स्व.भुजंग लक्ष्मण वेल्हाल उपाख्य अप्पाजी

स्व.भुजंग लक्ष्मण वेल्हाल उपाख्य अप्पाजी
जन्म        :-  १९ /१२/1922
स्वर्गारोहण:-  ०१/०८/२०२१
भारत के उत्तर पूर्वांचल के मणिपुर राज्य के इंफाल से ४० कि.मी.दूर थोबाल जिलेके काकचिंग गाव में वनवासी कल्याण आश्रम का बालक छात्रावास है।जिसमें मरींग नागा जनजाति के अधिकांश बालक रहते हैं।सन १९८९ क दिसंबर माह था।जबरदस्त ठंड रहती है।मेरा क्षेत्र देखने की द्रष्टि से पहला प्रवास था।मणिपुर क्षेत्र की पहचान  करने के लिए गया हुवा मै सुहास अंबादास पाठक

मैंने जैसे ही काकचिंग छात्रावास के अंदर प्रवेश किया पहली नजरमें बरामदे में बैठे सफेददाढी धारी,धोती कुर्ता वेष में प्रसन्न हास्य मुखधारी व्यक्तित्वको देखा मेरा मन उनकी ओर खिचता गया।परीचय उपरान्त गपशप का मौका मिला तो मैनै अप्पाजिसे पुछा ६६ वर्ष की आयु मे वानप्रस्थाश्रम मे जहाँ का खानपान भाषा ,रीती रीवाज  हवामान महाराष्ट्र से भिन्न हैं यहा कैसे आना हुवा?आप का परीचय चाहता हु।

महाराष्ट्रके राजा शिवछत्रपती के गुरु श्रीराम भक्त हानुमानजी की कृपा जिनपर थी ऐसें समर्थ रामदास स्वामीजींने स्वयं जीन 11 हनुमानजी की मूर्तीया स्थापित की थी उसमे से सातारा जिल्हे के कराड तहसील मे कृष्णा नदी के किनारे बसा हुवा उंब्रज गावमें मेरा जन्म हुवा।बचपन कृष्णा नदी मे तैरना ,व्यायाम करना ,विद्यालय में जाना ।मेरी प्राथमिक शिक्षा उंब्रज गाव में हुई।मै ८  वर्ष क का था तब माताजी का.स्वर्गवास हुवा पिताजी 2 भाई,1बहन ऐसे 5 लोग हम थे।घरकी परीस्थिती गरीबी की थी। खानपान मे कपडे में कटोती होती. थी।पिताजी ने शिक्षा जरूर दी।1936 मे  ह्वनँक्युअर फायनल हुवा।

होशीयार विद्यार्थी था।मिडलस्कुल स्काँलरशिप शिप परीक्षा उतीर्ण हूवा।₹ 4/- स्काँलरशिप  मिलती थी। हायस्कुल के लिये कराड के.तिलक विद्यालयमे प्रवेश लिया।1936/37 एक वर्ष मे 5,6,7 कक्षा का अंग्रेजी अभ्यास पूर्ण किया।इसवर्ष.स्काँलरशिप मे बढोतरी होकर.₹ 6/- हो गई।1936 से 1941 तक मिलती थी।घर का खानपान उसीपर होता थाँ लेकीन वह कम पडते थे,इसलिए क्लास tuition लेकर पैसेका प्रबंध किया।मतलब पढ़ाई करते समयसे ही घरके लिए अप्पाजि कमाने लगे।1935 में कराड में रा.स्व. संघकी शाखा प्रारंभ हुई।1936 में अप्पाजिका संघ प्रवेश  भोजन के लिए भोजनालयमे जाते थे वहाँ श्री.रामभाऊ पंवार जीने करवाया।1936 से 1941 तक कराड के बौद्धिक प्रमुख थे।सप्ताह में एक दिन 20 की.मी. सायकल पर संपर्क के लिए जाते थे।

1936 में परम पूजनीय डॉक्टर हेडगेवारजी कराड़ में प्रवास हुवा। सभी शाखाओंका एकत्रीकरण हुवा । उसमे डॉक्टरजीका  बौद्धिक सुननेका सौभाग्य मिला। रात्री 10 बजे बैठक में जाना हुवा।1941 में  मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण होकर 1941 मे पुणें मे  फर्ग्युसन कॉलेज मे प्रवेश लिया। डेक्कन जिमखाना की वैदिक शाखा मे प्रवेश लिया।मंडल बौद्धिक प्रमुख का दायित्व था।इसके अलावा कोथरूड मे शाखा की  जिम्मेदारी दी.
गयीं।

