किसानों का नहीं, केवल टिकैत का आंदोलन

कृषि कानून विरोधी आंदोलन 26 जनवरी के पहले जितना प्रचंड दिख रहा था, उसका पासंग भी अब रहा नहीं। यह कमजोर किसानों के बीच ही निष्प्रभावी और पर्दे के पीछे से सक्रिय राजनीतिक चेहरों को सामने लाने के कारण अपनी छवि विकृत कर चुका है।

कृषि कानूनों के विरुद्ध में जारी आंदोलन चार महीने पार कर रहा है। हम में से ज्यादातर लोगों ने कल्पना नहीं की थी कि यह आंदोलन इतना लंबा समय चलेगा। निश्चय ही उनके लिए यह आश्चर्य का विषय होगा।

अचानक वे केवल कृषि कानून विरोधियों की ही नहीं अपनी जाति तथा भाजपा विरोधियों की उम्मीद बन गए हैं। एक व्यक्ति, जो आंदोलन से बोरिया बिस्तर समेट कर वापस जाना चाहता हो उसको अगर ऐसी प्रमुखता मिल जाए, जगह-जगह उसकी सभाएं आयोजित होने लगे, देशभर में वह आंदोलन का चेहरा बन जाए, बड़े-बड़े मोदी विरोधी एक्टिविस्ट, एनजीओ, संगठन, दल उसे महान जुझारू किसान नेता घोषित करने लगे तो फिर वह आंदोलन को समाप्त क्योंकर करना चाहेगा। इसलिए राकेश टिकैत से यह अपेक्षा करना व्यर्थ होगा कि भविष्य में सरकार के साथ कोई बातचीत होती है तो वे बीच का रास्ता निकालने के लिए तैयार हो जाएंगे।

अब टिकैत की भाषा बदल चुकी है। यह वही भाषा है जो लंबे समय से मोदी विरोधी बोलते रहे हैं। मीडिया से बातचीत में वो कहते हैं कि हम पश्चिम बंगाल जा रहे हैं और वहां भाजपा को हराने के लिए लोगों से कहेंगे। वहां बताएंगे कि इस सरकार ने देश का नाश कर दिया है। 27 जनवरी को जिस बात पर उन्होंने अपनी आंखों से आंसू बहाया था वह यही था कि भाजपा को जिताने में हमने भी मदद की है, हमने उसको वोट दिया है, क्या उसके लोग किसानों को मरवाएंगे। मुजफ्फरनगर से आरंभ होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनके भाई नरेश टिकैत खुलेआम भाजपा विरोधी बात कर रहे हैं। राष्ट्रीय लोक दल के नेता चौधरी अजीत सिंह के साथ उनका संबंध फिर से स्थापित है। वे अपने क्षेत्र में भाजपा सांसदों- विधायकों – नेताओं के बहिष्कार का भी आह्वान करते हैं। यहां तक कि विवाह, श्राद्ध और ऐसे किसी अवसर पर भी भाजपा नेता को नहीं बुलाया जाए इसका फरमान जारी कर रहे हैं। गाजीपुर बॉर्डर पर अलग-अलग पार्टी के नेताओं से मिलने और मीडिया में उसकी तस्वीरें दिखाए जाने पर राकेश टिकैत को कोई आपत्ति नहीं है। पहले वे इससे नाक भौं सिकोड़ते थे।

मानसिकता और व्यवहार में ऐसे परिवर्तन के संकेतों को समझा जा सकता है। फिर से भारत बंद का आह्वान है। इसके पहले भी हमने भारत बंद, रेल रोको, सड़क जाम करो आदि कार्यक्रम देख चुके हैं। इनके हस्र भी हमारे सामने हैं। इनमें से कोई कार्यक्रम राष्ट्रव्यापी तो छोड़िए पंजाब तथा हरियाणा के कुछ भागों को छोड़कर कहीं प्रभावी नहीं दिखा। आगे भी यही होगा। देश में इसका सीधा संदेश यही जा रहा है कि यह आंदोलन कृषि कानून के विरोध में ना होकर अब पूरी तरह भाजपा विरोध में परिणत हो गया है।

सरकार के बयानों, विशेषज्ञों की टिप्पणियों आदि से यह संदेश तो गया ही है कि तीनों कृषि कानून वर्तमान आर्थिक ढांचे में किसानों की आय बढ़ाने का एक वैकल्पिक ढांचा प्रदान करता है। धीरे-धीरे लोगों की समझ में आ गया है कि इसमें सरकारी मंडियों को खत्म करने या न्यूनतम समर्थन मूल्य को वापस लेने जैसी बात नहीं है। यह सब केवल दुष्प्रचार है। अपेक्षा के अनुरूप अब धरनों में लोगों की उपस्थिति भी नहीं हो रही है। राकेश टिकैत की सभाओं में शुरू में जितनी बड़ी संख्या में लोग आते थे अब उसमें भी व्यापक कमी आ गई है। सच यह है कि पुलिस अगर तय कर लें तो बगैर किसी प्रबल विरोध के तथा हिंसा का सहारा लिए बिना इन धरनों को समाप्त कर सकती है। जहां भारी जन उपस्थिति नहीं हो वहां कार्रवाई करके धरने को खत्म करना कतई कठिन नहीं है। वैसे भी गाजीपुर बॉर्डर पर दिल्ली से गाजियाबाद या मेरठ की ओर जाने वाला हाईवे लेन खुल चुका है। केवल मेरठ या गाजियाबाद से दिल्ली आने वाली लेन बंद है।

