बहुरूपिया वायरस से डरने की जगह सामना करें

भारत एवं पूरे विश्व में फिर कोरोना के नए रूप ओमीक्रोन ने आतंक पैदा कर दिया है। हालांकि कहीं इसका व्यापक मारक प्रसार नहीं दिखा है, किंतु कोरोना की पिछली कहर की भयावह स्मृतियां हर किसी के अंदर भय पैदा कर देगी। सबके मन में यही डरावना प्रश्न है कि कहीं फिर उसी तरह की लहर आ गई तो क्या होगा? भारत में ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसने अपने या अपनों के अपनों या परिचितों के जाने का दर्द नहीं चला झेला हो। धीरे-धीरे फिर देश और विश्व सामान्य गतिविधियां प्राप्त कर रहा है। लोगों में पहले की तरह आम जीवन जीने का आत्मविश्वास पैदा हुआ है और हर स्तर पर चहलपहल तथा सक्रियता दिख रही है। फिर घरों में दुब ने और परिचितों -अपनों के खोने का दर्द झेलने की मानसिकता किसी की नहीं हो सकती।

लोग बंदिशों से ऊब गए हैं। यूरोप में सामान्य बंदिशों के विरुद्ध  प्रदर्शन होने लगे हैं। भारत में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को पत्र लिखकर आगाह किया है। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर विशेष सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं। साफ है कि कोरोना के नए वेरिएंट के भय से संपूर्ण गतिविधियों को ठप कर देना किसी भी देश और समाज के लिए स्वयं को आत्मघाती अवस्था में पहुंचा देना होगा। इसमें यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि तो फिर किया क्या जाए?

इसके उत्तर के पहले यह समझना जरूरी है कि विश्व की कोई भी सरकार जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। अगर उसने इसको नकारने का जोखिम उठाया और मानवीय क्षति हुई तो लोकतंत्र में उस सरकार की कैसी अवस्था होगी इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। एलोपैथ मेडिकल समुदाय संपूर्ण मार्गनिर्देश का अगुआ बना हुआ है जबकि सच यही है कि उसे भी अभी इस बीमारी के बारे में पूरी तरह पता नहीं है। अभी तक की जानकारी के अनुसार इस नए वैरिएंट बी.1.1.529 की पहचान दक्षिण अफ्रीका में हुई। कहा गया है कि इसमें अप्रत्याशित रूप से ज्यादा म्यूटेशन दिखा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस वैरिएंट में करीब 50 म्यूटेशन देखे गए हैं। इनमें 30 से अधिक तो सिर्फ स्पाइक प्रोटीन में हैं। स्पाइक प्रोटीन के सहारे वायरस मानव शरीर की कोशिकाओं तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करता है। जाहिर है, स्पाइक प्रोटीन में अगर इतने सारे म्यूटेशन हैं तो अभी तक के टीके इसके सामने कमजोर पड़ सकते हैं । आखिर ज्यादातर टीका स्पाइक प्रोटीन को ही अपना लक्ष्य बनाकर तैयार किया गया है । अनेक विशेषज्ञ कह रहे हैं कि विश्व भर में उपलब्ध टीके इस वैरिएंट पर पूरी तरह कामयाब होंगे या नहीं इसके बारे में निश्चितता से अंतिम निष्कर्ष देना कठिन है। पहले खबर आई कि बोत्सवाना में ऐसे लोग भी ओमीक्रोन संक्रमित हुए हैं, जो टीके के सभी आवश्यक डोज ले चुके हैं। अब अन्य कुछ जगहों से भी ऐसी खबरें आई है। हमारे देश में कुछ विशेषज्ञ बूस्टर डोज की सलाह दे रहे हैं।

इस पर आगे बात करने से पहले इस वैरिएंट के बारे में दी जा रही कुछ और जानकारियों पर भी गौर करना जरूरी है। यह संक्रमण हवा के जरिए भी फैल सकता है। हांगकांग से आई एक समाचार के अनुसार वहां होटल के अलग-अलग कमरों में ठहरे लोगों के स्वैब में यह वैरीअंट पाया गया । इसका मतलब यह हुआ की कोरोना के इस प्रकार के फैलाव के लिए लोगों का एकदम पास आना या किसी तरह से इसके स्पर्श में आना जरूरी नहीं है। यह हवा में दूरी तय करके भी किसी को ग्रस्त कर सकता है । इसके संबंध में तीसरी बात यह आई है कि जानवर भी इसके चपेट से बाहर नहीं है। मनुष्य से यह जानवर में पहुंच सकता है और जानवर में अंदर से ज्यादा खतरनाक होकर किसी मनुष्य को संक्रमित करता है । इस तरह की सूचनाएं अगर विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही हैं तो हमारा आपका और संपूर्ण मानव समुदाय का भयाक्रांत होना बिल्कुल स्वाभाविक है । फिर तो हमारे बचने का कोई उपाय ही नहीं । अगर इसने पिछली लहर का रूप धारण किया तो हम अपने घर में भी सुरक्षित नहीं होंगे । आसपास सड़कों से गुजरते हुए किसी व्यक्ति के अंदर का वैरिएंट हम तक पहुंच सकता है। यानी न जानवर सुरक्षित न मनुष्य और बचाव के उपाय भी नाकाफी । तो फिर ? 

