आसान होगा मृतको से वार्तालाप

   ‘योग वशिष्ठ’ में तो ब्रह्माण्ड के स्तरों को मनुष्य की अंतर्चेतना की परतों से जोड़कर राजा पद्म और रानी लीलावती की अत्यंत रोचक कहानी है। इसमें वशिष्ठ ने सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म और भौतिक-अभौतिक शरीरों की लौकिक एवं पारलौकिक यात्राएं करते हुए मन की अनंत इच्छाओं के अनुसार जीवन की अनवरत यात्रा, मनुष्येतर योनियों में भ्रमण और समय तथा स्थान में निर्मित भ्रमण में चेतना के अभ्यृदय, अस्तित्व और प्राण विद्या के गूढ़ रहस्यों को प्रकट किया है।     

माइक्रोसॉफ्ट ने खबर दी है कि उसने ‘चैटबॉट’ नामक एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया है, जो दिवंगतों से वार्तालाप का अनुभव कराएगा। दिसंबर-2020 में इसका पेटेंट भी करा लिया है। इस वार्तालाप का विचार अमेरिका की चर्चित टीवी श्रृंखला ‘ब्लैक मिरर’ से लिया है। इसमें मनुष्य की भूमिका निभा रही लड़की अपने दुर्घटना में मृत प्रेमी से उसके सोशल मीडिया खाते से निकाले गए संवाद व सूचनाओं के आधार पर बात करती है। यानी चैटबॉट एक ऐसा अद्वितीय सॉफ्टवेयर है, जिसके माध्यम से सैद्धांतिक तौर पर मरे लोगों से वार्तालाप संभव है। इसके बाद जीनियॉलजी या वंशावली वेबसाइट माईहेरिटेज ने एक ऐसा टूल बनाया है, जो कृत्रिम बौद्धिकता के जरिए दिवंगत रिश्तेदारों व मित्रों की तस्वीरों में चेहरों को ऐनिमेट करके मृतक के जिंदा होने का भ्रम पैदा करता है। इसमें एक विशेष प्रकार की डीपफेक तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस टूल को डीप नॉस्टेल्जिया नाम दिया गया है। कंपनी मानती है कि कुछ लोग इस फीचर को सनसनी पैदा करने वाली स्थिति मान सकते है। जबकि अन्य लोग इसे जादुई करिशमा कहेंगे। हालांकि मृतकों से मुलाकात व वार्तालाप के प्रसंग हमें योग वशिष्ठ, रामायण और महाभारत में भी मिलते हैं।

             माइक्रोसॉफ्ट तकनीक के जरिए दिवगंत व्यक्ति से बात करने या सलाह लेने के लिए संबंधित का जो भी सोशल डेटा, संवाद, चित्र, संदेश, आवाज, पत्र आदि हैं, उनके आधार पर चैटबॉट उनका व्यक्तित्व आत्मसात कर लेगा। तत्पश्चात प्रश्नोत्तर उसी श्ौली में आरंभ हो जाएंगे, जैसा आप मृतक से जीवित अवस्था में करते रहे हैं। इस वार्तालाप की भाषा, बोली और संवेदनाएं हुबहू वैसी ही अनुभव होंगी, जैसी मृतक के जीवित रहते हुए होती थीं। कुछ संचार उपकरणों का उपयोग कर दिवगंत लोगों को 2-डी व 3-डी आयामों में देख भी सकते हैं। 3-डी छवि के साथ फेशियल रिकग्निशन एल्गोरिदम के प्रयोग मृतक की छवि को जीवंत अहसास के रूप में भी उभार देंगे। इस विधि से ऐसा अनुभव होगा कि जीवित व्यक्ति से ही वार्तालाप हो रहा है। माइक्रोसॉफ्ट के कृत्रिम बौद्धिकता कार्यक्रम से जुड़े अभियंताओं ने चैटबॉट का सूत्र टीवी श्रृंखला ‘ब्लैक मिरर’ से लिया और कल्पना को आविष्कार के परिणाम में बदला।

