समस्त महाजन की आकाशगंगा का धु्रव तारा – परेश शाह

भगवान की कृपा से समस्त महाजन संस्था में बड़ी संख्या में परोपकारी सज्जनों की लम्बी श्रृंखला है और उनमें से ही एक चमकता सितारा है समाजसेवी परेशभाई शाह, जो अपने सामाजिक कार्यों से पृथ्वी रूपी आकाशगंगा में ध्रुव तारे की तरह चमक-दमक रहे हैं।

हर युग में दैवीय कार्य करने के लिए ईश्वर किसी न किसी दिव्यात्मा को धरती पर भेजते हैं जो ईश्वरीय प्रेरणा से अपेक्षित धार्मिक कार्यों की पूर्ति करने में समर्थ हो। ईश्वरीय अधिष्ठान के आधार पर ही व्यक्ति विशेष में नि:स्वार्थ एवं परोपकार की भावना जागृत होती है और उसके द्वारा सत्कर्म होते हैं। भगवान की कृपा से समस्त महाजन संस्था में बड़ी संख्या में परोपकारी सज्जनों की लम्बी श्रृंखला है और उनमें से ही एक चमकता सितारा है समाजसेवी परेशभाई शाह, जो अपने सामाजिक कार्यों से पृथ्वी रूपी आकाशगंगा में ध्रुव तारे की तरह चमक-दमक रहे हैं।

बचपन में ही मेरे मन में संन्यास लेने की इच्छा बलवती हुई और मैं पू. जिंजी महाराज जी के पास गया, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि हमारे राष्ट्र व समाज को जितनी साधुशक्ति की आवश्यकता है, उतनी ही आवश्यकता परोपकारी सेवाभावी सज्जनशक्ति की भी है। इसलिए मैं तुम्हें अपना शिष्य स्वीकार नहीं कर सकता। महाराज जी के इस प्रेरक वक्तव्य का मेरे मन-मस्तिष्क-हृदय में बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। मुझे लगता है कि महाराज जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से ही मैं समाज व राष्ट्रहित में सेवाकार्य कर पा रहा हूं।

जान हथेली पर रखकर परेश शाह कर रहे थे  लोगों की सेवा-सहायता

कोरोना संकटकाल और लॉकडाउन में जहां अधिकतर लोग अपने घरों में रह कर अपनी एवं परिवार की सुरक्षा का पूरा ख्याल रख रहे थे, वहीं दूसरी ओर समस्त महाजन संस्था के ट्रस्टी परेश शाह अपनी जान को हथेली पर रखकर समाजसेवा में तल्लीन थे। जैसे एक सैनिक सीमा की सुरक्षा में डटा रहता है, उसी भांति परेश शाह समाज के गरीब, पिछड़े, दिहाड़ी मज़दूर आदि ज़रूरतमंदों की सेवा सहायता में दिन-रात जुटे हुए थे। उनसे प्रेरित होकर बड़ी संख्या में संस्था के अन्य पदाधिकारी व कार्यकर्ता सेवाकार्यों के लिए आगे आए और धीरे-धीरे सभी जगहों पर संस्था के सेवाकार्यों का विस्तार हुआ। सही अर्थों में उन्होंने कोरोनायोद्धा की भूमिका अदा की और लोगों के प्राण बचाने में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया। ऐसे समर्पित समाजसेवी की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।

भोजन रथ ने पूर्ण किये भूखे-प्यासे लोगों के मनोरथ

कहते हैं कि इस दुनिया में जिसे पेट भर कर खाना और पानी मिल जाए, उसे किसी से शिकायत नहीं होनी चाहिए। कोई भूखा-प्यासा ही इसका मर्म समझ सकता है। लॉकडाउन के दिनों में दिहाड़ी मज़दूरों सहित प्रवासी नागरिकों एवं ग़रीबों की भूखे-प्यासे रहने की नौबत आ गई थी। समाज की नस-नस से वाक़िफ़ परेश शाह ने तत्काल हालात का जायज़ा लिया और तुरंत रणनीति बनाकर भोजन रथ चलाने का प्रस्ताव संस्था के समक्ष प्रस्तुत किया। मंजूरी मिलते ही परेश शाह के नेतृत्व में मुंबई के गली, नाके, चौराहों से लेकर दूरदराज के दुर्गम भागों में भोजन रथ चलाये जाने लगे। जिसे समाज का सकारात्मक प्रतिसाद मिला। भोजन रथ के सामने लोगों की लम्बी-लम्बी कतारें लग जाती और भोजन करने के उपरांत जब उनकी आत्मा तृप्त हो जाती तो बुज़ुर्गों सहित महिलाएं सेवाकार्य करने वालों को दिल से आशीर्वाद देते थे। जिसके सामने दुनिया के बड़े से बड़े उपहार और खुशियां बौने नज़र आते थे।

संघ की शाखा में मिली सेवाकार्य करने की प्रेरणा

परेश शाह बाल्यकाल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं और सुरेन्द्र नगर, लिम्बड़ी स्थित शाखा के वह शिक्षक भी रहे हैं। महाविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े थे। कमोबेश सेवाकार्य करने का पाठ उन्होंने संघ से ही सीखा है। समस्त महाजन संस्था से जुड़ने के बाद उनके सेवाकार्यों में गति आई है। उनका समाज के प्रति इतना समर्पण भाव है कि उन्होंने अब तक 40 से अधिक बार रक्तदान किया है। इससे ही उनके सामाजिक कार्यों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

समस्त महाजन संस्था के सेवाकार्य

परेश शाह के नेतृत्व में समस्त महाजन संस्था की टीम ग्रामीण विकास, कृषि, जैविक खेती, गौ-पालन, गौवंश संरक्षण व संवर्धन, गौत्पाद रोज़गार, स्वरोज़गार एवं व्यवसाय, जीवदया, पौधारोपण, जल संरक्षण, स्वदेशी आन्दोलन, जन-जागरण, सामाजिक न्याय, मोटिवेशनल कार्यक्रम सहित गौशाला एवं पिंजरापोल को आर्थिक मदद, प्रशिक्षण जैसे अनेकानेक कार्यों में अनवरत जुटी हुई है। इसके साथ ही देव, देश, धर्म, संस्कृति, समाज, अहिंसा के लिए समस्त महाजन संस्था पूरी तरह समर्पित होकर कार्य कर रही है। इस संबंध में परेश शाह ने अपने वक्तव्य में कहा कि आर्य राष्ट्र की संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन हेतु जीवन भर जो कुछ भी करना पड़े, वह करने के लिए मैं सदैव तैयार रहूंगा।

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