1941 वर्ष बीत गया।अब एक नई समस्या सामने आगयी ।मेरे बड़े भाइसाब  ने  1942 अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेनेके कारण उनको  कारावासमें डाल दिया।उसके कारण कॉलेज छोड़ना पड़ा और मिलिटरी एकाउंट में नोकरी प्रारम्भ की। क्लासेस भी चलाए।प्रात: कॉलेज और बादमें काम ,शाखा अपने लिए थोडे पैसे बाकी ,सारे घरमें भेजते थे।1945 में भाई कारावास से मुक्त हुवे।अब अप्पाजीने  पुणे के  एस.पी. कॉलेज प्रवेश लिया।1943 में संघ शिक्षा वर्ग पूर्ण हुवा।
1947 में  बी.ए. किया।

1947 मे महाराष्ट्रके रायगड जिल्हे के पेण तहसीलमे संघ के प्रचाराक नियुक्त हुवे।1948 के जनवरी मासमे महात्मा गांधी जी की हत्या का बहाना ढुंडकर संघपर प्रतिबंध लगादीया।अप्पाजी को पकडकर ठाणे के जेलमें 3 माह कारावास हुवा। गंभीर परीस्थिती देखकर प्रचारकोंको घर जानेके लिये कहां,अप्पाजी पुणे आ गये।पुणे में “दैनिक भारत ” नामसे समाचार पत्र प्रारंभ करनेका तय हुवा।अप्पाजी पहले वार्तांकन करते थे बादमें संपादन विभाग में जिम्मेदारी आगयी। 6 माह के अंदर ही संघपर लगे पाबंदी के विरोधमे सत्याग्रह करनेका निर्णय हुवा और सब प्रचारकों को अपने कार्यक्षेत्र मे जानेके लिए कहा गया।और अप्पाजी पेण में रहकर पत्रक बनाकर बांटना और बुलेटीन निकालना वो काम भी छिप छिप कर करने पडते थे।जंगलमें छुपकर रहना होता था।इस कारण उनको मलेरिया हो गया।वैद्य के सलाहपर  अप्पाजी को नासिक जिलेके येवले और चांदवड दो तहसिलका दायित्व मिला।

1947 से 1952 तक अप्पाजि प्रचारक रहे।घरकी परिस्थिति के कारण अप्पजिने नोकरी करनेका निर्णय लिया।कर्जत जिल्हा रायगड़ में पाठशालामे 1952 से 1953 तक अध्यापन कार्य किया।बादमे कुछ कारणवश वहां से बाहर आगये।
नगर जिलेके कोपरगॉव तहसिलमे पाठशालामे शिक्षक की नोकरी की। आप हमारे विद्यालयमे रहकर संघ आरएसएस का कार्य नहीं कर सकते ,ऐसा कहा,अप्पाजि ने नोकरी छोड़ दी।कोपरगावमे रहकर  3 वर्ष ट्यूशन क्लास चलाये। इस समय श्री. हेमंत सोमन साथ मे थे।बादमे वे गोवा मुक्तिसंग्राम में गोवा चले गये।

संघ के अधिकारी मा. श्री. माणिकराव पाटिल और श्री. राजभाउ झरकर जीकी सलाहपर जिल्हास्थान नगर में आगये।1956 में अंग्रेजीके ट्यूशन क्लास प्रारंभ किये।1988 तक 32 वर्ष क्लास चलाये।अप्पाजी स्वयं अविवाहित थे।लेकिन भाई के लड़के लड़की नगर में पढ़ने हेतु पासमे थे।अप्पाजी की क्लास की ट्युशन  फीज भी कम थी।30% विद्यार्थी फीस नही देते थे।प्रात: 6;30 से शाम 6:30  तक ट्यूशन क्लास चलते थे।अनुशासन का कड़ा पालन करवाते थे।सरकार के नियम के अनुसार आयकर भी भरते थे।

