बुद्ध जयंती: सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बनने तक का सफर

महात्मा बुद्ध का जन्म ईसा से करीब 563 वर्ष पूर्व वैशाख माह में पूर्णिमा के दिन एक क्षत्रिय राजा के घर में हुआ था तभी से हर वर्ष वैशाख माह के पूर्णिमा को हम बुद्ध जयंती मनाते है और इसलिए इस पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस वर्ष बुद्ध पूर्णिमा 26 मई को है। बुद्ध पूर्णिमा का बौद्ध अनुयायियों के साथ साथ हिन्दू धर्म में भी विशेष महत्व है। बिहार में स्थित बोधगया स्थान एक पवित्र स्थल माना जाता है जिसके दर्शन के लिए पूरी दुनिया से लाखो श्रद्धालु आते है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन यहां करीब एक महीने का मेला भी लगता है जिसमें दूर दूर से लोग यहां आते है।

हमने बहुत से पुस्तकों में यह पढ़ा है कि गौतम बुद्ध ने मात्र 29 वर्ष की आयु में अपना घर छोड़ दिया था और सन्यासी जीवन जीना शुरु कर दिया था। एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्होंने कई सालों तक तपस्या की जिसके बाद उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ। बाद में वह स्थान बोधगया के नाम से विश्व विख्यात हो गया। बुद्ध ने भी ज्ञान प्राप्ति के बाद पूरी दुनिया का भ्रमण किया और दुनिया को एक नई रोशनी दिखायी। समय के साथ साथ बुद्ध के अनुयायी भी लगातार बढ़ते गए और आज भारत के अलावा चीन, नेपाल, थाईलैंड, सिंगापुर, वियतनाम, जापान, कंबोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, म्यांमार और श्रीलंका में भी बुद्ध को मानने वाले लाखों लोग है।

श्रीलंका सहित कई देश बुद्ध पूर्णिमा के दिन को वैशाख उत्सव के रूप में मनाते है और इस दिन घर पर दीप जलाकर भगवान बुद्ध का स्वागत करते है। वैशाख उत्सव के दिन दीपों से घरों को सजाया जाता है और बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी और जल को विशेष रूप से प्रभावित करता है जिससे संसार में एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है इसलिए पूर्णिमा के दिन वातावरण में एक विशेष ऊर्जा का आभास होता है।

गौतम बुद्ध का जन्म लुंबिनी में क्षत्रिय राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था इनके जन्म के सात दिन बाद ही इनकी माता महामाया का निधन हो गया जिसके बाद इनका लालन-पालन इनकी मौसी ने किया। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ एक राजा के पुत्र थे इसलिए उन्हे एक युवराज की तरह शिक्षा दीक्षा दी गयी और सही समय पर उनका विवाह भी एक रानी से करवा दिया गया लेकिन दुनिया का यह भोग विलास सिद्धार्थ को पसंद नहीं आया और मात्र 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस पारिवारिक जीवन को त्याग दिया। बुद्ध के कड़ी तपस्या की और उन्हे ज्ञान प्राप्त हुआ बाद में उन्होंने दुनिया का उपदेश दिया और अहिंसा का पाठ पढाया। बुद्ध ने अपने एक अनुयायी कुंडा के घर पर भोजन किया जिसके बाद वह बहुत बुरी तरह से बीमार पड़ गये और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी। ऐसा कहा जाता है कि वह भोजन कई दिनों का था और वह विषाक्त हो चुका था लेकिन भगवान बुद्ध ने उसे प्रेम वश ग्रहण कर लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी।

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