क्या धोखेबाजी से बाज आएगा पाकिस्तान?

भारत-पाकिस्तान के बीच फिर एक बार संघर्ष विराम समझौता हुआ है और चीन भारत के बीच भी सीमा पर शांति समझौता हुआ है। लेकिन यह कितने दिन चलेगा, यह आशंका सदा बनी रहेगी क्योंकि, पीठ में खंजर घोंपने की चीन-पाकिस्तान की पुरानी आदत है इसलिए समझौते के बाद भी भारत को अधिक चौकन्ना रहने की आवश्यकता है।

बीते कई सालों से भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर तनाव बना हुआ है, लेकिन 25 फरवरी को एक बार फिर दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच हुई बातचीत के बाद संघर्ष विराम पर नए सिरे से सहमति बनी है। अब दोनों देश नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी नहीं करने को राजी हो गए हैं। दोनों देश वर्ष 2003 में हुए संघर्ष विराम समझौते को पूरी सख्ती से लागू करेंगे। ये समझौता, दक्षिण-पूर्व एशिया ही नहीं बल्कि एशिया पैसेफिक के लिए बड़ी बात है। हालांकि सबके मन में सवाल यही उठ रहा होगा कि पठानकोट, उरी, पुलवामा हमले के बाद भारतीय सेना की ओर से हुई जवाबी कार्रवाई (बालाकोर्ट एयर स्ट्राइक) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सख्ती के बावजूद सहमति कैसे बन गई?

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच सहमति के संकेत तभी मिलने शुरू हो गए थे, जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने 2 फरवरी को भारत के साथ शांति का राग छेड़ दिया था। जनरल बाजवा ने कहा था कि पाकिस्तान और भारत को कश्मीर मुद्दे को गरिमापूर्ण और शांतिपूर्ण तरीके से हल करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद से जम्मू और कश्मीर में सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन में कमी आई है। वहीं, फरवरी में ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मंत्री इमरान खान श्रीलंका के दौरे पर गए थे, जिसके लिए भारत ने भी अपना एयर स्पेस खोल दिया था। इसके बाद से ही मीडिया में भारत और पाक के रुख में नरमी को लेकर खबरें आने लगी थीं, परिणामस्वरूप कुछ ही दिन बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम समझौता सामने आया है।

इस समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान की सेना की ओर से साझा बयान भी जारी किए गए हैं। साझा बयान में कहा गया है कि दोनों ही पक्ष नियंत्रण रेखा और दूसरे सेक्टर्स में सभी समझौतों, आपसी समझ और संघर्ष विराम का 24-25 फरवरी की मध्यरात्रि से सख्ती से पालन करेंगे। भारत और पाकिस्तान के डॉयरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) के बीच 2003 के बीच भी सीजफायर को लेकर सहमति बनी थी। साल 2018 में इसी तरह के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत पाकिस्तान और भारत नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर संघर्ष विराम, सभी समझौतो, सहमतियों का कड़ाई से पालन करने और मौजूदा व्यवस्था के जरिए किसी भी ’अप्रत्याशित स्थिति का समाधान करने या गलतफहमी को दूर करने पर राजी हुए हैं। दोनों पक्ष सभी समझौतों, सहमतियों और एलओसी तथा अन्य क्षेत्रों में संघर्ष विराम का कड़ाई से पालन करने पर सहमत हुए। दोनों पक्षों  ने दोहराया कि ’किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने या गलतफहमी दूर करने के लिए हॉटलाइन संपर्क और ’फ्लैग मीटिंग’ व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि आधिकारिक तौर पर इस सहमति को डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल्स ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) लेवल की बातचीत का ही नतीजा बताया गया है, लेकिन जानकारों के मुताबिक बैकडोर चैनल की महीनों चली बातचीत के बाद ही यह संभव हो पाया है। कहीं न कहीं यह इस तथ्य की भी भूमिका इसमें रही है कि दोनों ही देशों को अपनी दूसरी सीमाओं पर भी लगातार ध्यान देना जरूरी लग रहा था। अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के नेशनल सिक्योरिटी डिविजन के स्पेशल असिस्टेंट मोईद सईद के बीच हुई बातचीत के बाद संघर्ष विराम समझौता हुआ है। इस बात की जानकारी सिर्फ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित सरकार के शीर्ष नेताओं को ही थी।

