चुनावी लाभ के लिए हुई कृषि क़ानूनों की वापसी ?

इस देश में अभी तक 3 शक्तिशाली प्रधानमंत्री हुए हैं जिनको अपने नाम के सहारे बहुमत मिला और जिन्होंने लंबे अरसे तक प्रधानमंत्री का पद संभाला । पहले नेहरू , दूसरी इंदिरा गांधी और तीसरे मोदी हैं ।
जब भी एक ताकतवर प्रधानमंत्री देश में रहा , उसने अपने व्यक्तिगत आभामंडल से ही सरकार चलाई , उसका राजनीतिक दल , संस्थाएं उसके अनुसरण में लगी रहीं । नेहरू जी ने देश की रक्षा नीति अपने हिसाब से चलाई और उसको बदला गया 1962 की हार के बाद । नहीं तो एटम बम्ब 1954 में भी बन सकता था ।
इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया और फिर दो साल बाद हटाया ।
मोदी ने 3 कृषि कानून बनाए थे कांग्रेस की सहकारी मंडी समितियों में गहरी घुसपैठ समाप्त करने के लिए , जहां से इनकी धनशक्ति आती है । साल भर जोर आजमाइश भी कर के देखी ।
लेकिन अंततः उत्तरप्रदेश , पंजाब के चुनाव ने मजबूर कर दिया।
सोचिए जरा , मोदी पंजाब चुनाव में एक भी बार चुनाव सभा न करते तो लोग क्या कहते । और अगर जाते तो बंगाल की तरह कितनी हिंसा होती ।
किसान आंदोलन तो ठंडा पड़ गया था पर आसन्न चुनाव में इनकी फंडिंग बढ़ जाती और राजनीतिक रूप से यह चुनाव में घाटे का सबब बनता ।
वैसे भी तीनों कानून ठंडे बस्ते में थे 2024 तक, सुप्रीम कोर्ट अलग से उसको देख रहा था । ऐसे में सिर्फ अहम का मुद्दा बनाए रखना चुनावी साल में घाटे का सौदा था ।
अब मोदी पंजाब में अमरिंदर सिंह को आगे कर के कुछ चुनावी फायदा ले सकते हैं और उत्तरप्रदेश में भी कुछ बेहतर परिणाम की आशा कर सकते हैं ।
भारत में तो रसूख वाले लोग बिना कानून के भी जो चाहते हैं , वह करते रहते हैं। बिना कृषि कानूनों के भी जिसे जहां जो बेचना है , वह बेचता रहेगा ।

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