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***जगदीश उपासने***

            नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में बिहार में         महागठबंधन को तीन चौथाई से कुछ ही कम सीटों का बहुमत देने वाला जनादेश भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के लिए भले अप्रत्याशित रहा हो लेकिन यह कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है। वैसे दिल्ली में बैठे विश्लेषकों तथा चुनाव विशेषज्ञों को ‘विकास बनाम जंगल राज’ में काफी दम दिख रहा था और फिर मतदान के पहले हुए तमाम जनमत सर्वेक्षणों में भी विकास के एजेंडे पर मैदान में उतरे राजग की बढ़त का रूझान सामने आया था। ऐसा इस तथ्य के बावजूद कि आंकड़ों के लिहाज से महागठबंधन के दलों का समर्थन आधार कहीं अधिक मजबूत था, जो इससे पहले के चुनावों में विभाजित होने के कारण वैसा मारक नहीं रहा था। इसलिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रयिता, विकास के मुद्दे पर जोर, केंद्र सरकार की ओर से बिहार के लिए १.६५ लाख करोड़ रू का भारी-भरकम विशेष आर्थिक पैकेज और राजग के २०१४ लोकसभा चुनाव से अधिक मजबूत जातिगत गठबंधन के कारण बाजी उसके हक में पलटने की संभावना उतनी निराधार भी नहीं थी। 

      लेकिन नीतीश कुमार ने राजग की इस व्यूहरचना को तोडऩे के लिए वह किया जिसकी संभावना लगभग न के बराबर थी। राजनीति संभावनाओं का खेल है और सत्ता गंवाने की चुनौती झेल रहे नीतीश ने इसे बखूबी भुनाया। चिरशत्रु लालू प्रसाद यादव के राजद को गले गलाने और हाशिये पर खड़ी कांग्रेस को चने के झाड़ पर चढ़ाने के लिए उन्हें बस अपना स्वाभिमान थोड़ा किनारे करना था। इसके बदले मिलने वाला जातिगत समर्थन आधार इतना बड़ा और सुदृढ़ था कि जिसके बल पर वे मोदी के विकास के बुलडोजर और राजग के जातिगत समीकरण को चुनौती देने की स्थिति में आ जाते। चारा घोटालेे में सजा के कारण चुनाव लड़ने से वंचित लालू प्रसाद की मजबूरी ही थी कि पिछले १५ वर्षों में हुए चुनावों में अपना यादव-मुस्लिम गठजोड़ लगभग अटूूट बनाए रखने और सन् २००० से लेकर २०१० तक हुए चार विधान सभा चुनावों में औसतन लगभग २४ प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद वे सत्ता से बाहर थे। लालू प्रसाद यदि इन चुनावों में अपने पारिवारिक उत्तराधिकारी के लिए राज्य की राजनीति की राह न खोल पाते और बेसब्र हो चले जातिगत समर्थकों को सत्ता का प्रसाद चखाने का इंतजाम न कर पाते तो उनका राजनैतिक अवसान निश्चित था। बिहार ही क्या समूचे हिंदीभाषी राज्यों में मृतप्राय कांग्रेस को किसी की भी कृपा से मिले, ऑक्सीजन चाहिए थी। और नीतीश कुमार ही थे जो लालू और कांग्रेस की इस विवशता का सबसे बेहतर लाभ उठाने की स्थिति में थे। लालू प्रसाद यह भी जानते थे कि अगर उन्होंने जदयू से हाथ नहीं मिलाया तो नीतीश कुमार के पास भाजपा के साथ रणनीतिक गठजोड़ करने का विकल्प खुला है। नीतीश कुमार आखिर १७ वर्षों से भाजपा के साथ थे और भाजपा से गठजोड़ उनके लिए इतना फलदायी था कि वे केंद्र की पिछली राजग सरकार में कैबिनेट मंत्री और बिहार में राजग के मुख्यमंत्री के नाते शानदार प्रदर्शन कर सके थे।

