वाराणस्यां तु विश्वेशं

  आनन्द कानन या आनन्द वन के नाम से संबोधित किए जानेवाले मानव सभ्यता के प्राचीनतम नगर काशी के सबसे महत्वपूर्ण धर्म स्थलों में से एक काशी विश्वनाथ धाम आज सम्पूर्ण विश्व के सनातन हिंदुओं के लिए परमानन्द का कारण बन गया है।

भारत ने अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना किया है। प्रारंभ में ये आक्रमण भारत की भौतिक समृद्धि से आकर्षित होकर संपत्ति को लूटने के उद्देश्य से हुए। आक्रमणकारी आए, उन्होंने संपत्ति लूटी और चले गए। फिर यहां बस जाने, इस पर राज करने के उद्देश्य जागृत हुए। अपने उद्देश्यों में ये आक्रमणकारी सफल भी हुए। शासन और सत्ता प्राप्त करने के साथ-साथ भारत पर प्रारंभ हुए सांस्कृतिक और धार्मिक आक्रमण। इन आक्रमणों के उद्देश्यों में सनातन हिन्दू आस्थाओं को चोट पहुंचाने, हीन और विकृत स्वरूप में चित्रित करने और धार्मिक स्थलों को ध्वस्त कर देने के साथ धर्मांतरण के कार्यक्रमों का चलाया जाना सम्मिलित रहा है। धर्मांतरण न करने पर हिंदुओं की सामूहिक हत्याएं भी की गईं। भारत में ये आतंक अनेक वर्षों तक चलता रहा। हिन्दू आस्थाओं और मान्यताओं के केंद्रों के साथ-साथ अनेक विश्वविद्यालयों और मंदिरों को ध्वस्त किया गया। काशी का विश्वेश्वर महादेव मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण मंदिर और अयोध्या का श्रीराम मंदिर हम प्रमुखता से जानते हैं, किन्तु इनकी संख्या लाखों में है। श्रीराम जन्मभूमि पर भारत के उच्चतम न्यायालय के निर्णयानुसार मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है।

काशी में भगवान शंकर के द्वादशज्योतिर्लिंगों में से एक विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का भव्य मंदिर तत्कालीन मुग़ल आततायी औरंगजेब ने ध्वस्त किया और वहां मस्जिद का निर्माण कराया। मंदिर के प्रांगण में एक कूप अर्थात कुंआं था जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है। 1669 ईस्वी में औरंगज़ेब ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ने और पाठशालाओं को बंद करने का आदेश दे दिया, जिसके परिणाम स्वरूप काशी के मंदिर तोड़े गए, वहां मस्जिदें बनाई गई और धर्म, अध्ययन-अध्यापन के कार्यों पर रोक लगवा दी गई।

वाराणसी ने औरंगज़ेब से पूर्व भी कई आततायियों को देखा है। 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक और शहाबुद्दीन ग़ोरी ने वाराणसी पर आक्रमण किया और मूर्तिपूजकों पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए। येन-केन प्रकारेण धर्म-कर्म चलता रहा। 1585 में टोडरमल ने इन आततायियों द्वारा ध्वस्त कराए गए काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया।

आधुनिक युग में भारत की धार्मिक चेतना को सशक्त बनाने और इसके स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ही शायद देवी अहिल्याबाई का जन्म भारत की पवित्र धरा पर हुआ होगा। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक मंदिरों का

जीर्णोद्धार करवाया, जिसमें से एक वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर भी है। औरंगज़ेब द्वारा तोड़े गए काशी विश्वनाथ मंदिर का देवी अहिल्याबाई ने 1779-80 में पुनर्निर्माण करवाया। विश्वेश्वर महादेव की प्राण-प्रतिष्ठा पूरे वैदिक विधि विधान से की गई। 19वीं सदी में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखरों को सोने से मढ़वाया।

देवी अहिल्याबाई के योगदान के उपरांत आज लगभग 250 वर्षों बाद पुनः काशी विश्वनाथ मंदिर को एक नया स्वरूप मिला है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक अकल्पनीय कार्य को मूर्तरूप प्रदान किया है। आज पूरा विश्व जिसे काशी विश्वनाथ धाम के नाम से जानता है। जिन लोगों ने पूर्व में काशी के इस क्षेत्र को देखा है वे काशी विश्वनाथ धाम परिसर को देखकर भावविभोर हो गए हैं। सभी के मुख से यही बात निकल रही है – न भूतो न भविष्यति।

