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पिछले लगभग ९० वर्षों से पूर्वांचल में रामकृष्ण मिशन का सेवा और सामाजिक कार्य चल रहा है। इसके साथ संघ परिवार की संस्थाएं भी जुड़ गई हैं। इन प्रयत्नों से पूर्वांचल में काफी परिवर्तन आया है और भारत के शेष भागों से वे जुड़ रहे हैं। राष्ट्रीय एकात्मता का यह भाव बढ़ाने में इन प्रयासों का बहुत योगदान है।

      रत में मुख्य रूप से बंगाल प्रांत में धीरे-धीरे      अंग्रेजों ने अपना राज-पाट ज़मा ही लिया। सन १८३२ में चेरापूंजी, विशाल असम की राजधानी बनी। वहां होने वाली मूसलधार वर्षा के कारण १८६६ उसे शिलांग ले जाया गया। कोलकाता, ढाका, सिल्हट की घाटी से आना-जाना सुविधाजनक था। सन १८४१ में वेल्श कॅल्हिनिस्टिक मिशन के रेवरंड थॉमस जोन्स और उनकी पत्नी वहां गए थे। वे खासी बोली सीखे। उसे उन्होंने रोमन लिपि में लिखा। सन १८४२ में ‘खासी’ भाषा की पहली पुस्तक छपी। सन १८४३ में रेवरंड विल्यम लुईस और उनकी पत्नी आकर मिले। नॉग स्वलिया में पहला मिशन व चर्च बनाया गया।

      यह सब हो रहा था तब भारतीय युवक क्या कर रहे थे? जैसे-तैसे अर्थात् किसी भी प्रकार से अंग्रेजों की नौकरी प्राप्त करते थे। जल्द ही विवाह करके बहुत सारी संतानें पैदा होती थीं। अंधश्रध्दा और आपसी मतभेद तो थे ही।

      रियासतदारों को अंग्रेजों ने तैनाती फौज, शराब, शिकार, क्रिकेट और आपसी झगड़ों में उलझा दिया। यंत्र-युग के कारण आम आदमी का कामकाज, रोजी-रोटी ठप हो गई। दिन में दरिद्रता, रात को शराब का नशा। गांव-गांव में शराब की बोतलों के ढेर लगते थे, पर हर जगह अंधेरा नहीं था। बंगाल में राजाराम मोहनराय, महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले जाग उठे थे। बंगाल के अखबारों, पत्रिकाओं से वैचारिक जागृति हुई। महाराष्ट्र में महिलाओं की शिक्षा शुरू हुई। स्वामी विवेकानंद का चमकीले सूर्य के रूप में उदय हुआ। सर्वधर्म परिषद में उनका ही बोलबाला रहा। उन्होंने अद्वैत सिध्दांत प्रस्थापित किया। मिशनरियों के अच्छे-बुरे कामों की निंदा की। भारत में विचार-जागृति फैलाई; फिर भी उन्हें त्यागी कार्यकर्ता मिलना मुश्किल होता था। आगे चलकर परिस्थिति सुधर गई। अनेकों चरित्रवान संन्यासी मिले। रामकृष्ण मिशन का कार्य बढ़ता ही गया।

      इसी प्रेरणा से १९२४ में स्वामी प्रभनानंद (केतकी महाजन) ने ‘शेला’ गांव में कदम रखा। उन्हें खासी समाज की सेवा व संस्कृति का जतन करना था। उनके सच्चे कार्य को देखकर खासी लोग उनके अभिभूत हो गए।

      सेवा-कार्य में यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। स्थानीय लोगों की मदद से ‘शेला’ में प्राथमिक पाठशाला और स्वास्थ्य केंद्र शुरू हुआ। आगे चलकर यहीं मेघालय में पनपे महावृक्ष का मूल आधार साबित हुआ। विवेकानन्द का ध्येय सामने था।

      बहुत सारी पाठशालाएं खोलना, राष्ट्रीय एकात्मता को बल देना, सच्चाई, ईमानदारी का बीज बोना, आत्मविश्वास निर्माण करना, उन्हें सच्चा इन्सान बनाना।

      कार्य का प्रसार हुआ। खासी घाटियों में प्राथमिक पाठशालाएं स्थापित हुईं। स्थानीय लोगों के प्रोत्साहन से चेरापूंजी में सन १९३१ में पाठशाला तथा रामकृष्ण आश्रम की स्थापना हुई।

      स्वामी प्रभनानन्दजी और उनके सहयोगी मानवता, नैतिकता, सेहत का महत्व, संस्कृति का जतन, रामकृष्ण मिशन की विचारधारा के प्रसार में मग्न थे। अंग्रेजी राज, सरकारी और मिशनरियों का कट्टर विरोध होते हुए ऐसा करना आसान नहीं था। विवेकानन्द का आदर्श सामने था फिर उन निडर, उत्साही युवकों को कौन रोकता? पहाड़ी इलाका, मूसलाधार बारिश की परवाह न करते हुए वे गांव-गांव घूमे। लोगों से मिले, उनके साथ खाना खाया, सुख-दुख में शरीक हुए, उनकी भाषा सीख ली। शिक्षा, संस्कृति, राष्ट्रीयत्व पर आधारित किताबें छापीं। उन्हें वहां के स्थानीय ‘खासी’ में ढालने की कोशिश की। सन १९३४ में शिलांग में और आगे ‘जयंतिया’ पहाड़ी में ‘जोवाई’ में प्राथमिक पाठशाला खोली।

