नारी राष्ट्र की आधारशिला

टुकड़े-टुकड़े गैंग का एक हिस्सा नारीवादी संगठन हैं, जो महिला मुक्ति के नाम पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और समाज को तोड़ने के षड्यंत्र में लगी हुई हैं। महिलाओं और युवाओं को इनके नापाक मंसूबों से सतर्क होना चाहिए। सरकार को भी उनके खिलाफ उचित कदम उठाने चाहिए।

नारी से नर है, नारी से सृष्टि और सृजन है, नारी से ही समाज एवं राष्ट्र है। यदि नारी का ही नैतिक-चारित्रिक पतन हो जाए तो युवा पीढ़ी, समाज-राष्ट्र सब कुछ पथभ्रष्ट हो जाएगा, तबाह हो जाएगा। इसलिए नारी को राष्ट्र की आधारशिला कहा गया है। भारतीय संस्कृति में नारी को माता, देवी, जगदंबा आदि अनेक नामों से सम्मानित किया गया है और ‘नारी तू नारायणी’, ‘यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ जैसे घोषवाक्यों से उसका गुणगान और उसकी महिमा का वर्णन किया गया है।

राष्ट्र निर्माण में भारतीय महिलाओं का अहम योगदान

यदि जीजामाता ने शिवाजी महाराज को चारित्रिक एवं नैतिक शिक्षा न दी होती तो क्या हिंदू स्वराज की स्थापना हुई होती? इसी तरह समय-समय पर नारी शक्ति ने राष्ट्र को आधार देने के लिए अनेकों महापुरुषों को जन्म दिया है और भारतीय संस्कृति सभ्यता की रक्षा की है। शिवाजी महाराज और भगत सिंह जैसे महापुरुष आज पैदा क्यों नहीं होते तो उसका जवाब है कि यदि जीजामाता की तरह नारी शक्ति जागृत हो जाए तो शिवाजी महाराज जैसे राष्ट्रपुरुष फिर से जन्म लेने लगेंगे। पश्चिमी संस्कृतिक आक्रमण ने भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात किया है परिणाम स्वरूप हमारे समाज में नैतिक गिरावट आती जा रही है। जिसका खामियाजा हमारे समाज एवं राष्ट्र को भुगतना पड़ रहा है।

वेब सीरीज द्वारा हो रहा नारी का चरित्र हनन

मनोरंजन व अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिल्म निर्माता वेब सीरीज में सरेआम अश्लीलता और नग्नता परोस रहे हैं। उनकी नजर में नारी केवल भोग-विलास की वस्तु है। कामपिपासु है, कामक्रीड़ा में लिप्त रहना ही उसका शौक है। इन वेब सीरीज के उत्तेजक दृश्यों के माध्यम से आज की युवा पीढ़ी को कामवासना एवं व्यभिचार की ओर धकेला जा रहा है, जिससे देश की युवा शक्ति तेजहीन हो जाए, पथभ्रष्ट हो जाए। वह राष्ट्र निर्माण के बारे में सोचे भी नहीं। उनके मन-मस्तिष्क में केवल और केवल कामाग्नि धधकती रहे। सदाचार, ब्रह्मचर्य, संयम, मर्यादा आदि सद्गुणों का नाश हो जाए और विश्व की सबसे पुरातन सनातन गौरवशाली संस्कृति का ह्रास हो जाए, इसी उद्देश्य से वेब सीरीजों में भारी मात्रा में विदेशी फंडिंग की जाती है।

