सत्य घटना पर आधारित फिल्में

फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सबसे मुश्किल अगर कुछ है तो वो है, सत्य घटना पर आधारित फिल्मों का निर्माण करना। क्योंकि उसमें सिर्फ सत्य घटना ही दिखानी नहीं होती वरन उस सद सत्य घटना पर आधारित फिल्म बन सकती है यह विश्वास निर्माण होने के बाद अन्य कई बातें होती हैं। जैसे उस सत्य घटना का कितना हिस्सा फिल्म के लिए उपयोगी होगा, उसमें गाने और कॉमेडी सीन इत्यादि फिल्मी मसाले कितने मिलाए जाएं आदि-आदि। इतना सब करने के बाद कहीं वह फिल्म केवल जानकारी देने वाली फिल्म न बन जाए इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है। सेंसर बोर्ड की कैंची फिल्म के कम से कम हिस्सों पर चले इसपर भी ध्यान रखना आवश्यक है। क्योंकि कुछ घटनाओं की दाहकता इतनी अधिक होती है कि उन पर सेंसर की कैंची चलने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं।

इस तरह की फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी बड़ी होती है; क्योंकि विभिन्न प्रसार माध्यमों के कारण उस सत्य घटना के बारे में पहले से ही लोग बहुत कुछ जानते हैं। अत: इस जानकारी को पुन: लोगों नाट्यमय और उत्कंठावर्धक रूप में दर्शकों के सामने लाना ही पटकथाकार और निर्देशक के सामने असली चुनौती होती थी। तात्पर्य यह है कि सत्य घटना पर अधारित फिल्म का निर्माण करने के लिए बहुत संयम तथा कुशलता की आवश्यकता होती है।

पहले इस तरह सत्यघटना पर आधारित फिल्मेम कम ही बनती थीं। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि सत्य घटना पर आधारित फिल्में बन सकती हैं यह दृष्टिकोण और आवश्यकता दोनों ही नहीं थे। बल्कि अधिकतम जोर फिल्मों के लिए रची गईं पटकथाओं पर ही दिया जाता था। 3 मई 1913 में जब दादासाहेब फालके ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ फिल्म के द्वारा हमारी फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी तब पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। ‘परदे पर चलते-फिरते दृश्य’ ही उस समयसमय के निर्देशकों, निर्माताओं और दशरकों के लिए खास होता था। इसके बाद सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। इससे आगे का दौर रहा प्यार, रहस्य, भूतप्रेत इत्यादि वाली फिल्मों का। इन सारी फिल्मों की पटकथाएं खास इन फिल्मों के लिए ही बनाई गईं। कई बार तो पटकथाएं बहुत अच्छी नहीं होती थीं, परंतु उसमें श्रवणीय गीत संगीत नृत्य का बहुत बड़ा हिस्सा होता था।

सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण होने में लगभग 50 वर्षों का समय बीत गया। नानावटीब हत्याकांड पर ये रास्ते हैं प्यार के फिल्म आई। इसमें सुनील दत्त और लीला नायडू मुख्य कलाकार थे। परंतु फिल्म अधिक नाट्यमय नहीं हो सकी। बी.आ. चोपडा द्वारा निर्देशित ‘गुमराह’ भी अलग तरह की सत्य घटना पर आधारित था। इसमें अशोक कुमार, सुनील दत्त, माला सिन्हा और शशिकला की प्रमुख भूमिकाएं थीं। एक तात्कालिक फिल्म समीक्षक का मत था कि यह कामिनी कौशल की जिंदगी में घटी एक घटना पर आधारित था। कामिनी कौशल की बहन की अचानक मृत्यु के बाद उन्हें अपने बहनोई से शादी करनी पड़ी। और इसके लिए उन्हें दिलीप कुमार के प्यार को तिलांजली देने लगी। बी.आर. चोपडा को इस घटना में फिल्मी एंगल दिखा, उन्होंने उसमें कुछ व्यक्तिरेखाओं को बढ़ाया और फिल्म तैयार की।

इसके बाद कुछ समय के अंतराल में सत्य घटना पर आधारित फिल्में आती रहीं। शेखर कपूर ने फूलन देवी के बहुचर्चित जीवन पर बैंडिट क्वीन बनाई, जिसकी बहुत चर्चा हुई। राजेश खन्ना और डिंपल कपाडिया के जीवन के विवाद, ईगो, आदि में महेश भट्ट को भरपूर मसाला दिखाई दिया। इस पर उन्होंने ‘काश’ फिल्म बनाई। अपने ही जीवन पर आधारित फिल्म में डिंपल ने डिंपल की ही भूमिका साकार की। परंतु यह फिल्म पकड नहीं बना सकी। जैकी श्रॉफ भी राजेश खन्ना की विफलता को पर्दे पर नहीं उतार सके।