      इस वजह से नीतीश कुमार महागठबंधन तैयार कर सके, जो मजबूती से लड़ कर सत्ता का वरण करने में भी सफल रहा। महागठबंधन के दलों को कुल मिलाकर न सिर्फ २०१० के विधान सभा चुनाव में सर्वाधिक वोट मिले थे, अपितु २०१४ के लोकसभा चुनाव, जब देश भर में मोदी की आंधी चल रही थी, में भी राजग में सम्मिलित दलों के कुल वोटों से कहीं अधिक वोट मिले थे। जनता दल (यूनाइटेड) यानि जदयू, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस को २०१० के विधान सभा चुनाव में कुल मिलाकर ४९.७२ प्रतिशत वोट मिले। लेकिन तब जदयू जहां भाजपा के साथ राजग में था तो राजद और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। २०१० में जदयू के २२.५८ प्रतिशत वोट (११५ सीटें) और भाजपा के १६.४९ फीसदी वोट (९१ सीटें) के साथ कुल ३९.७ प्रतिशत वोट पाकर राजग दोबारा सत्तारूढ़ हुआ और राजद १८.८४ प्रतिशत वोट (२२ सीटें) तथा कांग्रेस ८.३ फीसदी वोट (४ सीटें) लेकर बेमानी हो गए। २०१४ के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की तीनों पार्टियां- जदयू, राजद और कांग्रेस अलग-अलग लड़ीं, लेकिन उन्होंने राजग के ३८.८ प्रतिशत वोट (३१ लोकसभा सीटें) के मुकाबले साढ़े पांच प्रतिशत ज्यादा ४४.३ प्रतिशत (कुल ८ लोकसभा सीटें) वोटों से अपनी ताकत जता दी। लेकिन मुट्ठी खुली थी, इसलिए खाक की साबित हुई।

      २०१५ में नीतीश ने यह गलती सुधार ली। सिर्फ वोट-आधार ही नहीं, महागठबंधन का जातिगत आधार १५.४ प्रतिशत यादव, ३.५ फीसदी और १६.४ फीसदी मुस्लिम मतदाता वर्ग के कारण ताकतवर था और नीतीश कुमार सरकार के बनाए २२ प्रतिशत अति पिछड़ा वर्ग के साथ लगभग अपराजेय था। महागठबंधन को इसे एकजुट रखना और अपने सभी उम्मीदवारों को एक-दूसरे के वोटों का हस्तांतरण भर करना था। महागठबंधन के तीनों दलों के सभी वर्गों के मतदाताओं में पिछले कार्यकाल में विकास के कार्य करने के कारण बढ़ी नीतीश कुमार की लोकप्रयिता इस जातिगत समीकरण को जोड़े रखने में कारगर साबित हुई। नतीजे बताते हैं कि  वोटों का ८५ से ९० फीसदी और अति पिछड़ों तथा महादलितों के लगभग आधे वोट महागठबंधन की झोली में आए। महागठबंधन दलों के वोटों के एक-दूसरे को हस्तांतरण में एक बात उल्लेखनीय रही। नीतीश कुमार के वोट बैंक तथा उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे योग्य मानने वाले अन्य मतदाताओं ने राजद और कांग्रेस उम्मीदवारों को उसी उत्साह से वोट दिए जिस उत्साह से उन्होंने जदयू उम्मीदवारों को दिए थे। लेकिन लालू के यादव वोट बैंक के वोट जदयू उम्मीदवारों को उतनी मात्रा में नहीं मिले जितनी मात्रा में राजद प्रत्याशियों को मिले। नीतीश के हाथों मांझी के ‘अपमान’ से खफा महादलितों के बड़़े तबके ने भी जदयू की बजाए राजद को वोट देना ज्यादा उचित समझा। यही कारण है कि जदयू की सीटें तथा वोट प्रतिशत राजद से कम रह गया।

      नीतीश कुमार के विरूद्ध सत्ता-विरोधी रूझान लगभग नहीं के बराबर होने से भी महागठबंधन को आसानी हुई। और जब नीतीश कुमार पर राजग नेताओं ने व्यक्तिगत हमले किए तो नीतीश के पक्ष में गोलबंदी और मजबूत हो गई। राजग की बदनसीबी कि नीतीश के लिए आम मतदाता की सकारात्मकता से राजग के ऊंची जातियों के वोटों का एक हिस्सा भी महागठबंधन, खास तौर पर कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में चला गया। १५ साल के लालू-राबड़ी देवी के ‘जंगल राज’ (यह तमगा नीतीश कुमार ने ही दिया था जब वे लालू प्रसाद की जनता दल सरकार के जाति-विशेष के प्रति ज्यादा अनुराग दिखाने और लालू कुनबे तथा उनके समर्थकों की अराजकता से नाराज होकर उससे अलग हो गए थे) के प्रतीक रहे लालू के साथ नीतीश की दोस्ती को लेकर नीतीश के समर्थकों को शुरू में अंदेशे थे। लेकिन मतदान के हर दौर के साथ संदेह पीछे छूटते गए। नीतीश कुमार को दोबारा मुख्यमंत्री पद पर देखने के उत्सुक मतदाताओं ने शायद मान लिया कि कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने वाले जिद्दी और ईमानदार नीतीश लालू और उनके समर्थकों की दबंगई तथा अराजक मनोवृत्ति पर लगाम कसने में सफल होंगे।

