जयंती: युगों युगों तक अमर रहेंगे महाराजा अग्रसेन

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भारतवर्ष में ऐसे तमाम देवी-देवताओं और राजाओं ने जन्म लिया है जिन्हे युगों युगो तक याद किया जाता रहेगा। ऐसे युगान्तर राजा के बताए मार्ग पर लोग आज भी चल रहे हैं। ऐसे लोगों को उनके सेवाभाव, प्रेम और उनकी नीति के लिए जाना जाता है। महाराजा अग्रसेन भी ऐसे…

सिद्धि और साधना का पर्व शारदीय नवरात्र

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केरल में नवरात्रि देवी सरस्वती के सम्मान के रूप में  मनायी जाती है। इन नौ दिनों को केरल में सबसे शुभ माना जाता है। तमिलनाडु में नवरात्रि के समय गुड़ियों का एक प्रसिद्ध त्योहार मनाया जाता है, जिसे बोम्मई कोलू कहा जाता है।

दाह-क्रिया एवं श्राद्धकर्म का विज्ञान

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मादा कौवा सावन-भादों यानी अगस्त-सितंबर में अंडे देती है। इन्हीं माहों में श्राद्ध पक्ष पड़ता है इसलिए ऋषि-मुनियों ने कौवों को पौष्टिक आहार खिलाने की परंपरा श्राद्ध पक्ष से जोड़ दी, जो आज भी प्रचलन में है। दरअसल इस मान्यता की पृष्ठभूमि में बरगद और पीपल वृक्षों की सुरक्षा जुड़ी है, जिससे मनुष्य को 24 घंटे ऑक्सीजन मिलती रहे।

संवेदनशील भारत की सेवागाथा

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कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने रविवार 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ़्यू का आवाहन किया और 25 मार्च को सारे देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई।

महारानी दुर्गावती ने जब अकबर को दिया था लोहा, जबलपुर में आज भी होती है इस वीरांगना की पूजा

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  आज हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति बची है तो उसके लिए कुछ लोगों को अपना बलिदान देना पड़ा था जिसमें एक नाम महारानी दुर्गावती का भी है। महारानी ने अपने राज्य, देश और आत्मसम्मान के लिए शस्त्र धारण किया और अंतिम समय तक मुगलों से लड़ते हुए अमरत्व…

वैश्विक हिंदुत्व ख़त्म करने का षड़यंत्र

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इनके इस पूरे क्रियाकलाप को यदि आप टुकड़ों में देखेंगे तो वामपंथ समझ में नहीं आएगा परंतु जब अनेक घटनाओं, अलग-अलग परिदृश्य को एकसाथ जोड़कर देखेंगे तो समझ आएगा कि जो स्वयं पर सिविल सोसाइटी लबादा ओढ़े हैं। उस लबादे के पीछे कबीलाई या कहिए वहशी जानवर छिपे हैं। ये सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है।

आधुनिक विज्ञान के अनुकूल वैदिक ज्ञान…

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हम भारतीय के रूप में महान संतों और हमारे पूर्वजों द्वारा लिखे गए पवित्र वेदों और हिंदू संस्कृति के ग्रंथों के गहरे और वास्तविक अर्थ को समझने में विफल रहे हैं।  मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो हमारे प्राचीन काल के किसी भी ज्ञान को कहानी के माध्यम से दिखाने…