अब सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों की संख्या बढ़ रही है। पटकथाकार और निर्देशक ऐसी फिल्मों को अच्छी तरह से प्रस्तुत करने लगे हैं। निर्माता ऐसी फिल्मों पर पैसा खर्च करने को तैयार हो गए हैं। दर्शक भी इस तरह की फिल्मों को अपनाने लगे हैं। मधुर भंडारकर के ‘चांदनी बार’ से लेकर मेघना गुलजार के ‘तलवार’ तक आज तक की सत्य घटना पर आधारित फिल्मों की यात्रा है। ‘चांदनी बार’ एक ही बारगर्ल की कहानी बयां करती है, ऐसा नहीं है। अनेक बार गर्ल्स के जीवन के सुख दुखों की कथा-व्यथा को इसमें दिखाया गया है। इस फिल्म में मुमताज की भूमिका करनेवाली तब्बू को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इससे सिद्ध होता है कि सत्य घटना पर आधारित फिल्म का निर्माण करना कितना योग्य था। मधुर भंडारकर ने इसके बाद कई क्षेत्रों की सत्य घटनाओं का शोध किया। और उन क्षेत्रों पर आधारित घटनाओं को फिल्मों में स्थान दिया।

‘कॉर्पोरेट’ में उस क्षेत्र की सूक्ष्म महत्वकाक्षाओं से लेकर बदलती नीति और लाभ हानि के आधार पर बदलने वाले रिश्तों की दास्ताम थी। ‘फैशन’ में उन्होंने उस क्षेत्र की सफलता और असुरक्षितता जैसे दोनों किनारों को एक साथ उतारा। इसमें चित्रित सफलता के लिये कोशिश और अफलता के कारण उत्पन्न निराशा दोनों ही दर्शकों को विचलित करनेवाले थे। ‘पेज थ्री’ में पार्टी कल्चर के झूठे चेहरे और बदलते मुखौटे दिखाई देते हैं। हर छोटी-छोटी बात मेम केवल अपना स्वार्थ देखना और दूसरे के दुख की कोई चिंता न होने को उस फिल्म में भयानक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई 1991 को मानव बम धमाके में नृसंस हत्या हुई। इस घटना के पूरे सत्य को पर्दे पर दिखाने वाला सुरजीत सरकार की ‘मद्रास कैफे’ दर्शकों को विचलित कर देती है। इसमें हमें एक अलग ही दुनिया दिखाई देती है। नीरज पांडे निर्देशित ‘स्पेशल छब्बीस’ बिलकुल अलग किस्म की फिल्म थी। आयकर अधिकारी बता अनेकों को लूटा जाता है। ऐसे ही एक गैंग का पर्दाफाश इस फिल्म में किया गया है। कोई गुनाहगार कितनी सफाई से अपना खेल खेल जाता है: यह इस फिल्म में देखने को मिलता है। नीरज ग्रोवर हत्याकांड पर आधारित रामगोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित ‘नॉट अ लव स्टोरी’, मॉडल जेसिका की नृशंस हत्या पर बनी फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ आदि फिल्मों को बनाने के लिए हर स्तर पर बहुत मेहनत की गई।

तमिल-तेलगू फिल्म इंडस्ट्री में तूफान मचाने वाली सिल्क स्मिता किस तरह तरह पुरुषों के शोषण का शिकार बनती है उसे ‘डर्टी पिक्चर’ में दिखाया गया है। यह भी विभिन्न सत्य घटनाओं को चित्रित करता है। एक दोयम दर्जे की अभिनेत्री को अपने अस्तित्व और जीवन की रक्षा के लिए किस तरह समझौते करने पड़ते हैं यह इस फिल्म में दिखाया है। सिल्क स्मिता का किरदार निभाने के लिए विद्या बालन ने वजन बढ़ाने से लेकर आवश्यक अन्य सभी प्रयत्न किये। परंतु वे उसकी तीक्ष्ण नजर नहीं ला सकीं। जो सिर्फ और सिर्फ सिल्क स्मिता में ही थी।

आरुषी हत्याकांड ने हमारे पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। कभी उसमें नौकर को दोषी ठहराया गया तो आरुषी के माता-पिता को। इस मामले की गुत्थी सुलझाना बहुत कठिन था। प्रसार माध्यमों ने भी अपनी पद्धति से इस मामले को देखा था। ऐसे मामले पर फिल्म बनाते समय किसी पर भी अन्याय न होने देना अत्यंत आवश्यक था। सत्य घटना और फिल्म के बीच समतोल साधते समय पटकथा पर बहुत मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे मामले कोर्ट में पूछे गए अनेक उल्टे सीधे प्रश्नों के कारण भी चर्चित होते हैं। अत: पुलिस और कोर्ट दोनों स्थानों पर बहुत जानकारी इकट्ठा करनी पड़ती है। कोर्ट के दृश्य भी धारदार संवादों सेरोचक नहीं बनाए जा सकते। तात्पर्य यह कि सत्य घटना पर आधारित चित्रपट के लिए उसका हर तरफ से अभ्यास करना आवश्यक है। तथा उपसपर फिल्म कैसे बनाई जाए यह भी सोचना आवश्यक है। मेघना गुलजार ने इस पर प्रयत्नपूर्वक सफलता प्राप्त की अत: ‘तलवार’ दर्शकों को बेचैन करने वाली फिल्म रही।

हमारी फिल्म इंडस्ट्री एक नये पायदान पर पहुंच चुकी है। यह भले ही थोड़ी देर से हुआ हो परंतु कौन जाने यह सिद्ध हो जाए कि इस प्रकार की फिल्मों के लिए यही समय उपयुक्त हो। आपको क्या लगता है?

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