शिक्षा का हो भारतीयकरण

शिक्षा किसी भी समाज एवं राष्ट्र की रीढ़ होती है। उसी पर उस राष्ट्र एवं वहां की पीढ़ियों का संपूर्ण भविष्य निर्भर करता है। शिक्षा के माध्यम से ही राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मूल्यबोध विकसित किए जाते हैं और निश्चय ही ऐसा किया भी जाना चाहिए। पारस्परिक एकता, शांति, सहयोग एवं सौहार्द्र की भावना को भी शिक्षा के माध्यम से ही मज़बूती प्रदान की जा सकती है। परंतु दुर्भाग्य से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी शिक्षा-तंत्र पर परकीय, औपनिवेशिक, वामपंथी, क्षद्म पंथनिरपेक्षतावादी एवं मैकॉले प्रणीत-प्रेरित सोच व मानसिकता ही सदैव हावी रही है। इतनी कि आज भी उनका विष-वमन शैक्षिक-सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण को प्रायः न केवल विषाक्त बना जाता है, अपितु विभाजन की रेखा को और पुष्ट एवं स्थाई कर जाता है। उन्होंने बड़ी कुशलता एवं कुटिलता से देश की नौजवान पीढ़ियों को अपनी जड़ों-परंपराओं-उच्चादर्शों-जीवनमूल्यों-मानबिंदुओं से पृथक करने का बौद्धिक षड्यंत्र किया है। जिसका परिणाम है कि अतीत के प्रति हीनता-ग्रंथि, वर्तमान के प्रति क्षोभ व असंतोष तथा भविष्य के प्रति संशय, अविश्वास एवं मतिभ्रम आज के युवाओं की प्रमुख पहचान बनती जा रही है।

पर चिर-परिचित ढिठाई से अपनी इस जड़विहीन-अराष्ट्रीय सोच को भी ये तथाकथित बुद्धिजीवी ‘भारत के भाग्योदय’ से जोड़कर प्रस्तुत एवं महिमामंडित करते हैं। जबकि शिक्षा का अ-भारतीयकरण ही भारत की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण और भारतीयकरण ही एकमात्र निवारण है। अपेक्षा थी कि 2014 में सत्ता-केंद्र बदलने के पश्चात शिक्षा के भारतीयकरण की दिशा में ठोस एवं निर्णायक पहल व प्रयास किए जाएँगें, पर देश के निष्पक्ष शिक्षाविद एवं आम प्रबुद्ध जन भी दबी ज़ुबान से अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि नई शिक्षा नीति के तमाम दावों और नारों के बीच विद्यालयों-महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों को संचालित करने वाली संस्थाओं-समितियों यानी सीबीएसई-एनसीईआरटी-यूजीसी आदि की रीति-नीति-पद्धत्ति, कार्य-संस्कृति में गुणवत्ता, उद्देश्य, पाठ्य-सामग्री, प्रभाव एवं परिणाम के स्तर पर कोई व्यापक बदलाव अब तक नहीं लाया जा सका है।

इन दिनों चल रही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की प्रथम सत्र की कक्षा बारहवीं की परीक्षा में ‘समाजशास्त्र’ विषय के अंतर्गत पूछे गए आपत्तिजनक प्रश्न ”2002 में गुजरात में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी हिंसा किस सरकार के कार्यकाल में हुई” के आधार पर तो इसी निष्कर्ष की पुष्टि होती है कि पूर्व की तरह आज भी निहित स्वार्थों एवं वैचारिक दुराग्रहों के खूंटे से बंधे वामपंथी एवं सूडो सेक्युलरिस्ट बुद्धिजीवी, अवसरवादी नौकरशाह आदि ही शिक्षा की रीति-नीति एवं दिशा-दशा तय कर रहे हैं। बल्कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शिक्षा के भारतीयकरण का इससे अधिक ईमानदार एवं गंभीर प्रयास तो 1998 से 2004 के गठबंधन सरकार के दौर में किए गए। और ऐसा भी नहीं है कि सीबीएसई की यह चूक केवल प्रश्नपत्र के स्तर पर है, बल्कि न केवल समाजशास्त्र, अपितु सभी कक्षाओं की सामाजिक विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास आदि की पाठ्यपुस्तकों में पाठ्यक्रम के स्तर पर आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

