सुनियोजित हिंसा की नई सुरक्षा चुनौती

हिंदू धर्म की शोभा यात्राओं पर हमले का क्रम राजधानी दिल्ली तक पहुंच गया । जहांगीरपुरी में हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर भीषण हमला और आगजनी ठीक वैसे ही है जो हम मध्य-प्रदेश के खरगोन से गुजरात के खंभात तक देख चुके हैं । राजस्थान के करौली से लेकर देश के कई क्षेत्रों  में  धार्मिक शोभा यात्राओं पर भीषण हमले और उत्पन्न हिंसा की छानबीन के बाद जो तथ्य सामने आ रहे हैं उसमें दिल्ली के हिंसा भयभीत जरूर करती है लेकिन आश्चर्य में नहीं डालती। छह राज्यों के अलग-अलग स्थानों में एक ही तरह की हिंसा अनायास और छिटपुट घटनाएं हो ही नहीं सकती। वास्तव में हमले और हिंसा की घटनाएं अलग-अलग नहीं थी।

दिल्ली के पहले गुजरात, झारखंड ,पश्चिम बंगाल ,कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि राज्य धार्मिक शोभायात्राओं के दौरान हुई हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार हुए। इन सभी राज्यों की हिंसक घटनाओं के बीच कुछ समानताएं आपको दिखाई देंगी। पहले शोभा यात्रा पर हमले, पूरी तैयारी के साथ आगजनी और हिंसा। ये सब सुनियोजित तरीके से की गई और एक कड़ी के अंग हैं। सभी राज्यों में जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं उनमें कुछ या कोई  किसी न किसी का नाम ले रहा है। वैसे भी पेट्रोल बम, तलवार, पिस्तौल के साथ अनगिनत पत्थरों, कांच की बोतलों का चलना, लक्षित आगजनी आदि अचानक नहीं हो सकता। इतनी संख्या में पत्थरों, बोतलें, टूटे कांच आदि एकाएक नहीं आ सकती ।

सबसे पहले  इसके पीछे की सोच को समझना जरूरी है।  जरा सोचिए, वर्षों से अलग-अलग स्वरूपों में निकलतीं शोभायात्राएं जिन लोगों को सहन नहीं हो वो कैसी मानसिकता रखते होंगे? खरगोन से गुजरात के खंभात तक की हिंसा स्पष्ट कर रही है कि कैसे इन सबके बीच अंतर्संबंध था । हिंसा का भयावह सच वीडियो और सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है। दिल्ली का वीडियो देख लीजिए । इसमें शोभायात्रा में लोग गाते नारा लगाते चल रहे हैं और अचानक उन पर भारी संख्या में लोग हमला कर देते हैं । पूरा वातावरण डरावना है। शोभायात्रा में शामिल लोग अपनी गाड़ियां तक छोड़कर जान बचाने के लिए भाग रहे हैं ।

10 अप्रैल को खरगोन में अचानक हुए हिंसा और हमले से लोग इतने डरे थे कि उन्होंने छुपकर वीडियो बनाए और उसे तब बाहर किया जब महसूस हुआ कि उन्हें कोई खतरा नहीं होगा। तवड़ी मोहल्ले का एक वीडियो है जिसमें पेट्रोल बम फेंककर जबरदस्त आगजनी करते देखा जा रहा है। स्पष्ट लगता है कि पहले से तय करके पेट्रोल बम फेंके गए और आग लगाए गए। ईंट और पत्थरों की तो बारिश हो रही है। एक वीडियो ऐसा भी है, जिसमें एक युवक अपनी छत से सीसीटीवी कैमरे को दूसरी तरफ घुमा रहा है और उसके ठीक पीछे से दूसरे पक्ष पर जमकर पथराव किया जा रहा है।

खरगोन के गौशाला मार्ग का दृश्य भी ऐसा ही है। शाम 5:45 बजे सैकड़ों लोग एकत्रित हुए और हथियारों, डंडों, पत्थरों व अन्य सामानों से  लगातार हमले कर रहे हैं। कई हमलावर यहां भी सीसीटीवी निकालते दिख रहे हैं।शीतला माता मंदिर में तोड़फोड़ का दृश्य पाकिस्तान में हिंदू मंदिरों पर होने वाले हमले की तरह है। जितनी संख्या में हिंसा करते लोग दिख रहे हैं वह एकाएक इकट्ठे हो ही नहीं सकते। जाहिर है, पहले से पूरी तैयारी करके इकट्ठे थे। तो ये कौन है जिन्होंने देशव्यापी हिंसा की साजिशें रच कर उन को अंजाम तक पहुंचाने में सफलता पाई?