नगर के वास्तव्यमे  संघ के विविध दायित्व को निभाते थे।विश्वहिंदू परिषद का कार्य नया था,लोगोंसे मिलना कार्य के लिए निकालना ,कार्यकारिणी गठीत करना।12 साल तक यह किया। कार्यकर्ता तयार होने के बाद काम को सौप दिया।
“संघयुग”नामका साप्ताहिक प्रारंभ किया।
नगरमे रहते हुवे पुणेके एकता मासीक में “परतंत्रता से वैभवकी ओर “इस विषयपर  शेषाद्री  नामसे लेखमाला चलाई।
स्व. अटलबिहारी वाजपेयी और स्व. जगन्नाथ राव जोशी के ऊपर विशेषांक की जिम्मेदारी भी अप्पाजिने निभाई।
1975 के आपातकाल में अप्पाजी को मीसा कानुन के.अंतर्गत 13 माहतक नाशिक कारावास में  बंदी थे।

अप्पाजी ब्रह्मचारी थे,लेकीन भतीजा,भतीजी को पढाने के लिये और घरमें पैसे देने हेतू क्लास  का व्यवसाय किया।आपातकाल में घरमें काम करनेवाली बाई को कहा अब मैं आपको पैसा नही दे सकता आप काम छोडकर जाईये,लेकिन बाई ने कहा दादा जी आप चिंता मत कीजिए मै इन बच्चों की तरफ देखुंगी।और उसनें अपना वादा निभाया।
अप्पाजी ने भतीजी और भतीजों की पढाई पूरी करने के बाद क्लास बंद करने का निर्णय लिया था और 1988 में क्लास बंद.कीये ।
” अब त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्ःशुभामाशीषं देहि तत्पुरतये”
पुन:श्च अपने ध्येय की तरफ लौट आए ।

1988 को उत्तर पूर्वांचल के  अधिकारी मान्यवर श्री वसंत राव भट पुनामे आये थे तब उन्होंने  कहा था कि उत्तरपुर्वांचलमे तन,मन,धन की आवश्यकता है।युवा और वानप्रस्थी  पूर्णकालिक कार्यकर्ताओंकी आवश्यकता है।तब संघके अधिकारियोंने कहा अप्पाजी तयार है।अप्पाजिसे वसन्त रावजीकी बातचीत हुई।और मणिपुर जानेका निश्चित हुवा।1988 को अप्पाजी ने नगर का क्लास की जगह छोड़ दी, अपनी पूंजी रिश्तेदारोमे ,घरमे काम करने वालोंको बाट दी।तब उनके विद्यार्थी बोले आपके पास कुछ रहने दीजिये आप बीमार होगए इतने दूर जा रहे है तो पासमे कुछ रखिये,तब अप्पाजिने कहा मैं बीमार पडूंगा नही ,मेरी चिंता संगठन करेगा ,और अप्पाजी सही अर्थ में कभी गंभीर बिमार नही हुवे।1988 को मई मासमें अप्पाजी मणिपूर में इंफाल से 40.की.मी.दूर थोबाल जिलेके काकचिंग छात्रावास में बालक छात्रावास में आगये ।

कल्याण आश्रम के संस्थापक अध्यक्ष श्रध्देय बालासाहब देशपांडे जी कहते थे ,अपने छात्रावास के बालकोंको अपनी पम्परा,रीतिरिवाज, संस्कृती की रक्षा करनेवाले   संस्कारित ,स्वाभिमानी ,समाजका नेतृत्व करनेवाले,अनुशासित वनवासी शिक्षित युवकोंकी, स्वधर्माभिमानी फौज कल्याण आश्रम के कार्य लिए निर्माण करनेका माध्यम छात्रावास है।
अप्पाजी स्वयं शिक्षा के प्रति आग्रही थे ही।श्रध्येय बालासाहेब जी के उदिष्ट पूर्ण करनेके लिए छात्रावसमे  अनुशासन,प्रात:जल्दी उठना व्यायाम, और अध्ययन पढाई यह जरुरी है।इन सभी बातोंपरजोर देकर कार्य करते थे।