अद्धभुत, अकल्पनीय अभियांत्रिकी से दमकता नया भारत

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बहुत पुरानी बात नही है जब सरहद पर मीटरों के फासले दिनों में तय हो पाते थे,आज किलोमीटरों का सफल मिनिटों में पूरा हो रहा है।इंच इंच रास्ता संघर्ष को आमंत्रित करता था अब मीलों की सुरंग भारत की संप्रभुता,सम्मान और सक्षमता की कहानी बयां कर रहीं है।यह नया भारत है। अपनी सीमाओं की चौकसी में खड़ा हर दुश्मन की आंख में आंख डालकर चुनौती को स्वीकार करने।यह भारत की अद्धभुत इंजीनियरिंग का नया अध्याय भी है जिसे देखकर पूरी दुनियां चकित है।एफिल टावर ,स्टेचू ऑफ लिबर्टी की ऊंचाइयों को अब भूल जाइए।गगनचुंबी ऊंचाइयों पर अभियांत्रिकी को देखना है तो कश्मीर की वादियों में आइए,केवडिया में माँ नर्मदा के तट पर पहुँचिये,यहां नए भारत की मेधा,कौशल और इंजीनियरिंग आपको नए संकल्पों से रु- ब -रु कराते मिलेंगे।हजारों साल पहले जिस वास्तु औऱ विनिर्माण तकनीकी से हमारे पूर्वजों ने,मठ मंदिर,किलों की स्थापत्य कला से दुनियां को परिचित कराया था, कमोबेश आज 21 वी सदी में भी भारतीय इंजीनियरिंग के नायाब कौशल की अनेक ऐसी ही कहानियां लिखी जा रही है।  आज विश्व की सबसे लंबी टनल हो या सबसे ऊंची प्रतिमा या फिर सबसे ऊंचा रेल पुल सब कुछ भारत के नाम पर है।यह भारत की महान एवं विज्ञान सम्मत इंजीनियरिंग विरासत को पुनर्प्रतिष्ठित करने जैसा भी है।आज हमारी अभियांत्रिकी का सिक्का दुनियां को अचंभित कर रहा है।यह सब हो रहा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिन्होंने भारतीय प्रतिभा को प्रतिष्ठित करने के अतिरेक प्रयासों को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा हुआ है।3428 किलोमीटर लंबी भारत की एलएसी पर आज कोई ऐसा क्षेत्र नही बचा है जहाँ पहुँचने के लिए हमारी सेनाओं को मौसम खुलने का इंतजार करना पड़े।सब दूर सड़कों,पुलों,सुरंगों का ऐसा संजाल मोदी सरकार ने खड़ा कर लिया है, जो दुश्मन देशों को बुरी तरह खटक रहा है।यह सब आज से 10 बर्ष पहले तक असंभव सा लगता था और तथ्य यह है कि तत्कालीन सरकारों की प्राथमिकता से बाहर ही था। केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने सदन में खड़े होकर स्वीकार किया था सीमावर्ती इलाकों में आधारभूत सरंचना विकास हमारी सामरिक नीति का हिस्सा नही है।यानी सीमाओं पर विकास में कांग्रेस की कोई रुचि नही थी।नतीजतन 1997 में सयुंक्त मोर्चा सरकार के समय तबके प्रधानमंत्री श्री एचडी देवगौड़ा ने असम-अरूणाचल को जोड़ने वाले जिस "बोगीवील पुल" का भूमिपूजन किया था उसे 2014 तक ठंडे बस्ते में पटककर रखा। 5920 करोड़ की लागत वाले इस पुल को मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकता में लेकर रिकार्ड समय में पूरा कर दिखाया।4.94किलोमीटर का यह पुल भारत के इंजीनियरों की अदम्य औऱ अद्धभुत क्षमताओं का उदाहरण भी है। असम के डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश के धकोजी जिले को जोड़ने वाले इस पुल पर आपातकाल में लड़ाकू विमान तक उतारे जा सकते है।हमारे इंजीनियर्स ने इसे  कुछ इस तरह डिजाइन किया है कि भूकंप औऱ बाढ़ जैसी आपदाओं में भी यह अगले 120 बर्षों तक यूं ही खड़ा रहेगा।पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के जन्मदिवस पर तीन साल पहले प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था।इस पुल ने न केवल असम और अरुणाचल को जोड़ दिया बल्कि चीन की सीमा तक रसद औऱ सेना भेजना मिनिटों में संभव कर दिया है। इस डबल डेकर पुल के ऊपरी तल पर तीन लेन सड़क एवं निचले तल पर ट्रेन का ट्रेक बनाया गया है।जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में यह पुल बॉर्डर रोड आर्गनाइजेशन के इंजीनियरों  ने  बनाया है वह भारतीय इंजीनियरिंग कौशल का अचंभित कर देना वाला पक्ष है। सीमा पर घात लगाए बैठे ड्रेगन लिए तो यह किसी सदमे से कम नही है।