वे नितांत नीरस, भारतीय मन-मिज़ाज व आबो-हवा के प्रतिकूल, प्रकृति-परिवेश-परंपरा-पृष्ठभूमि से पूर्णतया पृथक, स्वत्व, स्वदेश एवं संस्कृति से विच्छिन्न तथा युगीन आवश्यकताओं की पूर्त्ति में अक्षम-असमर्थ-अपर्याप्त हैं। एक ओर वर्गीय एवं क्षेत्रीय चेतना तथा भिन्न-भिन्न अस्मिताओं को उभारने की दृष्टि से विभिन्न पाठ्यपुस्तकों में चुन-चुनकर ऐसी-ऐसी विषयवस्तु डाली गई हैं जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं, तो दूसरी ओर पंथ-मजहब-संप्रदाय-रिलीज़न को धर्म का पर्याय मान भारत को भिन्न-भिन्न संस्कृति वाला बहु-सांस्कृतिक देश बताया-दुहराया गया है। ‘मिली-जुली’ या ‘सामासिक’ संस्कृति एक ऐसा झूठ है, जिसे वामपंथी इतिहासकारों-शिक्षाविदों द्वारा नारों की तरह बार-बार उछाला-भुनाया जाता है। जानते-बूझते हुए इस सत्य की घनघोर उपेक्षा की जाती है कि विविधता में एकता देखने वाली भारत की संस्कृति एक है, जिसे पूरा विश्व प्राचीन काल से सनातन संस्कृति, हिंदू संस्कृति या भारतीय संस्कृति के नाम से जानता-पहचानता है। पूजा-पद्धति या पुरखे बदलने से संस्कृति नहीं बदलती! 

बहरहाल सीबीएसई ने जिसे महज़ एक भूल बता पल्ला झाड़ा है, उसकी आँखें खोलने के लिए एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं की ‘समाजशास्त्र’ की जिस पाठ्य-पुस्तक के ‘सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ’ नामक अध्याय से यह प्रश्न बनाया-उठाया गया है, उसका दृष्टांत ही पर्याप्त होगा। इस पुस्तक के पृष्ठ-संख्या 134 पर लिखा गया है ”कोई भी क्षेत्र सांप्रदायिक हिंसा से अछूता नहीं रह पाया। सभी समुदायों को कभी-न-कभी कम या ज्यादा इस तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा है। अल्पसंख्यक समुदाय इससे ज्यादा ही प्रभावित होता रहा है। इस मामले में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टी को एकदम से अलग नहीं रखा जा सकता।’’ घोर आश्चर्य है कि क्रिया की प्रतिक्रिया का तो इस अनुच्छेद में विवरण है, पर बड़ी धूर्त्तता, कुटिलता एवं पक्षपातपूर्ण तरीके से इस विवरण में गोधरा में अकारण जलाकर मार डाले गए निहत्थे-निर्दोष रामभक्तों-कारसेवकों का कोई उल्लेख नहीं है! यह दोहरी मानसिकता नहीं तो और क्या है कि एक ओर ये क्षद्म धर्मनिरपेक्षतावादी-प्रगतिशील बुद्धिजीवी कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम पर इस्लामिक आक्रांताओं एवं शासकों द्वारा किए गए तमाम नरसंहारों एवं  मंदिरों-मूर्त्तियों-पुस्तकालयों के विध्वंस को लाल कालीन के नीचे ढ़ककर रखने की पैरवी-वक़ालत करते हैं और दूसरी ओर दंगे जैसी बर्बर-हिंसक-कबीलाई घटनाओं की निष्पक्ष आलोचना-भर्त्सना न कर सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को पीड़ित एवं बहुसंख्यकों को उत्पीड़क दिखाते हैं! 

अभी कुछ दिनों पूर्व भी एनसीईआरटी को शिक्षा में व्याप्त लैंगिक असमानता को दूर करने के नाम पर ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए लाई गई सामग्री-नियमावली पर स्पष्टीकरण देना पड़ा था। विवाद व विरोध इतना बढ़ा कि शिक्षकों व प्रशासकों को प्रशिक्षित करने के लिए लाए गए मैनुअल ‘स्कूली शिक्षा में ट्रांसजेंडर बच्चों को शामिल करना : चिंताएँ और रोड मैप’ को उसे अपनी वेबसाईट से हटाना पड़ा। वस्तुतः एनसीईआरटी, सीबीएसई या अन्य शैक्षिक संस्थाओं को इस प्रकार की असहज स्थितियों का सामना इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि सत्ता बदलते ही पाला बदलने की कला में सिद्धहस्त कलाबाज आज भी तंत्र व संस्थाओं में गहरी पैठ और पकड़ बनाए हुए हैं। शिक्षा-मंत्रालय 7 वर्षों बाद भी भारत व भारतीयता की गहरी समझ रखने वाले सुपात्रों-विद्वानों-विशेषज्ञों को विभिन्न समितियों-आयोगों से जोड़ नहीं पाया है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी पश्चिमीकरण को ही प्रगति, स्तरीयता एवं आधुनिकता का एकमात्र पैमाना माना-समझा जा रहा है। जबकि आज आवश्यकता इस बात की अधिक है कि जो अपना है उसे युगानुकूल और जो बाहर का है उसे देशानुकूल बनाकर आत्मसात किया जाय।

 – साभार दैनिक जागरण

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