भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव, आजादी के दिवाने!!

भारत में आजादी के 75 वर्षो के अवसर पर सभी ओर “आजादी का अमृत महोत्सव ” मनाया जा रहा है लेकिन यह आजादी मिली कैसी जो आज हम इस महोत्सव को मना रहे हैं इस आजादी के अमृत महोत्सव को वर्तमान परिदृश्य में मनाने तक के सफर में ना जाने कितने युवा , क्रांतिकारी व सेनानीयों ने अपने प्राण न्यौछावर किए हैं जिनके प्राणों की आहुति से आज अमृत महोत्सव मनाए जा रहे है।

ऐसे ही बलिदानियों में शुमार है भगत सिंह ,राजगुरू व सुखदेव जो ऐसी उम्र में फांसी या कहे तो मौत के फंधे को हंसते हंसते चूम गए थे जिस उम्र में आजकल युवाओं को अपने अच्छे या बुरे का बोध तक नहीं होता उस‌ उम्र में इन महान आत्माओं ने अपना जीवन देश के आजादी के प्रति न्यौछावर कर दिया था।युवा पीढ़ी भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव के इतिहास को कभी ना भूले यह क्रांतिकारी नेता भारतीय समाज के लिए वह आदर्श है जिन्होंने अपनी अल्पायु में भारत को आजाद करवाने के लिए खुशी-खुशी फांसी पर झूल झूल गए आज हमें ऐसे क्रांतिकारी नेताओं के इतिहास को पढ़ना चाहिए और ऐसे वीडियो को को याद रखना चाहिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को प्रेमात को फांसी दी गई यदि हम इतिहास में 23 मार्च के दिन देश और दुनिया की कई महत्वपूर्ण घटनाएं दर्ज हुई है लेकिन भगत सिंह व उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना भारत के इतिहास में दर्ज सबसे बड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के इतिहास में कभी भी नहीं बुलाया जा सकता है।

अगर आज हम नौजवान युवा पीढ़ी को देखे तो ऐसे वीर युवाओं के इतिहास सेअनभिज्ञ हैं हमारी सरकारें भी उसी घिसे पिटे इतिहास को रटाती है बाबर,औरंगजेब,हुमायूं और गजनबी जैसे अक्रांताओं का इतिहास पढ़ाए जाते हैं जिन्होंने भारत को कोई दिशा नहीं दी बल्कि भारत को लूटा सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश को गुलाम बना दिया लिखने की जरूरत है उस इतिहास को जानने की जिसमें युवाओं ने अपना बलिदान दिया है अपने बलिदान से भारत की धरती को सींचा है तो ऐसे नौजवानों के बलिदान को वर्तमान पीढ़ी जो है वह कभी भी नहीं भुला सकती।
भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत के वे सच्चे सपूत थे, जिन्होंने अपनी देशभक्ति और देशप्रेम को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया और मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर कर गए। 23 मार्च यानि, देश के लिए लड़ते हुए अपने प्राणों को हंसते-हंसते न्यौछावर करने वाले तीन वीर सपूतों का शहीद दिवस। यह दिवस न केवल देश के प्रति सम्मान और हिंदुस्तानी होने वा गौरव का अनुभव कराता है, बल्कि वीर सपूतों के बलिदान को भीगे मन से श्रृद्धांजलि देता है।

उन अमर क्रांतिकारियों के बारे में आम मनुष्य की वैचारिक टिप्पणी का कोई अर्थ नहीं है। उनके उज्ज्वल चरित्रों को बस याद किया जा सकता है कि ऐसे मानव भी इस दुनिया में हुए हैं, जिनके आचरण किंवदंति हैं। भगतसिंह ने अपने अति संक्षिप्त जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, उनके बाद अब किसी के लिए संभव न होगी। ‘आदमी को मारा जा सकता है उसके विचार को नहीं। बड़े साम्राज्यों का पतन हो जाता है लेकिन विचार हमेशा जीवित रहते हैं और बहरे हो चुके लोगों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज जरूरी है।’ बम फेंकने के बाद भगतसिंह द्वारा फेंके गए पर्चों में यह लिखा था।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने नौजवानों में पैदा कर दी थी स्वतंत्रता के प्रति दीवानगी। जब अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त हमारे देश में चारों ओर हाहाकार मची हुई थी तो ऐसे में इस वीर भूमि ने अनेक वीर सपूत पैदा किए जिन्होंने अंग्रेजों की दास्ता से मुक्ति दिलाने की खातिर हंसते-हंसते देश की खातिर प्राण न्यौछावर कर दिए। इन्हीं में तीन पक्के क्रांतिकारी दोस्त थे, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव। इन तीनों ने अपने प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारों से भारत के नौजवानों में स्वतंत्रता के प्रति ऐसी दीवानगी पैदा कर दी कि अंग्रेज सरकार को डर लगने लगा था कि कहीं उन्हें यह देश छोड़ कर भागना न पड़ जाए। तीनों ने ब्रिटिश सरकार की नाक में इतना दम कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 24 मार्च, 1931 को तीनों को एक साथ फांसी देने की सजा सुना दी गई। इनकी फांसी की बात सुनकर लोग इतने भड़क चुके थे कि उन्होंने भारी भीड़ के रूप में जेल को घेर लिया था।