      दरअसल सामाजिक न्याय के नाम पर लालू प्रसाद और दूसरे ओबीसी नेताओं ने इतने वर्षों तक सिर्फ जबानी जमाखर्च ही चलाया और अपना उल्लू सीधा किया। गरीबों को न सम्मान मिला, न सुरक्षा, न ही समृद्धि उनके द्वार पहुंची, वह सामाजिक न्याय के पुरोधाओं की बंदी बनकर रह गई। नतीजतन दो-तिहाई गरीब और निम्न मध्यवर्गीय बिहार ऐसी भयंकर बदहाली में पहुंच गया कि उससे उबरने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन २००५ में भाजपा के साथ जदयू की सरकार के मुखिया के रूप में नीतीश कुमार के पदार्पण से जैसे रोशनी की किरण कौंधी। भाजपा के अबाधित समर्थन के बूते नीतीश कुमार ने प्रतिबद्धता, सूझबूझ और मेहनत से विकास का जो एजेंडा चलाया उससे हताश हो चुके गरीबों में आशा का नया संचार हुआ और नीतीश उनके दुलारे बनते गए। कानून-व्यवस्था की दुरूस्ती से ऊंची जातियों में भी नीतीश के लिए सम्मान जगा। विकास का एजेंडा और कानून के शासन के लिए प्रतिबद्धता दिखाने के मामले में बिहार के हाल के इतिहास में कोई अन्य मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुकाबले में नहीं था। सो, बतौर ‘अच्छा मुख्यमंत्री’, सारी साख नीतीश कुमार के खाते में जमा होती गई। भाजपा ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया, अपितु नीतीश के साथ सत्ता में स्वयं के ८ वर्षों के अच्छे प्रदर्शन का फल भी नीतीश कुमार के खाते में जाने दिया।

      महागठबंधन पहले ही दिन से लगभग अपराजेय था। ऐसे में आरक्षण विवाद, दादरी में हत्या और तथाकथित असहिष्णुता पर अरण्यरूदन को लालू-नीतीश कुमार की जीत का बड़ा कारण मानना हकीकत की अनदेखी ही है। सीएसडीएस ने चुनाव बाद जो सर्वेक्षण किया उससे दिलचस्प तथ्य सामने आए हैं। मसलन, बिहार के ४३ प्रतिशत मतदाताओं का या तो मीडिया एक्सपोजर नहीं है या नहीं के बराबर है। ऐसे में ३७ प्रतिशत मतदाताओं को तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उस इंटरव्यू के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी जिसमें दलितों को पूरी तरह आरक्षण मिल रहा है या नहीं, इसकी पड़ताल के लिए समीक्षा की बात कही गई थी। और जिन ५६ प्रतिशत मतदाताओं को इसकी जानकारी थी उनमें लगभग आधे-आधे इसके समर्थन और विरोध में बंटे हुए थे। दादरी की घटना की खबर भी आधे से ज्यादा मतदाताओं को नहीं थी। एक और महत्वपूर्ण तथ्य जो यह सर्वेक्षण बताता है कि करीब २६ प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान के दिन या ठीक उससे पहले अपने वोट के बारे में निर्णय किया। इसका मतलब यह कि राजग का जोरदार अभियान और प्रधान मंत्री की भारी-भरकम और जीवंत सभाएं निरर्थक नहीं थीं।

     

