मुसलमानों और यादवों के बढ़ते प्रभाव ने सपा को हराया !

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम विरोधी दलों को हैरान कर रहे होंगे लेकिन जिन लोगों ने उत्तर प्रदेश की सियासत को जमीनी स्तर पर देखा होगा उन्हें हैरानी नहीं हुई होगी। चुनाव जीत और हार के बहुत कारण होते है लेकिन इस बार यूपी चुनाव में एक कारण लोगों के बीच और नजर आया वह था यादव और मुसलमानों का डर जो सपा की हार का एक कारण बना।

पिछली सपा सरकार का कार्यकाल तो सभी याद होगा। उस समय यादव और मुसलमानों को प्रशासन का विशेष अधिकार मिल गया था जिसका भुगतान बाकी सभी जाति और समुदाय को करना पड़ा था जबकि योगी सरकार में किसी भी समुदाय पर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ा। इस बार दलित सहित तमाम समुदाय के लोगों ने यह विचार किया कि अगर सपा की सरकार बनी तो फिर से यादव और मुसलमान हावी हो जाएगे इसलिए उन्होंने बीजेपी के साथ अपना विश्वास जताया और सपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।  

विधानसभा चुनाव 2022 में मोदी और योगी की जोड़ी का प्रभाव इस कदर था कि लोगों में विरोध का कोई सुर नहीं सुनाई दे रहा था और जिन छोटे मुद्दों पर विरोध थे वह इतने प्रभावी नहीं थे कि उसके लिए वोटर अपना नेता बदल दे। बीजेपी के कुछ ऐसे नेता थे जिसको लेकर मतदाओं में असंतोष था और वह उनके पिछले काम या व्यवहार से खुश नहीं थे लेकिन मतदाओं ने फिर भी उनको वोट दिया क्योंकि उन्होंने योगी और मोदी का चेहरा ध्यान में रखा। वहीं इस बार चुनाव में यह भी देखने को मिला कि बीजेपी के अधिकतर नेताओं ने योगी और मोदी के नाम पर ही वोट मांगा और खुद का कोई भी जिक्र नहीं किया।

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का भी जमकर प्रचार किया गया और सभी जातियों को अलग अलग ना होकर हिन्दू नाम से संबोधित किया गया। विश्वनाथ कॉरिडोर, राम मंदिर, विंध्याचल पुनर्निर्माण, जनसंख्या नियंत्रण, कन्वर्जन और गौ हत्या जैसे मुद्दों को जनता के सामने रखा गया और जनता उसे समझने में भी सफल रही। इसके साथ ही इस बार यूपी में लोगों को मिलने वाले राशन ने भी बड़ा रोल अदा किया है जिससे वह लोग अधिक लाभान्वित हुए है जिनके पास जमीन नहीं है वह अब पूरे साल सरकार के राशन से अपना पेट पालते हैं ऐसे में यह सरकार उनके लिए उपयोगी साबित हो रही है। 

गैर राजनीतिक कोई भी व्यक्ति योगी सरकार का विरोधी नहीं था और ज्यादातर लोग यह चाहते थे कि राज्य में फिर से योगी की सरकार बने और चुनाव परिणाम भी यह बता रहे हैं कि अभी राज्य की जनता का भरोसा बीजेपी पर टिका हुआ है और योगी सरकार का काम काज ऐसा ही रहा तो यह कहना गलत नहीं होगा कि तीसरी बार भी योगी को ही राज्य की सत्ता मिल सकती है। किसी भी राज्य की जनता तभी अपना मुखिया बदलती है जब उसे परेशानी होने लगती है। वहीं योगी सरकार को यह चुनौती मिलेगी कि उन्हें फिर से खुद को साबित करना होगा और राज्य की जनता के विश्वास पर खरा उतरना होगा। 

विपक्षी दल सपा, बसपा और कांग्रेस ने भी अपना अपना प्रयास किया लेकिन सपा को छोड़ बाकी दोनों दलों की स्थिति चिंतनीय रही और बसपा को तो अपनी इज्जत बचाना मुश्किल हो गया जबकि सपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अखिलेश यादव का भी समीकरण काफी हद तक ठीक रहा और पिछली बार के मुकाबले सपा की सीटों में बढ़ोतरी हुई लेकिन बहुमत में आने से चूक गये। सपा का छोटे दलों से गठबंधन और यादव व मुसलमानों के वोट को बटोरने का प्रयास भी काफी सफल रहा लेकिन इस बार मुसलमानों का वोट बीजेपी को भी चला गया जिससे सपा को थोड़ा झटका लगा। पिछले 5 सालों में योगी सरकार के खिलाफ सपा ने ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाया जिसका असर जनता के दिमाग तक जाए और वह अपना मन बदले।  

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