गुजरात में उठी आरक्षण की आग कहां पहुंचेगी?

****प्रा. हर्षद याज्ञिक*****
गुजरात में पिछले कुछ सप्ताह से आरक्षण को लेकर फिर से बवंडर खडा हुआ है। लेकिन अचरज की बात यह है कि, इस बार आरक्षण के लिए आंदोलन करने वाले गुजरात के इन्हीं पटेलों- पाटीदार समाज- ने सन १९८१ और १९८५ में आरक्षण के खिलाफ एक बहुत बड़ा आंदोलन राज्य में छेड़ा था।
गुजरात का १९८१ का आरक्षण विरोधी आंदोलन, जो पाटीदार की अगुवाई में प्रारंभ हुआ था; उयका लक्ष्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण का विरोध करना था। उस समय पाटीदारों का कहना था कि शिक्षा-संस्थाओं में प्रवेश में और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लोगों को आरक्षण मिलने से, शेष समाज को काफी मात्रा में हानि पहुंचती है।
बाद में १९८५ में फिर से गुजरात में आरक्षण-विरोधी आंदोलन छिड़ गया। उसका नेतृत्व छात्रों के वाली मंडल (अभिभावक संगठन) के नाम से गठित आरक्षण विरोधी समिति के अध्यक्ष प्रा. शंकरभाई पटेल कर रहे थे। उस वक्त गुजरात में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों में, कांग्रेस पार्टी को रिकार्डतोड़ सीटें प्राप्त हुई थीं- १८२ में से १४९। कांग्रेस पार्टी से माधव सिंह सोलंकी उस वक्त भी मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन पाटीदार समर्थित आरक्षण विरोधी आंदोलन गुजरात में फैल गया। कुछ समय बाद यह आंदोलन और हिंसक एवं सांप्रदायिक हिंसा में तब्दील हो गया।
इन सांप्रदायिक दंगों के कारण गुजरात में लंबे अरसे तक मारकाट, आगजनी, सार्वजनिक संपत्ति की हानि, कर्फ्यू आदि देखने को मिले। अंततोगत्वा यह आंदोलन और निरंकुश दंगों के कारण, तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी को अपना पद त्याग देना पड़ा था।
अभी कुछ दिनों पहले ही, २ सितम्बर,२०१५ के इंडियन एक्सप्रेस दैनिक के अनुसार ८५ वर्षीय बुजुर्ग माधव सिंह सोलंकी को यह कहना पड़ा कि १९८५ के आरक्षण विरोधी आंदोलन में उन्ही की कांग्रेस पार्टी के सदस्यों ने सांप्रदायिक-तत्वों को उसी आंदोलन में घुसा दिया… और इसी वजह से यह आरक्षण विरोधी आंदोलन, सांप्रदायिक दंगों में तबदील हो गया था और उन्हेंे पदत्याग करना पड़ा था।
सोलंकी का यह निवेदन ही इस बात का प्रमाण है कि, ऐसे सांप्रदायिक दंगों में संघ-परिवार के लोगों के बजाय, स्वयं कांग्रेस पार्टी के ही कार्यकर्ता लिप्त पाए गए थे। और इन्हीं सांप्रदायिक दंगों में विशेष रूप से अल्पसंख्यक- मुस्लिमों को अपूरणीय क्षति भी पहुंची थी।
मोदीजी के शासन में सन २००२ में हुए, गोधरा कांड के बाद के दंगों के लिए, संघ परिवार के खिलाफ कुप्रचार करने वाले कथित सेक्युलर कर्मशील, कुछ संगठन, प्रिंट एवम् इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग सोलंकी के इस बयान के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
गुजरात में अभी- अभी प्रारंभ हुए आरक्षण आंदोलन के पक्ष-विपक्ष में बहुत ही तर्क दिए जा सकते हैं। दोनों खेमों के तर्कों में कुछ न कुछ सच्चाई छिपी हुई है। लेकिन अपने सार्वजनिक जीवन में, आजकल हर किसी मुद्दे पर, हर समस्या पर राजनीति हावी हो जाती है। इसके ही चलते हम यह नजरंदाज कर देते हैं कि ऐसी संवेदनशील बातों में हर पक्ष को बहुत सावधानी से अपने बयान जारी करने चाहिए। आरक्षण- व्यवस्था का प्रावधान जब आजादी के प्रारंभ काल में संविधान निर्माताओं ने संविधान में किया था, उस वक्त इसका उद्देश्य यही था कि, अपने समाज के जो पिछड़े – अतिपिछड़े – दलित बंधु हैं और वनवासी क्षेत्र के अपने जो आदिवासी बंधु हैं- उन्हें सदियों के बाद, स्वतंत्र भारत में राष्ट्र की मुख्य-धारा में लाया जाए। इसलिए शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में इन दोनों समूहों के लिए आरक्षण का प्रबंध किया गया था। एस.सी. के लिए १५ फीसदी और एस.टी. के लिए ७ फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।
