्वों को भी बेहतरीन तरीके से सम्भालने में सक्षम हैं। आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र अछूता होगा जहां महिलाओ ने अपनी उपस्थिति दर्ज ना हो। आकाश से लेकर पाताल और धरती से लेकर समुद्र तक हर जगह उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी है।

महिलाओं के दायित्व को बताने और उन्हे प्रेरित करने के लिए महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिवस महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 1914 से इस दिन को मनाने की शुरुआत हुई है और तब से लेकर आज तक यह पूरे विश्व में जोश और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। महिला दिवस के दिन लोगों में महिलाओं के लिए सम्मान का भाव उमड़ पड़ता है। महिलाओं को लिए सरकार ने भी तमाम रास्ते खोल दिये है जिससे वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन सकें और किसी के दबाव में जिंदगी ना गुजारनी पड़े लेकिन यह उनका दुर्भाग्य ही होगा कि वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने के बाद भी किसी ना किसी पुरुष पर निर्भर रहती है। कुछ महिलाएं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं फिर भी वह मानसिक रूप से किसी ना किसी पुरुष पर निर्भर हैं, फिर चाहे वह उनका भाई, पिता, पति या पार्टनर हों। सरकार ने महिलाओं को पुरुषों की बराबरी का दर्जा तो दिया है लेकिन समाज में अभी वह दर्ज महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है क्योंकि समाज अभी मानसिक रुप से इसके लिए तैयार नही है।

एक आकड़ा अक्सर हमे सुनने को मिलता है कि देश में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कम है और यही वजह है कि तमाम पुरुषों की शादी ही नहीं हो पा रही है बावजूद इसके अभी भी लोग बेटी नहीं पैदा करना चाहते है और डाक्टरों की मदद से बेटी को पेट में ही मार दिया जा रहा है। हमारी सरकार महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए कई सारी योजनाएं चला रही हैं, जैसे कि- बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, महिला किसान सशक्तिकरण योजना, नारी-उत्थान योजना आदि। बावजूद इसके महिलाओं की स्थिति में आज भी अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आ रहा है। यह सभी को पता है कि आज के समय में बेटियांं बेटो से कम नहीं है सरकारी नौकरी से लेकर प्राइवेट जॉब में सब जगह महिलाओं का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है सरकार ने भी तमाम क्षेत्रों में महिलाओं के लिए दरवाजे खोल दिये है जिसमें सेना, कमांडों जैसे खतरनाक पोस्ट है लेकिन इसको मानसिकता ही कहेंगे कि बेटी को संसार में लाने से लोग डर रहे है।

महिला दिवस के दिन लोगों के दिलों में महिलाओं के लिए सोशल मिडिया पर बहुत प्यार देखने को मिलता है लेकिन दुर्भाग्यवश जब अगली सुबह अखबार में फिर से एक दुराचार की घटना सुनने को मिलती है तो दिल कांप जाता है और यह सवाल करता है कि क्या महिलाओं का सम्मान सिर्फ एक दिन के लिए ही था। महिला दिवस के दिन व्हाट्सएप्प, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उसके लिए दिल छू जाने वाले मैसेज से भर जाते हैं। अखबारों और टीवी चैनलों में उसकी उपलब्धियों की गाथाओं को भरपूर जगह दी जाती है। लोग महिलाओं की तुलना देवी दुर्गा के रूप में करते हैं। लेकिन अगली सुबह उसी दुर्गा को अपने हाथ की कठपुतली बना दिया जाता है।

अगले दिन फिर से औरत को उसी दुनिया में वापस लौटा दिया जाता है जिसमें उसे हर कदम पर खुद को साबित करने का संघर्ष करना पड़ता है। उसे घर और बाहर दोनों जगह अपनी आबरू बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। घर-परिवार, बच्चे और ऑफिस आदि की टेंशन में उसका पूरा दिन गुजर जाता है। एक बार फिर से न्यूज़ चैनल और अख़बार महिलाओं के प्रति अलग-अलग प्रकार की प्रताड़नाओं की खबरों से भर जाते हैं। पिछले कुछ सालों में तो कई महिलाओं के साथ ऐसे गंभीर अपराध हुए हैं, जिनके बारे में सोच कर भी रूह कांप उठती है। समाज के कुछ ठेकेदार ऐसे दुराचार के लिए महिलाओं को ही दोष देते है।

अगर समाज में समानता लानी है तो महिलाओ एवं पुरुषों को एक दूसरे से हाथ मिलाना होगा। हमें यह बात समझनी होगी कि एक दूसरे के विरुद्ध खड़े होकर हम सिर्फ संसार के विकास और प्रकृति के संरक्षण में बाधक बन रहे हैं। एक दूसरे को अपमानित करके या कमतर दर्शाकर हम सिर्फ अपने समाज, अपनी दुनिया को कमजोर कर रहे हैं। अगर समाज को आगे बढ़ाना है तो पुरुष और स्त्री को बराबर चलना होगा इससे ना सिर्फ समाज में दोनों का अस्तित्व बराबर का होगा बल्कि एक दूसरे के साथ चलने से घर, समाज और देश भी आगे बढ़ेगा।

आपकी प्रतिक्रिया...