चिपको आंदोलन: जब लोगों ने पेड़ों को लगाया गले

पेड़ लोगों के लिए कितने महत्तवपूर्ण है यह शायद सभी को पता है लेकिन बावजूद इसके भी पेड़ों की कटाई तेजी से हो रही है हालांकि सरकार की तरफ से इसके बदले कुछ पेड़ लगाए भी जा रहे है लेकिन वह काफी नहीं है। पूरी दुनिया में डेवलपमेंट के नाम पर बड़ी बड़ी इमारतें, पुल, मेट्रो मॉल बनाए जा रहे है लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा हरे पेड़ो का बलिदान हो रहा है। तमाम कंपनियां विकास के नाम पर खुद का जेब गरम कर रही है, सरकार भी वोट बैंक की राजनीति के चलते कंक्रीट का जंगल तेजी से तैयार कर रही है और लोगों को भी यह कंक्रीट का जंगल पसंद आ रहा है लेकिन शायद यह लोग भूल रहे है कि अगर पेड़ों की कटाई इसी गति से होती रही तो आने वाला समय बहुत ही दर्दनाक हो सकता है।

हालांकि यह कोई पहली बार पेड़ों की कटाई नहीं हो रही है यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। भारतीय संविधान में वन संरक्षण को लेकर कई नियम और कानून बने हैं लेकिन वह सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गये है। अलग अलग शहरों में डेवलपमेंट के नाम पर वन काटे जा रहे है हालांकि कुछ जगहों पर इसका विरोध हो रहा है लेकिन वह पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता है। इतिहास में वन कटाई को रोकने के लिए चिपको आंदोलन भी हुआ था जो आज भी जाना जाता है।

सन 1973 में उत्तर प्रदेश के चमोली गांव में पेड़ों की कटाई अंधाधुंध तरीके से शुरु हो गयी, विकास के नाम पर पेड़ों को काटा जाने लगा और सभी से यह कहा गया कि अब यहां फैक्ट्रियां लगेंगी और सभी को रोजगार मिलेगा। साफ शब्दों में कहे तो हरे भरे वन काट कर वहां कंक्रीट का वन तैयार करने की तैयारी चल रही थी। वन की कटाई भी तेजी से हो रही थी जिससे आस-पास के लोग परेशान और हैरान दोनों थे लेकिन उन्हे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि इसको किस तरह से रोका जा सके।

चंडी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा ने इसको रोकने का बीड़ा उठाया और गांव वालों को इकट्ठा कर पेड़ो से चिपकने के लिए कहा, गांव वालों ने पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपकना शुरु कर दिया जिससे पेड़ों की कटाई बंद हो गयी। इस आंदोलन को चिपको आंदोलन का नाम दिया गया। इस आंदोलन में महिलाओं ने भी जमकर हिस्सा लिया। चिपको आंदोलन जब हुआ तक वह उत्तर प्रदेश का हिस्सा था लेकिन बंटवारे के बाद अब यह उत्तराखंड का हिस्सा हो चुका है।

चिपको आंदोलन के दौरान महिलाएं और पुरुष पेड़ों से चिपक जा रहे थे जिससे ठेकेदार पेड़ नहीं काट पा रहे थे। चिपको आंदोलन को लोगों ने बहुत ही महत्व दिया जिससे पेड़ों को बचाने के लिए बहुत ही बड़ी संख्या में लोग जंगलों में पहुंचने लगे। आंदोलन की गंभीरता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि एक पेड़ को बचाने के लिए उससे चारो तरफ 5 से 6 लोग खड़े होते थे और पूरे जंगल का नजारा भी कुछ ऐसा ही था यानी कि हजारों की संख्या में लोग वहां पहुंचे थे और पेड़ों को बचा रहे थे।

चिपको आंदोलन ने जब जोर पकड़ा तो यह मुद्दा दिल्ली तक पहुंच गया और सरकार भी पर्यावरण पर चर्चा करने लगी। दिल्ली के दोनों सदनों में भी पर्यावरण का मुद्दा गंभीर होता गया और सरकार को भी इस पर अपना रुख स्पष्ट करना पड़ा। आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए सरकार को इस पर वन संरक्षण अधिनियम बनाना पड़ा। यह अधिनियम वन और पर्यावरण की रक्षा करने का आदेश देता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन के दौरान उत्तराखंड सहित हिमालयी क्षेत्रों में वनों की कटाई पर 15 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया और इसका पालन ना करने वालों पर कड़ी कार्रवाई का नियम बनाया गया।

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