                डीपफेक तकनीक के जरिए सामान्य रूप से पूछे जाने वाले सवालों के जबाव में कंपनी ने लिखा है, ‘यह टूल पुराने वक्त की यादों के लिए इस्तेमाल करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसके नतीजों पर विवाद हो सकता है इसे कुछ लोग नापसंद करेंगे, किंतु इसको नकार पाना मुश्किल होगा।’ माइ हेरिटेज साइट पर रानी विक्टोरिया और फ्लोरेंस नाइटिंगेल जैसी ऐतिहासिक सख्सियतों को एनिमेट किया गया है। इसी तकनीक से एक अन्य सॉफ्टवेयर कंपनी ने अब्राहम लिंकन का वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डाला था। यह वीडियो रंगीन है और इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति लिंकन बोलते हुए दिख रहे हैं। कुछ अन्य लोगों ने भी अपने पूर्वजों के एनिमेटेट वीडियो सोशल साइटों पर डालने शुरू कर दिए हैं। कुछ लोग जहां मृतकों में जीवित होने का भ्रम पैदा करने की तकनीक को शानदार उपलब्धि मान रहे हैं, वहीं कुछ लोग इसे चिंता का विषय भी मानकर चल रहे हैं। दरअसल दिसंबर 2020 में चैनल 4 ने एक डीपफेक क्वीन तैयार की जिसने एक वैकल्पिक क्रिसमस संदेश दिया। इसके जरिए यह चेतावनी दी गई कि किस तरह से इस तकनीक का प्रयोग झूठी खबरें फैलाने के लिए हो रहा है।

अब महाभारत में उल्लेखित इसी प्रसंग की बात करते हैं। कुरुक्षेत्र में कौरव-पाण्डवों के बीच हुए युद्ध के सोलह वर्ष बाद भी चित्त को शांति नहीं मिली तो गांधारी व कुंती श्वशुर वेदव्यास से प्रार्थना करती हैं कि ‘आप अपने तपोबल से लोकों की सृष्टि करने में समर्थ हैं, इसलिए परलोक सिधारे हमारे पुत्रों व प्रियजनों से मिलाने की कृपा करें।’ कुंती की प्रबल इच्छा अपने उस अभागे पुत्र कर्ण से मिलने की थी, जिसे वह सार्वजनिक रूप से अवैध संतान होने के कारण पहचान लेने के बाद भी स्वीकार नहीं पाई थी।

                वेदव्यास इस प्रार्थना को स्वीकार लेते हैं और गंगा नदी में प्रवेश कर महाभारत युद्ध के सभी पराक्रमियों का आवाहन करते हैं। देखते-देखते मारे गए कौरव-पाण्डव सैनिकों सहित कोलाहल करते हुए प्रकट होने लगते हैं। देखते-देखते कर्ण, द्रोपदी के पांचों पुत्र, अभिमन्यु, घटोत्टकच, दुर्योधन, शकुनि, दुःशासन आदि आपसी वैर, इष्र्या, क्रोध व आवेग से मुक्त अपने जीवित परिजनों के समक्ष साक्षात खड़े थे। महाभारत के आश्रमवासिक पर्व के पुत्रदर्शन प्रसंग के श्लोक 20 में उल्लेख है कि ‘नर-नारियों से भरा हुआ यह हर्ष-उत्सव कपड़े पर अंकित किए चित्र की भांति दिखाई दे रहा था।’ फिर इसी पर्व के तैंतीसवें अध्याय में श्लोक एक एवं दो में उल्लेख है, ‘श्रेष्ठ पुरुष ऋृषियों की बनाई हुई उत्तम प्रणाली का आश्रय लेकर एक-दूसरे से प्रेम-पूर्वक मिले।’ आगे इसी विधि से व्यास ने राजा जनमेजय को पिता परीक्षित से भी मिलाया। महाभारत के इसी पर्व के एक मंत्र ‘सूर्यः ते चक्षुः वांतं प्राणः’ कहा है कि मृत्यु के बाद नेत्र सूर्य को और प्राण वायु को प्राप्त हो जाते हैं। अर्थात देहधारियों के प्राण एवं इंद्रियां निश्चित रूप से हमेशा के लिए लोकांतर में जीवित बनी रहती हैं। अतएव दिवगंतों को उसी रूप में वर्तमान में प्रकट किया जाना असंभव नहीं है। इसी तरह रामायण में राम जब वनवास से लौटकर अयोध्या आते हैं तब ऋृषि-मुनियों के साथ पिता दशरथ उन्हें अशीर्वाद देने प्रगट होते है।