पाकिस्तान ने हमेशा समझौते का उल्लंघन किया

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पाकिस्तान द्वारा सीजफायर उल्लंघन में लगभग 44 फीसदी की वृद्धि हुई है। गत वर्ष 28 दिसंबर तक, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम उल्लंघन की 4,700 घटनाओं को अंजाम दिया, जो पिछले 17 सालों में सबसे अधिक है। संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी अगस्त 2020 से हुई थी, जब भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35 ए को निरस्त कर दिया था। 2019 में, युद्धविराम उल्लंघन की 3168 घटनाएं हुईं, जिसमें से 1,551 घटनाएं अगस्त के बाद हुई हैं। 2018 में, पाकिस्तान ने संघर्ष विराम उल्लंघन की 1629 घटनाओं को अंजाम दिया।

बीते साल आतंकवाद-रोधी अभियानों में लगभग 200 आतंकवादी मारे गए। हालांकि भारत-पाक के बीच हुए समझौते के बाद माना जा रहा है कि सीजफायर उल्लंघन में कमी आएगी, लेकिन भारत को सीमा पर चौकन्ना रहना होगा, क्योंकि पीठ में खंजर घोंपने और धोखेबाजी की पाकिस्तान की पुरानी आदत है। संघर्ष विराम को लेकर पहले भी दोनों देशों के बीच कई बार समझौते हुए हैं, लेकिन पाकिस्तान ने हमेशा समझौते का उल्लंघन किया है। जानकारों का मानना है कि अगर पाकिस्तान अब इस नए सिरे से समझौते पर टिका रहता है तो उसे एएफटीएफ की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने में मदद मिलेगी। हालांकि अब भारत के सामने भी सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या छल और धोखे के अपने पुराने इतिहास को क्या पाकिस्तान फिर दोहराएगा?

2003 में हुआ था समझौता

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहल के बाद भारत-पाकिस्तान ने साल 2003 में एलओसी पर एक औपचारिक संघर्ष विराम का ऐलान किया था। भारत-पाकिस्तान के बीच 25 नवंबर, 2003 की आधी रात से संघर्ष विराम लागू हुआ था। इस मकसद एलओसी पर 90 के दशक से जारी गोलीबारी को बंद करना था। ये समझौता 450 मील लंबी एलओसी, इंटरनेशनल बॉर्डर और सियाचिन ग्लेशियर पर भी लागू हुआ था। इस समझौते से दो दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर जफरुल्ला खान जमाली ने ईद के मौके पर युद्ध विराम की पेशकश की थी। युद्ध विराम के बाद ईद की मिठाइयां भी बांटी गई थीं। जनवरी 2004 को अटल बिहारी वाजपेयी सार्क की बैठक के लिए पाकिस्तान गए और दोनों देशों ने मिलकर एक साझा बयान भी जारी किया था। इस समझौते का असर बमुश्किल तीन या चार साल ही दिखाई दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने फिर संघर्ष विराम का उल्लंघन करना शुरू कर दिया, जिसका भारतीय सेना भी मुंहतोड़ जवाब दे रही है।

भारत-चीन के बीच भी हुआ समझौता

वहीं, भारत और चीन के बीच एलएसी पर चले आ रहे गतिरोध के बाद बीते दिनों पैंगोंग को लेकर सहमति बन गई। चीनी सेना पिछले साल की स्थिति में लौट गई है। इस समझौते का ऐलान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में किया था। उन्होंने कहा कि दुनिया जान चुकी है कि हथियार की भाषा अब नहीं चलेगी। पेंगोंग में समझौते के बाद अन्य हिस्सों को लेकर भी भारत-चीन के सैन्य कमांडर्स में बातचीत हो रही है, ताकि तनाव कम किया जा सके।

एलओसी पर माहौल शांत

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सीजफायर समझौते के बाद जम्मू के कठुआ से लेकर कश्मीर के कुपवाड़ा तक अभी तक एलओसी पर एक भी गोली नहीं चली है, जिससे सरहदी इलाकों में रहने वाले लोगों ने राहत की सांस ली है। लोगों ने उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान इस बार दगाबाजी नहीं करेगा और सरहदी इलाकों में शांति बनाए रखेगा। समझौते के बाद से कठुआ, सांबा और जम्मू जिले की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लेकर  एलओसी के राजौरी, पुंछ, उड़ी, कुपवाड़ा के नियंत्रण रेखा से सटे गांवों में 15 साल बाद सकून दिख रहा है। पाकिस्तानी गोलाबारी से अक्सर दहशत और सन्नाटे में डूबे रहने वाले गांवों में खास चहल पहल है, लोग बेफिक्र होकर अपने खेतों में कामकाज कर पा रहे हैं। स्कूलों में भी अब पहले जैसी रौनक लौट आई है।

 

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