अंग्रेज इतने भयभीत थे कि कहीं विद्रोह न हो जाए। इसी बात को मद्देनजर रखते हुए उन्होंने एक दिन पहले यानी 23 मार्च, 1931 की रात को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी और चोरी छिपे उनके शवों को जंगल में ले जाकर जला दिया। जब लोगों को इस बात का पता लगा तो वे गुस्से में उधर भागे आए। अपनी जान बचाने और सबूत मिटाने के लिए अंग्रेजों ने उन वीरों की अधजली लाशों को बड़ी बेरहमी से नदी में फिंकवा दिया। छोटी उम्र में आजादी के दीवाने तीनों युवा अपने देश पर कुर्बान हो गए। आज भी ये तीनों युवा पीढ़ी के आदर्श हैं।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु, इन तीनों की शहादत को पूरा संसार सम्मान की नजर से देखता है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। जहां एक भगत सिंह और सुखदेव कालेज के युवा स्टूडैंट्स के रूप में भारत को आजाद कराने का सपना पाले थे, वहीं दूसरी ओर राजगुरु विद्याध्ययन के साथ कसरत के काफी शौकीन थे और उनका निशाना भी काफी तेज था। वे सब चंद्रशेखर आजाद के विचारों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने क्रांतिकारी दल में शामिल होकर अपना विशेष स्थान बना लिया था। इस क्रांतिकारी दल का एक ही उद्देश्य था सेवा और त्याग की भावना मन के लिए देश पर प्राण न्यौछावर कर सकने वाले नौजवानों को तैयार करना।

लाला लाजपत राय जी की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसम्बर, 1928 को भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स पर गोलियां चलाईं और वहां से भाग निकले। हालांकि, वे रक्तपात के पक्ष में नहीं थे लेकिन अंग्रेजों के अत्याचारों और मजदूर विरोधी नीतियों ने उनके भीतर आक्रोश भड़का दिया था। अंग्रेजों को यह जताने के लिए कि उनके अत्याचारों से तंग आकर पूरा भारत जाग उठा है, भगत सिंह ने केंद्रीय असैंबली में बम फैंकने की योजना बनाई। वह यह भी चाहते थे कि किसी भी तरह का खून-खराबा न हो।
इस काम के लिए उनके दल की सर्वसम्मति से भगत सिंह व बुटकेश्वर दत्त को चुना गया। कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल, 1929 को केंद्रीय असैंबली में ऐसी जगह बम फैंके गए थे, जहां कोई मौजूद नहीं था। भगत सिंह चाहते तो वहां से भाग सकते थे लेकिन उन्होंने वहीं अपनी गिरफ्तारी दी। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए उन्होंने कई पर्चे हवा में उछाले थे ताकि लोगों तक उनका संदेश पहुंच सके।

जेल में भी अध्ययन करते थे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को आज आजादी के जोशीले दीवानों के रूप में जाना जाता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जेल में लम्बे समय तक रहते हुए उन्होंने कई विषयों पर अध्ययन किया और अनेकों लेख लिखे। उनकी शहादत के बाद उनके अनेकों लेख प्रकाशित किए गए जिनके जरिए वे समाज में एक क्रांति लाना चाहते थे। वे एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे जहां सभी संबंध समानता पर आधारित हों व हर व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा हक मिले। अक्तूबर 1929 को भगत सिंह ने जेल से एक पत्र भारत के युवाओं के नाम लिखा, जिसमें उन्हें सेदेश दिया गया था कि स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। जेल में इन तीनों और इनके साथियों पर अत्याचार किए गए।

लम्बी चली इनकी भूख हड़ताल को तोडऩे के लिए अंग्रेजों ने इन्हें अमानवीय यातनाएं दीं लेकिन वे विफल रहे। छोटी आयु में ही देश पर जान कुर्बान करने वाले इन क्रांतिकारी शहीदों को समस्त समाज को आदर्श मानकर देश की अखंडता,एकता व परस्पर भातृत्व के लिए एकजुट होकर कार्य करना चाहिए आने वाली पीढीयों को भी ऐसे प्रेरणादाई जीवन प्रसंगों से सीख लेकर इनके विचारों पर चलकर आगे बढना चाहिए सरकारों को भी आवश्यकता है कि बाबर हुमायूं जहांगीर जैसे अक्रांताओं की जगह इन महान् स्वतंत्रता सेनानीयों के जीवन दर्शन को विषय अध्ययन के रूप में पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए ताकि युवा इनके बारे में जान सके इनके नाम पर युवाओं के लिए योजनाएं लाई जानी चाहिए ताकि इनके अदगम्य कार्यों व बलिदान का सार्थक रूप से सम्मान भी हो सके।

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