यह बताने की आवश्यकता नहीं कि अपने आंदोलन को दुर्बल, राजनीति से प्रेरित तथा आधारहीन लक्ष्यों की घोषणा करने वाले की छवि इनके अपने कारणों से पैदा हुई है। सरकार से 11 दौर की बातचीत में अगर ये व्यावहारिक लचीला रुख अपनाते तो किसानों के बीच वाकई हीरो होते। सरकार ने आवश्यकता अनुसार संशोधन करने की बात स्वीकार कर ली थी। कई संशोधनों के प्रस्ताव भी दिए गए थे। नहीं मानने पर सरकार, विशेषज्ञों और किसान संगठनों की समिति बनाने का भी प्रस्ताव दिया था। इन सबसे आसानी से बीच का रास्ता निकल सकता था। अगर वाकई ये किसानों के हितैषी होते तो इस समिति में अपनी बात रख कर आवश्यक संशोधन करवा सकते थे। सरकार की ओर से यह भी कह दिया गया कि जब उच्चतम न्यायालय ने इन कानूनों पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है तो फिर हमें उसके फैसले की प्रतीक्षा करनी चाहिए। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की अंतिम अपील यही थी कि उच्चतम न्यायालय के अंतरिम आदेश के बाद चूंकि यह कानून लागू नहीं है इसलिए किसान अपना धरना वापस कर लें।

वास्तव में जब उच्चतम न्यायालय ने विशेषज्ञों की समिति गठित कर घोषित किया कि इसके बाद अनिश्चितकालीन धरना का कोई औचित्य नहीं है। उस समय भी ये अपना कदम वापस ले लेते तो इन सबका सम्मान बच जाता। इन्होंने उच्चतम न्यायालय को भी ठेंगा दिखा दिया। यहां तक कि उसके द्वारा गठित समिति में नहीं जाने की भी घोषणा कर दी। यह बात अलग है कि कई किसान संगठन समिति के पास गए हैं। शीघ्र ही समिति की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को प्राप्त होगी एवं न्यायालय उसके अनुसार अपना फैसला देगा। तो जब आप सरकार की बात मानेंगे नहीं, उच्चतम न्यायालय को भी महत्व नहीं देंगे, कृषि विशेषज्ञों को आप भाजपा समर्थक या भूमंडलीकरण का समर्थक घोषित करेंगे तो फिर आप की छवि पर निश्चित रूप से संदेह होगा। लोग यह सवाल करेंगे कि क्या इस धरती पर सबसे बड़े ज्ञानी ये धरनाकर्ता या आंदोलनकारी ही हैं? इसके साथ जिस तरह पंजाब-हरियाणा ही नहीं अन्य जगहों की भाजपा विरोधी पार्टियों ने इनका साथ और समर्थन देना शुरू कर दिया उससे भी इनकी साख कमजोर हुई है। इस समय यह कहना कठिन है कि धरना कब समाप्त होगा। अगर यह संपूर्ण रूप से नरेंद्र मोदी विरोधी लक्ष्य में परिणत हो गया है तो चाहे जितने लोग रहें ऐसे तत्व उसे कायम रखने की हर संभव कोशिश करेंगे। राकेश टिकैत की नेतागिरी चमक ही गई है। हमारे सामने नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के विरुद्ध जारी शाहीनबाग के छोटे धरने के मोदी विरोधी शक्तियों के एकत्रीकरण का स्थल बन जाना और लंबे समय तक उसके जारी रहने का बीभत्स उदाहरण है। हालांकि ये धरने शाहीनबाग धरने की समय सीमा को पार कर चुके हैं। लेकिन जैसा हम अनुमान लगा सकते हैं उस समय देश और राजधानी दिल्ली में कोरोना का भयावह प्रकोप नहीं होता तो वे लोग वहां से नहीं हटते और फिर पुलिस को सड़कों से उनके लाव लश्कर हटाने के लिए इतना आसान अवसर नहीं मिल पाता। लेकिन यह चाहे जब तक जारी रहे इसे मोदी, भाजपा और संघ विरोधी समूहों का चेहरा मानकर ही आम नागरिक व्यवहार करेगा। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद वैसे भी इनके लिए बने रहने का आधार देना कठिन हो जाएगा। हालांकि इनकी मदद करने वाले भारी संख्या में एक्टिविस्ट अधिवक्ताओं का समूह उसके लिए भी तर्क तैयार कर रहे होंगे या कर चुके होंगे। तो हम सब नजर रखते हैं। इस समय यह कहने में कोई आपत्ति नहीं है व्यापक प्रचार और अलग-अलग समूहों को मिलाकर आरंभ किया गया कृषि कानून विरोधी आंदोलन 26 जनवरी के पहले जितना प्रचंड दिख रहा था उसका पासंग भी रहा नहीं, यह कमजोर किसानों के बीच ही निष्प्रभावी और पर्दे के पीछे से सक्रिय राजनीतिक चेहरों को सामने लाने के कारण अपनी छवि विकृत कर चुका है।

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