एकात्मता स्तोत्र जो हमारे ऋषियों,संतो,ऐतिहासिक महापुरुषों, वैग्यानिकों, स्वतंत्रता सेनानियों, भारत गौरव का यह स्तोत्र का गायन और उसका अर्थ बताने के बाद हम को भी प्रेरणा मिले और मातृ भू मैं भी तेरी सैवामे लगजाऊंगा यह भाव निर्माण होता है।काकचिंग छात्रावासमे मरींग नागा जनजाति के बालक रहते थे,उनको  एकात्मता स्तोत्र शुध्द आना चाहिए इसलिये उदाहरण के लिये
ॐ सच्चीदानंद रुपाय नमोस्तु परमात्मने
ज्योतिर्मय स्वरूपाय विश्व मांगल्यमुर्तये
इसमे एक शब्द सच्चीदानंद यह एक शब्द  50 बार रटवाते थे।अर्थ भी  बताते थे! अप्पाजी मणिपुरी भाषा जानते थे,आवश्यक बातचीत भी बालकोंसे करते थे।बालक भी थोड़ी हिंदी, अंग्रेजी जानते थे। मणिपुर में भारत के विभिन्न प्रांतोसे कार्यकर्ता आते थे ,उनके लिये मणिपुरी इन टू हिंदी, मराठी, इंग्लिश  शब्द कोष बनाया था।

अप्पाजी अपना काम स्वयं करते थे।आश्रम के बालकोंको भात मुलायम  पसंद नही था।रोटी भी पसंद नही थी।अप्पाजी को उम्र के कारण भात मुलायम लगता था, रोटी भी मुलायम लगती थी।स्वयम अपना खाना ,नाश्ता बनाते थे।
काकचिंग में रात को लाइट डिम रहती थी।प्रात: 3:00 बजे फुल होल्टेज रहता था,इसलिए 3 बजे उठना चाय लेकर अंग्रेजी पेपर पढना और.4:30 बजे बालकोंको जगाना।आश्रम के बालक अप्पाजीको कहते थे जी हमारे गांवमें बुजुर्ग व्यक्ति देरसे उठना, बीड़ी, शराब पीते है,लेकिन आप तो बहुत काम करते है।

1988 से 2002 तक 14 वर्ष मणिपुरमे रहना यह साधना है।अशान्त क्षेत्र वहां उस समय कभी 48 घंटा बंद कभी 72 घंटा बंद यह आतंक वादी संगठन करते थे।अपने सारे कार्यक्रम रद्द करके बैठ जाना,मन  अस्वस्थ होता हैं!लेकिन अप्पाजी डटकर रहे यह विशेष बात थी ।80 वर्ष की आयु के बाद अप्पाजी मणिपुरसे दादरा नगर हवेली आगये, हमारा दोबार एकत्र आना हुवा।
सूर्यनिकेतन मोटा राँधा में बालक छात्रावास था, उम्र के कारण अप्पाजीको युवा छात्रावास प्रमुख को मार्गदर्शन करते हुवे तयार करना यह काम था।परंतु अप्पाजी प्रात: 5:00 बजे बालकोंको जगाने का कार्य करते रहे।

अप्पाजी सेलवास में बैठक के लिये आते थे ,तो दो दिन के बाद आते थे।राँधा यह दूर था, आजके जैसी बसोंकी सुविधा नहीथी अप्पाजी प्रात:5:00 बजे घंटी बजाते थे ,उसका आवाज सुनकर लोग जग जाते थे।लेकिन अप्पाजी बाहर रहते थे तब यह घंटी नही बजती थी, तो लोग अप्पाजी को मिलने के लिए आते थे हमारी बस  देरसे उठनेके कारण पकड़ नही सके,इतनी नियमित ता थी।वनवासी बालकोको अंग्रेजी विषय कठीन जाता था।अप्पाजी सरलतासे अंग्रेजी विषय सिखानेके अभ्यस्त थे।राँधा छात्रा वासके बालक क्लास में  बैठनेके लिए तयार नही होते थे,प्रेमसे, कभी डांटकर अभ्यास में बिठाते थे।धीरे धीरे आदत लग गयी और पढाईके समय आकर बैठ ते थे।

विद्यालयमे हरवर्ष अधिकारी आकर निरीक्षण करते है, एक क्लास पर अंग्रेजी विषय का अभ्यास लिया प्रश्न पूछे तो बालकोने सही जबाब दिये, उनसे पूछा इतने विद्यार्थियोंमें से आप 4 बालकोने जबाब दिए,बालकोंका अभिनंदन किया।आप कहाँ रहते है
तब बालकोने कहा वनवासी कल्याण आश्रम में रहते है!अप्पाजी हमको अंग्रेजी सिखाते है।तब अधिकारियोंने स्टाफ को कहा आप भी यह  मेहनत क्लासपर कीजिये सभी बालक तेज बनेगे।
राँधा को श्रध्येय रामभाऊ गोडबोले जी देवभूमि कहते थे।अप्पाजीका निवास सबको प्रेरणा देता था।
अप्पाजीकी विशेषताए थी।

