ममता बनर्जी के लिए दूर है दिल्ली

इसी साल के पूर्वार्द्ध में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा सभा के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की शानदार विजय के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अंदर यह महत्वाकांक्षा जाग उठी है कि अगर वे देश के विपक्षी दलों को एकजुट करने में सफल हो जाएं तो उनके लिए  पश्चिम बंगाल से न ई दिल्ली के सफर का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। इसी महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर वे एक बार फिर  विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए नए सिरे से प्रयास कर रही हैं। गौरतलब है कि इसके पहले भी ममता बनर्जी कोलकाता में देश के लगभग दो दर्जन विपक्षी दलों के नेताओं को एक मंच पर लाने में सफल हो चुकी हैं परंतु उनकी वह पहल उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने की दिशा में कोई विशेष सफलता नहीं दिला सकी यद्यपि उस रैली में अनेक विपक्षी दलों के दिग्गज नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। उसके बाद विपक्षी दलों की एकजुट करने की कोशिशों को विराम देकर वे  अपने गृह राज्य में ही अपनी पार्टी  के जनाधार को मजबूत बनाने में  जुट गई थीं।

दरअसल गत लोकसभा चुनावों में भाजपा ने राज्य की 18 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल कर ममता बनर्जी की चिंताओं में इजाफा कर दिया था  और उस ऐतिहासिक जीत से उत्साहित भाजपा ने राज्य विधानसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने के लिए जिस तरह पूरा जोर लगा दिया था उसके कारण अपने गढ़ को बचाना ममता बनर्जी की सबसे पहली प्राथमिकता बन गया था।विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत ने ममता बनर्जी कोनए उत्साह  से भर दिया और उस जीत ने उनके अंदर यह उम्मीद भी जगा दी कि वे खुद के नेतृत्व में  विपक्षी दलों को एकजुट करके विपक्ष के नेतृत्व की बागडोर संभालने का मौका भी हासिल कर सकती हैं इसीलिए तीसरी बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने के बाद दो बार नई दिल्ली प्रवास पर आ चुकी हैं । दरअसल अब उनकी निगाहें 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों पर टिक गई हैं ।

पश्चिम बंगाल में लगातार तीन बार बनाने में मिली सफलता ने ममता बनर्जी को इस खुशफहमी का शिकार बना दिया है कि  विपक्षी दलों के नेताओं के बीच उनका राजनीतिक कद अब इतना ऊंचा हो चुका  है कि अगले लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों को उनका नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार होना ही पड़ेगा। इसीलिए  अब वे पश्चिम बंगाल की सीमाओं से बाहर निकल कर दूसरे राज्यों में तृणमूल कांग्रेस का जनाधार विकसित करने की रणनीति पर अमल कर रही हैं। पिछले दिनों मेघालय में 12 कांग्रेस विधायकों द्वारा तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार करने के लिए राजी करना उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके अलावा गोवा में चुनाव प्रबंधन विशेषज्ञ प्रशांत किशोर को उन्होंने पार्टी की चुनावी  संभावनाओं को बलवती बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है।

कुशल चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवाएं लेकर यूं तो  कई राजनीतिक दलों को  सत्ता का सफर तय करने में सफलता मिली है परंतु ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में स्थापित करने का जो टास्क ममता बनर्जी ने उन्हें सौंपा  है वह आसान नहीं है। इसीलिए उन्होंने गोवा की राजधानी पणजी में सूचना प्रौद्योगिकी में दक्ष  ढाई सौ युवाओं की टीम को इस चुनौती पूर्ण काम में लगा दिया है । ममता बनर्जी यह बात अच्छी तरह जानती हैं कि अगर वे सारे भाजपा विरोधी  दलों को एकजुट करने में सफल हो भी जाएं तब भी उन्हें  एकजुट विपक्ष का नेतृत्व करने की उनकी महत्वाकांक्षा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक कि उनके अपने दल को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता नहीं मिल जाती । गौरतलब है कि किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता हासिल करने लिए चुनाव आयोग  ने जो शर्तें तय कर रखी हैं  उन्हें  ममता बनर्जी की पार्टी अभी तक पूरी नहीं  कर सकी है।