इसका कुछ उत्तर गुजरात के आणंद जिले के खंभात इलाके में 5 अप्रैल को एक धार्मिक जुलूस पर हुए हमले के आरोप में   पकड़े गए लोगों से पूछताछ के बाद मिल रहा है। गिरफ्तार लोगों से पता चला है कि उस हिंसा के पीछे का मुख्य मस्तिष्क मौलवी रजक पटेल है।  मौलवी रजक घटना को अंजाम देने के लिए जिले के बाहर और कुछ विदेशी लोगों से आवश्यक धन की व्यवस्था को लेकर भी संपर्क में था।  फंड जुटाने का काम मतीन नाम के शख्स को दिया गया था। जैसे ही इन्हें पता चला कि रामनवमी जुलूस की अनुमति मिल गई है इन्होंने तीन दिन के अंदर  पूरी व्यवस्था कर ली। जाहिर है, तैयारी पहले से हो रही होगी। कब्रिस्तान से पत्थर फेंकने की योजना इसलिए बनाई गई ताकि पत्थरों की कमी न पड़े।आणंद के अलावा साबरकांठा और द्वारिका में भी शोभा यात्राओं को निशाना बनाया गया। झारखंड के बोकारो और लोहरदगा में पहले शोभायात्रा ऊपर हमले हुए और फिर आगजनी की गई।

अभी तक की छानबीन का निष्कर्ष है कि इन लोगों ने शोभा यात्राओं पर इसलिए हिंसा किया ताकि इनके अंदर भय पैदा हो और आगे से यात्रा न निकालें। यही मानसिकता दिल्ली से लेकर अन्य जगहों में थी। यह मानसिकता जुनूनी मजहबी घृणा से ही पैदा होती है और विश्व स्तर पर यह जिहादी आतंकवाद के रूप में हमारे सामने है। जिस तरह से कोई आतंकी मॉड्यूल योजना बनाकर हमला करता है लगभग वैसा ही तौर तरीका इनका भी था। यानी पहले बैठकें करना, उसमें शोभा यात्राओं को कहां-कहां किस तरह निशाना बनाना है उन पर चर्चा करना, योजना बनाना ,उन्हें अंजाम देने के लिए संसाधन जुटाना, मुख्य लोगों को तैयार करना या बाहर से बुलाना, लोगों को भड़का कर इसके लिए तैयार करना,  शोभायात्रा आने के पहले घात लगाकर बैठना और अचानक हमला कर देना…..।

तो इन हमलों के संदेश क्या है?आमतौर पर माना जाता है कि केंद्र से लेकर अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारों के कारण जिहादी और सांप्रदायिक तत्व कमजोर पड़ गए हैं। वे  बड़ी साजिशों को नहीं सफल कर पा रहे। आतंकवादी हिंसा को अंजाम देने वाली ताकतें भी निराश हैं। इस कारण सीधे आतंकवादी हमले करने की जगह इन शक्तियों ने तरीका बदलने की शुरुआत की है। खुफिया एजेंसियां वर्षों से रिपोर्ट दे रही हैं कि जिहादी आतंकवादी तत्व प्रमुख हिंदू पर्वों त्योहारों के साथ प्रसिद्ध धर्मस्थलों पर हमले की साजिशें रच रहे हैं। स्पष्ट है कि सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी कार्रवाइयों में ऐसे अनेक हमलों को साकार होने के पहले ही विफल किया है। बावजूद रामनवमी की शोभायात्राओं पर इस तरह के सुनियोजित हमले सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल अवश्य खड़ी करती हैं।  संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा की पहले से व्यवस्था की गई होती तो ऐसा नहीं होता।