देश के इंजीनियर्स का यह कमाल यहीं तक सीमित नही है, बल्कि सामरिक महत्व के हर उस हिस्से में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है जो भारत की सम्प्रभुता,एकता और सीमाई अखण्डता के लिए संवेदनशील माने जाते रहे है। -लिपूलेख दर्रा सड़क से कैलाश मानसरोवर की सुगमता- 17500 फिट की ऊंचाई पर 80 किलोमीटर की यह सड़क बॉर्डर रोड आर्गनाइजेशन के इंजीनियरों के कौशल का एक  बड़ा ही महत्वपूर्ण उदाहरण है।इसके निर्माण ने चीन की सीमा पर हमारी सतत निगरानी को सुनिश्चित तो किया ही है साथ ही कैलाश मानसरोवर की दुर्गम यात्रा को भी सरल बना दिया है।2005 में इस प्रोजेक्ट को स्वीकृति मिली थी लेकिन इसका काम आरंभ हुआ 2018 में जब कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता वाले प्रोजेक्ट में शामिल करते हुए 440 करोड़ रुपए स्वीकृत किये।2022 तक इसे पूरा किया जाना था लेकिन देश के इंजीनियर्स ने इसे समय से पहले ही बना दिया।यह सड़क धारचूला को लिपूलेख(चीन बॉर्डर)से जोड़ती है।इस परियोजना "हीरक"के चीफ इंजीनियर विमल गोस्वामी के अनुसार सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस मार्ग के बन जाने से तवाघाटी के पास माँगती शिविर से शुरू होकर व्यास घाटी में गूंजी और सीमा पर भारतीय भूभाग में स्थित सुरक्षा चौकियों तक के 80 किलोमीटर से अधिक के दुर्गम हिमालयी क्षेत्र तक पहुँचना आसान हो गया है।इस नए मार्ग से की जाने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का लगभग 84 प्रतिशत हिस्सा भारत में है,केवल 16 फीसदी ही चीन में पड़ता है जबकि सिक्किम,काठमांडू मार्ग से जाने पर 80 फीसदी हिस्सा चीन में पड़ता था।खासबात यह भी है कि अब चीन के पांच किलोमीटर क्षेत्र को छोड़कर सम्पूर्ण यात्रा वाहनों से हो रही है।कैलाश का महत्व हिंदुओं के अलावा बौद्ध,जैन तिब्बतियों के लिए भी है।भारतीय इंजीनियरिंग ने इस यात्रा को भी अपने कौशल से सुगम्य बना दिया है। -एफिल टावर से ऊंचा रेल पुल बनकर तैयार- दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे पुल कश्मीर के रियासी में बन कर तैयार हो गया है।ये दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज जो कि एफ़िल टॉवर से भी 35 मीटर ऊंचा है. इसकी नदी तल से ऊंचाई 359 मीटर है।कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है इसे रेलवे लाइन के माध्यम से भी सिद्ध किया जाना एक सपने जैसा था लेकिन हमारे इंजीनियर्स ने इस सपने को भी अब पूरा कर दिखाया है। इस रेल लाईन से सेना को कश्मीर घाटी तक पहुंचने में 4 से 5 घंटे की बचत होगी. इस खबर से चीन काफ़ी परेशान हो रहा है।ये ब्रिज जम्मू कश्मीर के रियासी ज़िले में बना है। भारत का चिनाब ब्रिज एफ़िल टॉवर से भी ऊंचा है। स्ट्रेटजिक महत्व के इस ब्रिज के बन जाने से अब पूरी कश्मीर घाटी देश बाक़ी हिस्सों से जुड़ गई है। ये ब्रिज जम्मू के ऊधमपुर से लेकर कश्मीर के बारामूला तक बन रही रेल लाईन यूएसबीआरएल प्रॉजेक्ट का हिस्सा है। इस रेल लाईन के बन जाने से भारतीय सेना को भारत चीन बॉर्डर तक पहुंचने में न सिर्फ़ सहूलियत होगी बल्कि चार से पांच घंटे की बचत भी होगी। इस ब्रिज को बनाने के लिए भारतीय रेलवे के इतिहास की अब तक की इस सबसे ऊंची क्रेन का इस्तेमाल किया गया है। इससे, आसमान में क्रेन के रोपवे से लटक कर जाते भारी स्टील के ब्रिज सेग्मेंट अपनी निर्धारित सटीक जगह पर रखना हमारे इंजीनियर्स की अद्धभुत क्षमताओं औऱ निपुणता का उदाहरण है। अब रेल लाईन का ये डेक आगे बढ़ेगा और चिनाब आर्च के ऊपर बन रहे पुल से जुड़ जाएगा जिसके ऊपर रेल लाईन बिछाई जाएगी.  28 हज़ार करोड रूपए के इस प्रॉजेक्ट से कश्मीर से…