ममता बनर्जी को उम्मीद है कि गोवा विधानसभा चुनावों से इसकी शुरुआत हो सकती है और 2024 के पहले वे अपनी पार्टी को चुनाव आयोग से राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता दिलाने में सफल हो सकती हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को  एकजुट करने के अपने महत्वाकांक्षी अभियान की शुरुआत में ही वे जिस तरह भारतीय राजनीति में अब कांग्रेस नीत संप्रग को अप्रासंगिक बता कर कांग्रेस मुक्त विपक्ष के पक्ष में तर्क दे रही हैं ‌‌‌ उसकी वजह से  ममता बनर्जी की विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशों पर शुरू में ही पानी फिरता दिखाई दे रहा है। यह सही है कि कांग्रेस पार्टी अपने 136 साल के इतिहास में इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रही है जिसके अपने नेता भी पार्टी नेतृत्व पर आए दिन निशाना साध रहे हैं परंतु ममता बनर्जी  यह कैसे भूल सकती हैं कि कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है जिसके लिए ममता बनर्जी को अभी शायद लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी । जिस गोवा राज्य से ममता बनर्जी अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता दिलाने की उम्मीद लगाए हुए हैं वहां दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने पहले ही पांव जमाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं।

ममता बनर्जी ने हाल में ही राहुल गांधी पर परोक्ष  रूप से तंज कहते हुए कहा था कि राजनीति में लगातार संघर्ष करना पड़ता है और यह काम आप ज्यादा समय विदेश में रहकर नहीं कर सकते। राहुल गांधी अथवा कांग्रेस की आलोचना करते समय ममता बनर्जी यह भूल गईं कि महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महाआघाडी  गठबन्धन में कांग्रेस पार्टी शिव सेना और राष्ट्र वादी कांग्रेस पार्टी की सहयोगी है। यही कारण है कि शिवसेना ने कांग्रेस मुक्त विपक्ष की ममता बनर्जी की अवधारणा को खारिज करने में देर नहीं लगाई। ममता बनर्जी के साथ आए उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने यूं तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया परंतु यह कहना उचित नहीं होगा कि शरद पवार ने उन्हें कांग्रेस मुक्त विपक्ष को एकजुट करने के अभियान में सफलता के लिए भी अपना आशीर्वाद दिया होगा।  भाजपा ने तो पहले ही कह दिया है कि विपक्ष को एकजुट करने की ममता बनर्जी की कोशिशों से भाजपा तनिक भी चिंतित नहीं है।

दरअसल ममता बनर्जी  अगर यह मान बैठी हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के धुंआधार चुनाव प्रचार के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की शानदार विजय के बाद अब वे प्रधानमंत्री मोदी की करिश्माई लोकप्रियता को चुनौती देने की स्थिति में आ चुकी है तो यह  उनके राजनीतिक जीवन की बहुत ‌‌‌‌‌बडी भूल साबित होगी। ममता बनर्जी को इस कटु सत्य का अहसास अवश्य होना चाहिए कि वे जिस राज्य की मुख्यमंत्री हैं वह उस देश का एक हिस्सा है जिसके प्रधानमंत्री पद की बागडोर गत सात वर्षों से  नरेन्द्र मोदी संभाले हुए हैं । ममता बनर्जी को यह कैसे भूल जाती हैं कि वे एक क्षेत्रीय दल की मुखिया हैं और प्रधानमंत्री मोदी  जिस दल के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं उस दल को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का गौरव प्राप्त है।इस समय ममता बनर्जी के लिए उचित तो यही होगा कि जिस राज्य की जनता ने लगातार तीसरी बार उन्हें सत्ता सौंपी है उसके प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

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