5 लाख वर्गफुट में फैले काशी विश्वनाथ धाम परिसर की परिकल्पना को मूर्तरूप प्रदान करने के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था भवनों का अधिग्रहण। अधिग्रहण करने के लिए भवनों के अनिवार्य अधिग्रहण का रास्ता न चुनकर मोदी सरकार ने पारस्परिक समझौते के आधार पर न्यायोचित और पारदर्शी रास्ता अपनाया। वाराणसी की सकरी गलियों में अनेक संपत्तियां ऐसी भी थीं, जिनके एक से अधिक उत्तराधिकारी या स्वामी थे, ये तो स्वाभाविक बात है लेकिन कठिनाई ऐसी भी थी कि ऐसे कई उत्तराधिकारी या स्वामी भारत के बाहर निवास करते थे। सभी को एक साथ अधिग्रहण के लिए मनाना, एक स्थान पर उनकी उपस्थिति को सुनिश्चित करना, एक प्रकार का भगीरथ प्रयत्न था। किन्तु जिस प्रकार भगवान श्रीराम की सेना ने समुद्र पर सेतु बना दिया उसी प्रकार मोदी सरकार के कुशल अधिकारियों ने भवन अधिग्रहण के इस असाध्य कार्य को सिद्ध कर दिखाया। 400 भवनों का अधिग्रहण किया गया। 2 साल और 9 महीने तक चले कार्य में लगभग 2000 मजदूरों ने प्रतिदिन कार्य किया और 339 करोड़ की लागत से काशी विश्वनाथ धाम के कार्य का पहला चरण पूर्ण हुआ।

इस कॉरिडर के बन जाने के कारण मां गंगा के तट से सीधे बिना किसी व्यवधान के गंगाधर बाबा विश्वनाथ के मंदिर तक पहुंचना पहले से सरल और सुलभ हुआ है इसमें कोई संदेह नहीं है।

7 वार और 9 त्यौहार वाले शहर बनारस में इस कॉरिडर के लोकार्पण का उत्सव सरीखा एक दिव्य कार्यक्रम हुआ। भारत के अनेक स्थानों से आए संतों, विद्वानों और काशीवासियों की उपस्थिति में 13 दिसंबर 2021 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस धाम का लोकार्पण किया। काशीवासी आज काशी के अधिपति भगवान विश्वेश्वर के मंदिर परिसर का यह स्वरूप देखकर अभिभूत हैं।

काशी विश्वनाथ धाम में बाबा भोले के प्रिय वृक्षों, रुद्राक्ष, बेल, पारिजात, वट और अशोक के पौंधें लगाए जा रहे हैं। इस भव्य काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में छोटी-बड़ी 23 इमारतें और 27 मंदिर हैं। यहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन के साथ श्रद्धालुओं और यात्रियों की सुविधा के लिए पूरे कॉरिडोर को 3 भागों में बांटा गया है। इसमें 4 बड़े-बड़े फाटक हैं, साथ ही प्रदक्षिणा पथ पर संगमरमर के 22 शिलालेख लगाए गए हैं। जिसमें काशी की महिमा का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त कॉरिडोर में मंदिर चौक, तीन यात्री सुविधा केंद्र, मुमुक्षु भवन, मल्टीपर्पज़ हॉल, चार शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, सिटी म्यूजियम, वाराणसी गैलरी जैसी अन्य सुविधाओं की भी व्यवस्था की गई है।

काशी सदैव से विश्व के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रही है, धर्म-कर्म का केंद्र रही है और अपने ज्ञान के प्रकाश से पूरे विश्व को प्रकाशित करती रही है। इस बात का ध्यान रखते हुए काशी विश्वनाथ धाम में धार्मिक पुस्तकों का केंद्र और एक वैदिक केंद्र भी बनाया गया है। यहां आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को सुनिश्चित किया गया है। साथ ही दिव्यांगों और वृद्धों के आवागमन के लिए विशेष व्यवस्था की गई हैं।

आनन्द कानन या आनन्द वन के नाम से संबोधित किए जानेवाले मानव सभ्यता के प्राचीनतम नगर काशी के सबसे महत्वपूर्ण धर्म स्थलों में से एक काशी विश्वनाथ धाम आज सम्पूर्ण विश्व के सनातन हिंदुओं के लिए परमानन्द का कारण बन गया है।

 

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