 ‘योग वशिष्ठ’ में तो ब्रह्माण्ड के स्तरों को मनुष्य की अंतर्चेतना की परतों से जोड़कर राजा पद्म और रानी लीलावती की अत्यंत रोचक कहानी है। इसमें वशिष्ठ ने सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म और भौतिक-अभौतिक शरीरों की लौकिक एवं पारलौकिक यात्राएं करते हुए मन की अनंत इच्छाओं के अनुसार जीवन की अनवरत यात्रा, मनुष्येतर योनियों में भ्रमण और समय तथा स्थान में निर्मित भ्रमण में चेतना के अभ्यृदय, अस्तित्व और प्राण विद्या के गूढ़ रहस्यों को प्रकट किया है। भगवान बुद्ध का दर्शन ‘विपश्यना’ भी कुछ योग वशिष्ट के दर्शन के समान है। विपश्यना अध्यात्म का यर्थाथवाद है। यहां न आत्मा है और न ही ईश्वर है। बुद्ध कहते है कि अमूर्त आध्यात्कि ज्ञान व्यर्थ की चीज है। ज्ञान तो वहीं सत्य है, जिसे भौतिक रूप में अनुभव किया जा सके, जो हमारी दे हके भीतर घटित हो और जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग भी किया जा सके। इसीलिए विपश्यना का अर्थ है कि स्वयं को विशेष विधि से देखना। खुद को अवलोकित करने का ऐसा तरीका है, जो विकल्पहीन और निरपेक्ष है। यहां दृष्टा होनी है, वह बस खुद को देखता है। इस क्रिया से पहले स्थूल वेदनाएं-संवेदनाएं पकड़ में आती है और फिर धीरे-धीरे सूक्ष्म संवेदनाओं का अनुभव होने लगता है। आध्यात्मिक इतिहास की यह पद्धति अत्यंत प्राचीन है। बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले ध्यान की प्रचलित प्रणालियों से असंतुष्ट होकर इस विलुप्त होती पद्धति को खोजकर अपनाया था। जब कुशीनारा में बुद्ध प्राण छोड़ रहे थे, तब एक व्यक्ति को उन्होंने इस पद्धति की दीक्षा भी दी थी।

इन संदर्भों से स्पष्ट है कि रामायण और महाभारत काल में कोई ऐसी तकनीकें जरूर थीं, जो दिवगंतों से चैटबॉट की तरह वार्तालाप में समर्थ थीं। लेकिन हमारे वैज्ञानिक-अभियंता अपने प्राचीन ग्रंथों से ऐसे विज्ञान-सम्मत आइडिया लेने में सकुचाते हैं, इसलिए हम अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर मौलिक सॉफ्टवेयर बनाने में आगे नहीं आ पाए हैं। दरअसल इस बौद्धिक युग में वैज्ञानिकों के समक्ष विडंबना है कि वे आसानी से यह स्वीकारने को तैयार नहीं हैं कि सनातन हिंदू धर्म के प्राचीन ऋृषि-मुनि समय, स्थान, ब्रह्मण, समानांतर ब्रह्मण आदि के रहस्यों को जानते थे। दरअसल वर्तमान वैज्ञानिक इन तथ्यों को स्वीकार लेते है तो विज्ञान संबंधी उपलब्धियों की मान्यताएं हजारों साल पीछे चली जाएंगी। नतीजतन वर्तमान वैज्ञानिकों के प्रकृति एवं ब्रह्माण से संबंधित अनुसंधान गौण हो जाएंंगे।

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