बाद में कुछ अन्य पिछड़े समूहों के लिए गुजरात में ‘बक्षी पंच’ के सुझाव में आरक्षण व्यवस्था लाई गई। इनकी संख्या २७ फीसदी हुई। उसमें एक सौ से भी विभिन्न ज्ञाति-जाति समूहों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया।
अब गुजरात के पटेल- पाटीदार ज्ञाति के लोगों ने ओ.बी.सी. में उनको भी आरक्षण मिले ऐसी मांग की है। पटेलों के आंदोलन को देखकर, गुजरात के राजपूत, ब्राह्मण, वैष्णव-वणिक, सुवर्णकार- एसे बहुत से ज्ञाति-समुदायों ने भी ओ.बी.सी.में प्रवेश के लिए अपनी-अपनी ज्ञाति की पेशकश की।
बात सही है कि, हर ज्ञाति समुदाय में जैसे कुछ संपन्न लोग होते हैं, वैसे ही गरीब तबके के लोग भी होते हैं। गुजरात में ‘बक्षी पंच’ के बाद ‘राणे कमीशन’ ने भी यह सुझाव दिया है कि, हर ज्ञाति के शहरी-निवासी और ग्रामीण-निवासी के सामाजिक आर्थिक स्तर में भिन्नता और असमानता है। जैसे कि ग्रामीण-नाई की छोटी दुकान होती है, लेकिन शहरी-नाई अपनी एयर कंडीशन्ड सलून में अच्छी कमाई कर सकता है। इसलिए शहरी नाई के मुकाबले ग्रामीण नाई को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
सामाजिक न्याय और उत्कर्ष के लिए एक सीमा तक आरक्षण का प्रावधान उपयुक्त हो सकता है। लेकिन इसके लिए आंदोलन करते समय, सामाजिक सद्भाव, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय ऐक्यभाव को हम नजरंदाज कभी नहीं कर सकते। आरक्षण के आंदोलन के नाम पर ज्ञाति-ज्ञाति के बीच जो कटुता फैलाई जाती है; इसके कारण हमारी राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को बहुत ही ठेस पहुंच रही है।
गुजरात के वर्तमान आरक्षण आंदोलन के चलते और इस में भी जब सरदार पटेल का नाम उछाला जा रहा है, तब तो हमें यह कहना पड़ेगा कि लौह-पुरष सरदार पटेल, जिन्होंने देश विभाजन के साथ आई आजादी की उस जटिल समस्याओं से लिप्त कालखंड में; जिस दक्षता और राष्ट्र प्रेम को उजागर कर सैंकड़ों तत्कालीन देशी-राजाओं को अपने साथ लेकर – कश्मीर से कन्याकुमारी तक, भारत वर्ष की एकता और राष्ट्रीय अखंडता का स्वप्न पूरा किया; कम से कम सरदार पटेल के नाम को तो इस आंदोलन से दूर ही रखना चाहिए। सरदार पटेल केवल किसी क्षेत्र-विशेष या ज्ञाति-जाति-विशेष के नेता नहीं थे। सारे भारतवर्ष के वो अजेय-प्रेरक सरदार थे।
शासन में बैठे हुए और समाज जीवन के सभी हितचिंतकों को साथ मिल-बैठकर किसी राउन्ड-टेबल परिषद के जरिए, सभी ज्ञाति-जाति समूहों के साथ राष्ट्रीय-विमर्श कर के, सब को साथ लेकर आरक्षण के सवाल पर किसी सर्वमान्य राष्ट्रीय-नीति की ओर आगे बढ़ने का यही ही उपयुक्त समय है। एक हजार साल की विदेशी-विधर्मी गुलामी से मुक्त भारतवर्ष आरक्षण के नाम पर यादवस्थली के आत्मघाती दल-दल में फंस जाए, यह किसी के हित की बात नहीं है। इससे किसी की शोभा-शालीनता प्रकट नहीं हो सकती। हम सब को साथ साथ जीना है और मेल-मिलाप से ही आगे बढ़ना है। राष्ट्र की एकता हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय राष्ट्र एक-अखंड और जनतांत्रिक व्यवस्थायुक्त बचेगा- बनेगा, तब जाकर ही हम सब भी पनप पाएंगे। प

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