रिश्तों की मान-मर्यादाओं को किया जा रहा तार-तार

भारतीय समाज का ताना-बाना परिवार से जुड़ा हुआ है। संयुक्त परिवार ही हमारी सबसे मजबूत बुनियाद है लेकिन विदेशों से प्रभावित होकर हमारे परिवार विभक्त हो रहे हैं, लगातार तेजी से टूटते जा रहे हैं। रिश्ते-नातों की नाजुक डोर विश्वास पर टिकी होती है। यदि विश्वास ही ना रहे तो हर रिश्तों को शक की नजर से देखा जाएगा और वे बिखर जाएंगे। परिवार एवं रिश्तों को तोड़ने के लिए अधिकतर वेब सीरीजों में पति-पत्नी के अंतरंग संबंधों के अलावा भाई-बहन, बाप-बेटी, मां-बेटे, भाभी-देवर आदि पवित्र रिश्तों के बीच भी अवैध संबंध दर्शाया जाता है। जो न केवल आपत्तिजनक है बल्कि संवेदनहीन, अमर्यादित एवं निंदनीय है। कहते हैं ‘हम जैसा देखेंगे, सुनेंगे वैसे ही बन जाएंगे’ इसका सबसे अधिक दुष्परिणाम हमारे बच्चों पर होता है। बेलगाम वेब सीरीज ने अश्लीलता का नंगा नाच मचाया हुआ है। अब समय आ गया है कि दोषियों को कटघरे में खड़ा किया जाए और उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि वह समाज को प्रदूषित ना कर पाए।

महिला आयोग और नारीवादी संस्थाओ का क्या है औचित्य?

महिलाओं के मान-सम्मान, सुरक्षा, न्याय-अधिकार आदि के लिए महिला आयोग एवं अन्य अनेक नारीवादी संस्थाएं देशभर में कार्यरत हैं। बावजूद इसके महिलाओं के उत्पीड़न, हिंसा, व्यभिचार, बलात्कार, सुरक्षा आदि मामलों में सुधार होता दिखाई नहीं देता, बल्कि उल्टे बढ़ता ही जा रहा है। महिला अधिकार की बात करने वाली महिलाओं के मान-सम्मान की रक्षा करने में असमर्थ साबित हो रही हैं। जब कभी महिलाओं की अस्मिता पर चोट पहुंचाई जाती है तब महिला आयोग कहां होता है? देश में खुलेआम ओटीटी प्लेटफार्म पर वेब सीरीज द्वारा महिलाओं का अपमान किया जाता है, उनके चरित्र का हनन किया जाता है, उनके मान-सम्मान को चोट पहुंचाई जाती है, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल कर उनकी छवि कलंकित की जाती है, बावजूद इसके  महिला आयोग और महिलाओं के लिए कार्यरत अन्य संस्थाएं मौन साधे रहती हैं या यूं कहें कि अपनी मौन सहमति दे देती हैं, तो फिर ऐसे महिला आयोग और ऐसी नारीवादी संस्थाओं का क्या औचित्य है? इनकी प्रासंगिकता पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। यदि उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया तो देश का भरोसा खो देंगे। नारियों के स्वाभिमान, आत्म सम्मान और अस्मिता की रक्षा के लिए महिला आयोग को आगे आना चाहिए। यदि महिलाओं के सुरक्षा के लिए महिला आयोग भी आगे नहीं आएगा तो और कौन आगे आएगा?

महिला आंदोलन, विवाद और सुधार

न्याय और अधिकार के लिए समय-समय पर महिलाओं ने एकजुट होकर आंदोलन किया और अपनी आवाज बुलंद की। जिसका समर्थन पुरुषों ने भी किया और हर बार महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर पुरुष समाज ने अपना भारी समर्थन दिया, जो नर-नारी के सहअस्तित्व का द्योतक है। वर्तमान समय में नारीवाद के नाम पर किया जाने वाला आंदोलन कितना उपयोगी है? कितना सही है? इस पर दुनिया भर में विचार-विमर्श किया जाता रहा है। समानता, अधिकार और न्याय की मांग करते-करते महिलाएं अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हुए स्वच्छंदता की ओर उन्मुख हो रही हैं। लिव इन रिलेशन में रहना, अश्लील हरकतें करना, अर्धनग्न कपड़े पहनना, शराब-सिगरेट पीना और नाइट पार्टी में जाना, घर से रात भर बाहर रहना, क्रांतिकारियों की तरह नारेबाजी करना, प्ले कार्ड्स लहराना, बैनरबाजी करना और पुरुष प्रधान समाज पर हमला करना क्या यही नारीवाद है? नारीवाद के नाम पर इसे विचारधारा की संज्ञा देकर पुरुष बनाम महिला का संघर्ष निर्माण करना क्या न्यायोचित है? जबकि होना यह चाहिए कि विवाद की जगह संवाद, संघर्ष के स्थान पर समन्वय और समस्या के हल के लिए समाधान पर बल देना चाहिए। महिलाओं की जायज मांगों से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन नाजायज मांगों से किसका हित होगा? यदि हम अधिकार से अधिक कर्तव्य को प्रधानता देंगे तो समस्या का समाधान निश्चित रूप से होगा। विदेशों में अधिकारों को लेकर संघर्ष चलता ही रहता है जबकि भारत में अधिकारों से बढ़ कर कर्तव्य को अधिक महत्व दिया जाता है इसलिए यहां पर संघर्ष दिखाई नहीं देता। भारतीय समाज का ताना-बाना दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वैसे दुनिया में नारीवाद का डंका बजाने वाली संस्थाओं को उपरोक्त गंभीर संवेदनशील विषयों पर भी अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए, आंदोलन करना चाहिए ताकि वेब सीरीज की मनमानी पर पूर्णता रोक लग सके और समाज में महिलाएं सम्मान के साथ जीवन यापन कर सके, इससे ही सुधार का मार्ग प्रशस्त होगा।

