‘सबका विश्वास’ नहीं जीत पाई भाजपा

‘उम्र भर गालिब येही भूल करता रहा..
धूल चेहरे पे थी ,वो आईना साफ करता रहा’
हर गुजरा चुनाव ये बात शीशे सा साफ कर जाता है कि मजहब विशेष के वोट भाजपा को इस बार भी नहीं मिला। सरकारी योजनाओं व सब्सिडी के कितने ही गुलदस्ते आप उनके घर भिजवाते रहो,,’सबका विकास’ के कितने ही प्रेमपत्र आप लिखते रहो। संगदिल ‘हसीना’ के दिल मे आपके लिए मोहब्बत का अंकुर नहीं फूटने वाला।
मगर किसी जिद्दी दिलजले आशिक की तरह आप ‘एक नजर’ की चाह में मुस्लिम महबूबा की गली के चक्कर पे चक्कर लगाए जा रहे है, बेशक महबूबा अपने आशिक पर लाख लानाते भेजे। मगर आशिक है कि अपनी चप्पलें घिसे जा रहा है ‘सबका साथ, सबका विकास’ के गीत को गुनगुनाते सरकार को ‘विश्वास’ है कि एक दिन वो महजबीन उनका फूल अपनी जुल्फों में सजायेगी, परंतु बुर्कानशीं इस हसीना के लिए ‘फूल’ कुफ्र है। मगर आशिक है कि हथेली पर सरसों उगाने पर लगा है। येही ‘एकतरफा मोहब्बत’ है…येही घातक है।
– मनोज कुरील

This Post Has One Comment

  1. Anonymous

    सच में शानदार लिखा है

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