विशेषज्ञों की अभी तक की बातों का निष्कर्ष यही है की टीका या दवा जो भी हमारे सामने हैं वो इस वैरिएंट के सामने नाकाफी हो सकती हैं। हम माने या न माने आधुनिक मेडिकल समुदाय ने अघोषित रूप से अपनी लाचारी प्रकट कर दी है। वैसे या पहले भी प्रमाणित हुआ है पर हमने इसे स्वीकारा नहीं। कोई संकट या बीमारी सारे प्रयासों के बावजूद अगर बार-बार दस्तक दे रही है और हमारी बेचारगी बार-बार स्पष्ट होती है तो निश्चित रूप से उसके बारे में अभी तक की समझ तथा निपटने के प्रयासों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो जाता है। हमने लॉकडाउन किया। संपूर्ण गतिविधियां ठप कर घर में बैठे। सैनिटाइजर और मास्क का व्यापक प्रयोग किया। टीका आया और अभियान की तरह उसे ज्यादातर आबादी तक पहुंचा दिया गया। इसके आगे हम क्या कर सकते हैं? सबसे पहले तो यह मानकर चलना होगा कि कोरोना जैसी बीमारी आई है तो अचानक जाएगी नहीं।

हम भले पहली लहर दूसरी लहर या संभावित तीसरी लहर की बात करें सच यही है कि कोरोना पूरी तरह गया ही नहीं। इसकी संख्या और प्रचंडता में कमी अवश्य आई लेकिन कोई दिन ऐसा नहीं है जिस दिन कोरोना के कुछ संक्रमित मरीज किसी न किसी कोने में सामने नहीं आए हो। अंतर इतना ही होता है कि अचानक संक्रमितों की संख्या तेजी से ऊपर की ओर गई, कुछ दिनों के लिए ऐसा लगा जैसे प्रलय आ गया, स्वास्थ्य के सारे तंत्र चरमरा गए और फिर उतरते हुए यह नीचे पायदान पर आ गया। टीका बनाने वालों ने भी दावा नहीं किया कि इसके दोनों खुराक लेने वाला व्यक्ति कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित हो गया है। उनका इतना ही कहना है कि आपको बड़ा वाला कोरोना नहीं होगा। यानी संक्रमण होगा लेकिन वह जानलेवा नहीं। यह बात अलग है कि विश्व के अनेक कोने में टीका लिए लोगों की भी मृत्यु हो गई। दूसरे टीका से पैदा एंटीबॉडी 6 से 8 महीने में काफी हद तक निष्प्रभावी भी हो जाता है । तो क्या हर छे 8 महीने पर निकाल देना होगा? यह संभव है ? 

एलोपैथ प्रणाली में ही डॉक्टरों का ऐसा समुदाय खड़ा हो गया है जो इसके बारे में दी गई अभी तक की अनेक जानकारियां  गलत बताता है। ऐसे लोग टीमों पर भी प्रश्न उठाते हैं।  इनके अनुसार जिस बीमारी के बारे में पूरी तरह पता ही नहीं है उसके रोकने का टीका कैसे विकसित हो सकता है? हमारे आपके लिए इस पचड़े में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। कुछ आम अनुभवों को पकड़ें। एक,देसी बचाव के उपाय भारी संख्या में लोगों पर कारगर साबित हुए। दूसरे,संक्रमण होने पर अकेले या परिवार सहित अपने घरों में कोरंटाइन होकर उपचार करने वाले अधिकतर लोग स्वस्थ हो गए। तीन, काफी संख्या में कोरोना संक्रमित आयुर्वेद और होम्योपैथी के द्वारा स्वास्थ्य हुए। चार, ऐसी देसी औषधियां लेने वाले अनेक लोग आपको मिल जाएंगे जिन्होंने आत्विश्वास के साथ कहा कि वो संक्रमित नहीं हो सकते और वाकई में नहीं हुए। लंबे समय से अस्वस्थ होने के बावजूद मेरे आयुर्वेद के डॉक्टर ने आश्वस्त किया कि आप निश्चिंत रहें जो दवाइयां आपको मिल रही हैं उनमें कोरोना संक्रमण आपको हो ही नहीं सकता। इससे मेरा आत्मविश्वास बना हुआ है। इस सूत्र को पकड़कर हमको आपको और भारत के नीति निर्धारकों को अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा करना होगा।

अगर चिकित्सा के भारतीय प्रणाली में वाकई बचाव और हो जाने पर उपचार के प्रमाण हैं तो इसे व्यापक पैमाने पर अपनाने में हिचक क्यों ? हमारा लक्ष्य सिर्फ बचाव तथा संक्रमित का उपचार है चाहे वह जिस चिकित्सा प्रणाली से मिले । केवल एलोपैथ ही वैज्ञानिक है और बाकी अवैज्ञानिक इस विकृत सोच से बाहर आए तो रास्ता दिखेगा। जितना एलोपैथ कर सकती है वह करे लेकिन दूसरी पद्धति के लोग अगर बचाव एवं उपचार में स्वयं को सक्षम साबित किए हैं तो स्वीकार करें। लेकिन इन सब के परे सबसे पहले हमें यही स्वीकार करना होगा कि कोरोना से डरकर छुपने की जगह इसका सामना करना ही एकमात्र विकल्प मानव समुदाय के सामने रह गया है। बचाव के जीतने मानवीय उपाय अपनाना संभव हो उनको अपनाया जाए किंतु इसके डर से गतिविधियां बिल्कुल नहीं रुके । मनुष्य होने के नाते हमारा एक जीवन चक्र है जिसे बाधित करना उचित नहीं। वैरिएंट के नाम मेडिकल प्रणाली की दी हुई है। ये वैरिएंट पहले थे या नहीं इसके बारे में कोई निश्चिंता से नहीं कह सकता। संभव है यह वैरीअंट पहले भी रही हो लेकिन पकड़ में नहीं आए। तो आइए अपनी समस्त गतिविधियां जारी रखते हुए इस बहुरूपिया वायरस का सामना करें।

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