अप्पाजी निर्भय थे, मणिपुरका माहौल अशान्त रहता था!अभी स्थिति अच्छी है लेकिन उस समय अशान्त मणिपुर था।अन्य राज्य के लोगोंको बाहर निकाल देना उग्रवादी लोगोंमें भेद निर्माण करने के सारे प्रयत्न करते थे,उस माहोलमें ऐसा विचार किया गया की अप्पाजीको सुरक्षा की दृष्टीसे इम्फाल रखेंगे, कार्यकर्ता गये, उनको चलनेके लिए कहा परंतु अप्पाजिने कहा आप चिंता मत कीजिये कुछ नही होगा मैं आश्रममे रहूंगा और रहे।अपने लिए कठोर परंतु दुसरेके लिए उदार थे।

स्वभाव गरम था, परंतु संघ कार्य में आनेके बाद बदल किया।
किसी के ऊपर अन्याय वह सहन नही करते थे।उसको सभी प्रकारकी मदद हिम्मत देते थे।विविध प्रकारकी पुस्तके पढना यह उनकी रुची थीं।और कुछ महत्वपूर्ण बात हैं तो अंडर लाइन करते थे।ज्योतिष का ज्ञान था।अभ्यास था।कुंडली बनाते थे, मार्गदर्शन करते थे।बचपन गरीबीमे बीता इसलिए मितव्ययी थे।दिनचर्या में कही भी जाएंगे तो बदल नही करते थे।व्यायाम,प्राणायाम यह नित्य करते थे।उम्र के 91 वर्ष की आयु में वृद्धावस्ता के कारण सन 2011 से. समाज कार्यसे निवृत्त होकर अपनी भतीजी श्रीमती अरुणा ताई जीके पास कर्जत में रहते थे  स्वस्थ थे।

अभी 15 जुलै को घर में गिरगये,थोडा फ्रैक्चर हुवा ऑपरेशन हुवा।21 जुलै 2021 को कर्जत गये।अबतक  किसी को अपनी सेवा नही करने दी!बेडपर सोना कुछ कर नही सकना यह उनको पसन्द नही था, मन ही मन अनंत की यात्रा शुरू कर दी थी।
1 अगस्त 2021 को रात 11:35 को 99 वर्ष 7 महीने की आयु में शांत हुवे।

अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रमके पूर्व संगठन मंत्री,पूर्व महामंत्री वर्तमानमे संघ के कार्यकारिणीके सदस्य  मा. श्री.गुणवंतजी कोठारी जीने अपने पत्र में लिखा
प्रिय बंधु सुहासजी
श्री.भुजंग लक्ष्मण वेल्हाल जी उपाख्य अप्पाजी के निधन का समाचार आपसे मिला।2020 कि दीपावली पर मुम्बई के प्रचारकोंके साथ लगभग डेढ़ घंटे तक उन्होंने बातचीत की। 99 वर्ष की आयु में भी उनकी स्मृति,सिद्धावस्था में बैठकर सभीकी जिज्ञासाओंका उत्तर दीया।नियमीत व्यायाम,संयमित आहार,तथा प्रसन्नता (कोई बीमारी नही,कोई दवा नही)अपने सुदीर्घ जीवन का कारण बताया।

६६ वर्ष की आयुमें कल्याण आश्रम के आवाहन पर इंफाल से 40 कि.मी.दूर काकचिंग में एक छात्रावासमें 14 वर्ष तक कार्य कीया।80 वर्ष पूर्ण होनेपर मुंबई आये।उनके विदाई कार्यक्रम में मुझे उपस्थित रहनेका सौभाग्य मिला।प्रसिध्दी परांगमुख समर्पित जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायी है।परमात्मा अपने श्री चरणोमें उन्हे स्थान देवे।
शोकाकुल सभी परिवार जनोंको इस असीम दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।

ॐ  शांती :शांती :शांती : ॐ

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