 चेरापूंजी का कार्यः-

 १)   संप्रति ९०० छात्र माध्यमिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पूर्व प्राथमिक से लेकर १०वीं तक, ३७ पूर्व प्राथमिक पाठशालाओं, १६ प्राथमिक पाठशालाओं, ९ माध्यमिक पाठशालाओं में मेघालय के ९००० छात्र (औसतन ५०% लड़कियां) शिक्षा ले रहे हैं।

 २)   गरीब उपेक्षित वन्य परिवारों के लिए स्वास्थ्य सेवा के तौर पर सेवाभावी दवाखाना एलोपैथी और होमियोपैथी सेवा उपलब्ध है। चार पहियों के फेरीवाले दो दवाखाने पैथालॉजी, दंत-चिकित्सक, क्ष-किरण सेवा इनमें शामिल है।

 ३)   चेरापूंजी के पुस्तकालय में अध्यापक और छात्रों के लिए १८,२४७ किताबें, १४ मासिक पत्रिकाएं, १२ अखबार, खासी, अंग्रेजी और बांग्ला में उपलब्ध हैं।

 ४)   मेघालय तथा पूर्वांचल के अंतर्गत क्षेत्र के गावों से छात्र आकर यहां अपनी इच्छा से प्रवेश लेते हैं। चेरापूंजी और शोमानपूंजी में १२० छात्र छात्रालय में रहते हैं। सब छात्रों के लिए राष्ट्रप्रेम और सत्चरित्र महत्वपूर्ण है। उनके गुण-संवर्धन पर बल दिया जाता है। स्वास्थ्य की जांच निःशुल्क है।

 ५)   गांव में दृक्-श्राव्य कार्यक्रम दिखाकर बच्चों को प्रारंभिक ज्ञान, संस्कृति, परंपरा, भारत देश की विविधता में एकता दिखाई जाती है। ये कार्यक्रम देखने के लिए तकरीबन एक हजार विद्यार्थी आते हैं।

 ६)   केन्द्र की मदद से ‘व्यवसाय प्रशिक्षण कार्यक्रम’ चालीस साल से चलाए जा रहे हैं।

 ७)   चेरापूंजी के आस-पास रहने वाले वन्य जनजातियों के गरीब बेरोजगार युवकों को संगणक, सॉफ्टवेयर मार्गदर्शन और प्रशिक्षण दिया जाता है। उन्हें कामकाज उपलब्ध होता है।

 ८)   यहां जनजाति की संस्कृति का वस्तु संग्रहालय है। पूर्वांचल की अनेकों वन्य जनजातियों की संस्कृति, परंपरा देखने को मिलती है। पर्यटक इसे देखना पसंद करते हैं।

 ९)   इसके अलावा शोरूम, बेकरी, डेयरी, बढ़ई काम, छपाई (मुद्रण) ऑटो गराज, इमारत-निर्माण तथा देखभाल इन कामों का जतन करना। इतनी विशाल संस्था की सेवा में आपात्-काल तथा प्राकृतिक समस्याओं से जूझने के लिए भी विभाग तैयार रहते हैं।

      आश्रम में रामकृष्ण की रोज पूजा होती है। श्री रामकृष्ण, शारदा देवी व स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के वार्षिकोत्सव, विश्वकर्मा (ब्रह्मा) पूजा भी हर साल जोरशोर से मनाई जाती है। रामकृष्ण जयंती के दिन संस्था के ६१ विभाग की जनजातियां, विद्यार्थी, अध्यापक भी उपस्थित रहते हैं। ‘शोभायात्रा’ निकलती है। प्रसाद बांटना, प्रवचन, लोकनृत्य आदि कार्यक्रम होते हैं।

      स्वतंत्रता सेनानी स्व. पुरकायस्थ जी ने यहां से २० कि.मी. पर शोमानपूंजी में सन १९२८ में प्रारंभिक पाठशाला खोली। अब वह रामकृष्ण आश्रम से जुड़ गई है। उपकेन्द्र के तौर पर काम करती है। ८५ सालों से यह संस्था भारत के कोने में कार्यरत है।

      शेला की दुर्गापूजा- उमियान नदी के किनारे पर शेला का दुर्गा मंदिर स्थित है। उच्च वर्ग के अनेक लोग पढ़ने-लिखने हेतु कोलकाता जाते थे। कइयों ने तो रामकृष्ण आश्रम से मंत्रदीक्षा भी ली थी। दुर्गा-पूजा के लिए सिल्हट जाने पर भी उन्हें हिंदू होटल में जगह न मिलती थी। स्वामी प्रभनानंदजी ने इसमें सुधार किया और सन १९३१ में ‘शेला’ में ही दुर्गापूजा की शुरुआत की। खासी लोगों ने मनःपूर्वक उसका स्वागत किया। दुर्गापूजा और दीवाली के त्यौहार पर शेला गांव के लोगों में उत्साह का संचार होता है। स्थानीय भक्त हर प्रकार से सेवा करते हैं। संगीत, नृत्य, पौराणिक नाटक, दीपों की रोशनी से त्यौहार में चार चांद लग जाते हैं। नारतियांग में रामकृष्ण आश्रम में दुर्गा मंदिर का जीर्णोध्दार किया गया है।

      विगत २५-३० सालों से मेघालय और पूर्वांचल में रामकृष्ण मिशन के अतिरिक्त संघ-परिवार (वनवासी कल्याण आश्रम, जनजाति विकास परिषद, सेवाभारती) विवेकानंद केंद्र इत्यादि का भी कार्य जारी है। माता अमृतानंदमयी, पांडुरंगशास्त्री आठवले, श्री श्री रविशंकर का भी कार्य चल रहा है। आशा है कि इन सबके द्वारा बहुत जल्द ही पूर्वांचल की जनजातियों का भारत से गहरा मैत्रीपूर्ण रिश्ता स्थापित जो जाएगा।

 

 

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