 महागठबंधन की जीत नीतीश के सुशासन और लालू प्रसाद तथा उनकी घनघोर जातिवादी राजनीति का अजीब मेल लग सकती है लेकिन बिहार के उलझऊ जातिगत आयाम में यह अनपेक्षित नहीं। अब इस संकीर्ण जातिगत राजनीति के फलने-फूलने का संकट जरूर है। राजनैतिक तौर पर नीतीश कुमार भले पहले से अधिक मजबूत हुए, लेकिन सरकार में वे और उनकी पार्टी कमजोर हुई। ठीक है कि जदयू ने लालू और कांग्रेस का साथ पाने के लिए अपनी सीटें कुर्बान कीं, लेकिन २०१० की तुलना में ४४ सीटें और लगभग ६ प्रतिशत वोट में कमी उतनी तकलीफदेह नहीं होती यदि राजद की सीटें जदयू से अधिक नहीं होतीं। नीतीश को इसकी चुभन मंत्रिमंडल गठन से पहले ही महसूस हो रही है। लालू के परिवार से उनकी बेटी या दोनों निर्वाचित बेटों में से किसी एक को उप-मुख्यमंत्री बनाने का फैसला नीतीश कुमार नहीं, लालू-राबड़ी करेंगे। लालू कुनबे की मांगें इतने पर ही थमने वाली नहीं। उस दबाव से निबटते हुए विकास का एजेंडा पूर्ववत चलाना नीतीश कुमार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। फिर नीतीश कुमार राज्य के विकास के अपने एजेंडे की निरंतरता बनाए रखने और केंद्रीय राजनीति में मोदी को चुनौती देने की अपनी महत्वाकांक्षा में कैसे तालमेल बिठाएंगे? राज्य का हित और राष्ट्र हित में तालमेल बिठाना राज्यों के नेताओं के लिए पहले ही मुश्किल हो गया है। अपने मन का सब कुछ साधने के लिए नीतीश कुमार को ‘बड़े भाई’ लालू प्रसाद की मर्जी बार-बार संभालनी पड़ेगी। इससे विकास का एजेंडा प्रभावित हुआ तो नीतीश कुमार पर भरोसा करने वाले मतदाता उन्हें माफ कर पाएंगे? 

      भाजपा का वोट प्रतिशत बेशक २०१० विधान सभा चुनाव और सभी दलों से ज्यादा २४.४० फीसदी रहा, लेकिन यह ज्यादा सीटें लडऩे का कमाल है, न कि समर्थन बढऩे का। लालू-नीतीश कुमार के मेल को लोगों ने जब नीतीश कुमार की खातिर स्वीकार कर लिया तो भाजपा के राम बिलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी जैसे सहयोगी और उनका जातिगत आधार निष्प्रभावी हो गया। भाजपा शहरी सीटें हासिल करने के मामले मेें ७ प्रतिशत बढ़त प्राप्त कर सकी तो ग्रामीण सीटों पर महागठबंधन के मुकाबले १० फीसदी पीछे रह गई। भाजपा की ५३ में से २७ सीटें (५२ प्रतिशत) शहरी बिहार से आईं जबकि राज्य की कुल आबादी में शहरी आबादी मात्र ११.३ प्रतिशत है जबकि ८८.७ प्रतिशत आबादी ग्रामीण है। पार्टी के लिए विडंबना यह रही कि दूसरों का किया-धरा उसके खाते में जमा होता गया। इस अनचाहे बोझ से पिंड छुडाने में उतनी गंभीरता नहीं थी। केंद्रीय कमान वाली रणनीति बिहार जैसे पेचीदा राजनीतिक राज्य में चलनी नहीं थी, सो, नहीं चली। समाज के सभी वर्गों में साख रखने वाले नीतीश कुमार जैसे नेता के मुकाबले मुख्यमंत्री पद के लिए कोई प्रत्याशी घोषित न करने का भी नुकसान हुआ। राज्य के नेताओं को कम तरजीह और ग्रामीण मुद्दों पर उतना जोर नहीं देने का भी खामियाजा भुगतना पड़ा। हालांकि मोदी की जीवंत और विशाल सभाएं, जो भले ही वोटों में उतनी नहीं बदली, दिखाती हैं कि उनकी सरकार से लोगों की उम्मीदें बरकरार हैं। बिहार में नीतीश कुमार और केंद्र में नरेंद्र मोदी, यह स्वर बिहार में भी सुना जा सकता था। अब गैर-राजग, गैर-कांग्रेस दलों की आसन्न एकता और संसद में भाजपा से हिसाब बराबर करने के लिए देशहित की भी परवाह न करने वाली कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की अडंगेबाजी से केंद्र सरकार की चुनौतियां बढ़ सकती हैं। केंद्र को ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सभी कार्यक्रम धरती पर लाने के लिए धन चाहिए और आर्थिक सुधारों के साथ व्यवस्थागत सुधार भी जरूरी हैं। बिहार के बाद केंद्र सरकार सामाजिक कल्याण पर भी पहले से अधिक जोर दे सकती है। लेकिन गैर-भाजपा दल यदि क्षुद्र राजनैतिक हितों तक सिमटे रहे तो महाशक्ति बनने का भारत का रास्ता बाधित हो सकता है।

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