विज्ञान और रोजगार में संस्कृत की बड़ी भागीदारी

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आमतौर से भारत ही नहीं दुनिया में अंग्रेजी को विज्ञानऔर रोजगार की भाषा माना जाता है। किंतु अब यहमिथक व्यापक स्तर पर टूटता दिख रहा है। नई शिक्षानीति का यदि निष्पक्षता और ईमानदारी से पालन होता हैतो वह दिन दूर नहीं जब हम संस्कृत समेत अन्यभारतीय भाषाओं को पूर्ण रूप…

अपंग कल्याणकारी शिक्षण संस्था ने मनाया स्वतंत्रता दिन अमृत महोत्सव

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पुणे. वानवडी स्थित अपंग कल्याणकारी शिक्षण संस्था व संशोधन केंद्र में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ ध्वजारोहण कर ७५ वां स्वतंत्रता दिन अमृत महोत्सव मनाया गया. इस दौरान संस्था के सेवानिवृत्त कर्मचारियों सहित कोरोना योद्धाओं का सम्मान किया गया. प्रमुख अतिथि के रूप में सेवा सहयोग फाउन्डेशन के अध्यक्ष व…

स्व.भुजंग लक्ष्मण वेल्हाल उपाख्य अप्पाजी

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स्व.भुजंग लक्ष्मण वेल्हाल उपाख्य अप्पाजी जन्म        :-  १९ /१२/1922 स्वर्गारोहण:-  ०१/०८/२०२१ भारत के उत्तर पूर्वांचल के मणिपुर राज्य के इंफाल से ४० कि.मी.दूर थोबाल जिलेके काकचिंग गाव में वनवासी कल्याण आश्रम का बालक छात्रावास है।जिसमें मरींग नागा जनजाति के अधिकांश बालक रहते हैं।सन १९८९ क दिसंबर माह था।जबरदस्त ठंड रहती…

मारीशस के तुलसी अरुण-मृदुल सेवक सुखदाता

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अरुणजी का अवसान मारीशस में एक युग की समाप्ति है, किन्तु भारत भी अससे अछूता नहीं रहा है। अरुणजी ने जिस प्रकार से बीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध तथा इक्कीसवी सदी के प्रारंभ में समय की आवश्यकता के अनुरूप समाज को श्रीराम चरित से जोड़ने का सद्प्रयास किया, वह अभिनंदनीय तो है ही, किन्तु अनुकरणीय भी है।

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