नारीवाद की आड़ में भारतीय संस्कृति पर आक्रमण

पाश्चत्य विचारधारा से प्रभावित प्रगतिशील नारीवादी महिला संगठन मूल मुद्दों से हटकर भारतीय संस्कृति पर लगातार हमलावर हैं। वे भाई-बहन के पवित्र त्यौहार रक्षाबंधन तक का विरोध करते हैं। उनके तर्क हैं कि महिलाएं, पुरुषों से कमजोर हैं इस बात को यह त्यौहार बढ़ावा देता है। राखी पितृसत्ता का नतीजा है, महिलाओं को अपनी रक्षा के लिए किसी मर्द की जरूरत नहीं है। अगर यह भाई बहनों के प्यार की निशानी है तो भाई क्यों बहनों को राखी नहीं बांधते? इस तरह के तर्कों से वे भारतीय त्यौहारों में हस्तक्षेप करते हैं, तो कभी तीज त्यौहार, करवाचौथ का विरोध करते हैं। सभी भारतीय त्यौहारों, व्रतों, मूल्यों का घिसे पिटे, स्तरहीन, विवेकहीन तर्कों से सही ठहराने का प्रयास करते हैं। यह सिलसिला लगातार जारी है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर टीका-टिप्पणी करने के ही उन्हें पैसे मिलते हैं और इससे ही उनका रोजगार चलता है। देश विदेश में बड़े-बड़े सेमिनारों का आयोजन किया जाता है, उन्हें पद प्रतिष्ठा एवं पैसों का प्रलोभन देकर ये सारे कार्य कराए जाते हैं।

नारीवादी संस्थाओं का दोगलापन

नारीवाद के झंडाबरदारों का दोमुंहापन तो देखिए, वे महिलाओं के मंदिर जाने पर तो आवाज उठाएंगे लेकिन मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश के धार्मिक अधिकार पर चूं तक नहीं करेंगे। महिलाओं की घूंघट प्रथा पर विरोध जताएंगे लेकिन बुरका प्रथा को जायज ठहराएंगे। ये नारीवादियों का दोगलापन नहीं तो और क्या है? नारीवादी विचारधारा ऊपर से देखने में जितनी अच्छी दिखाई देती है वास्तविकता में वह उतनी अच्छी है नहीं। उनकी कथनी और करनी में जमीन- असमान का अंतर है। एक बात और गौर कीजिएगा कि ये नारीवादी संस्थाएं अधिकतर भारतीय परंपरा आधारित मूल्यों पर ही चोट करती हैं। मुस्लिम, ईसाई आदि की अनैतिक परम्पराओं पर इनके मुंह में दही जम जाती है। साफ शब्दों में कहूं तो टुकड़े-टुकड़े गैंग का एक हिस्सा नारीवादी संगठन हैं, जो महिला मुक्ति के नाम पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और समाज को तोड़ने के षड्यंत्र में लगी हुई हैं। सरकार और जांच एजेंसियों द्वारा इनकी गतिविधियों पर नजर रखने और इनके विरुद्ध ठोस कार्रवाई की जाने की आवश्यकता है। खासकर महिलाओं और युवाओं को इनके नापाक मंसूबों से सतर्क होना चाहिए।

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