यह कैसे संभव है कि इतनी भारी मात्रा में ईट, पत्थर, डंडे, तलवारें, आगजनी के सामान इकट्ठे हो जाएं , बाहर से लोगों को बुलाया जाए और पुलिस प्रशासन को इसकी जानकारी न मिले? जितने खुलासे अब हो रहे हैं उनसे लगता है कि राष्ट्रव्यापी साजिश रचने के पीछे पीएफआई जैसे संगठनों का हाथ हो सकता है। इसमें सच्चाई है तो यह दो मायनों में ज्यादा चिंताजनक है। एक,पीएफआई पहले से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है। बावजूद वह एकपक्षीय सांप्रदायिक हिंसा की साजिशों को अंजाम देने में सफल हो गया। क्या इनकी गतिविधियों पर नजर रखने में हाल के महीनों में ढिलाई बरती गई? दूसरे , आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने के विकल्प के तौर पर इस प्रकार की एकपक्षीय हिंसा और दंगा हमारे लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है।

वास्तव में इन घटनाओं  की सीख यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें तथा सभी सुरक्षा एजेंसियां देश विरोधी जेहादी ताकतों को लेकर सतर्कता और चौकन्नापन में थोड़ी भी ढिलाई न बरतें। योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में रामनवमी के जुलूस 800 स्थानों से निकले लेकिन कहीं हिंसा की घटना नहीं हुई। यह सोचने की बात है कि उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य में कहीं हिंसा नहीं हुई वह भी उस स्थिति में जब विरोधियों के लाख न चाहने के बावजूद भाजपा की सरकार बहुमत से वापस आई है। स्वाभाविक ही इन शक्तियों के अंदर गुस्सा और असंतोष होगा। अगर वहां वे हिंसा करने में कामयाब नहीं हुए तो इसके पीछे सख्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ यह भय भी मुख्य कारण है कि अगर पकड़े गए तो अपने सहित परिवारों, रिश्तेदारों के साथ पुलिस प्रशासन किसी सीमा तक जा सकती है। घटना के बाद मध्यप्रदेश सरकार उन लोगों की संपत्तियां बुलडोजर से ध्वस्त करवा रही हैं जिनके चेहरे साफ तौर पर वीडियो फुटेज में दिख रहे हैं।

इससे भय वहां भी पैदा हुआ है। आगे इसका असर होगा। किंतु खरगोन की हिंसा बता रही है कि पुलिस प्रशासन अनुमान लगाने में विफल था और इस कारण त्वरित निपटने की तैयारी नहीं थी। धार्मिक आयोजनों पर  हमले और बाद में हिंसा को अंजाम देने वाले आतंकवादी ही हो सकते हैं। इनके साथ उसी तरह की कार्रवाई होनी चाहिए। तो इन नई श्रेणी के आतंकवादियों से इस तरह निपटा जाए कि आगे ऐसा करने की सोचने वालों की कंपकंपी छूट जाए। विडंबना देखिए कि देश में सेक्यूलरवाद और लिबरलवाद का झंडा उठाए पत्रकारों ,बुद्धिजीवियों ,नेताओं और एक्टिविस्टों के मुंह पर इन मामलों ताले लगे हुए हैं।

यही हिंसा मुस्लिम धार्मिक जुलूस पर होती तो तूफान खड़ा हो चुका होता, संभव है टूल किट भी बन जाता और दुनिया भर में प्रचार होता कि भारत में फासिस्ट शक्तियों का राज आ गया है जो हिंदू धर्म के अलावा हर मजहब को हिंसा की बदौलत नष्ट करना चाहते हैं। एक मस्जिद पर कुछ युवकों द्वारा भगवा झंडा लगाने का कितना प्रचार हुआ इसे याद करिए। यकीनन यह गलत है। उन्हें भी रोका जाना चाहिए। किंतु उस घटना पर आप आवाज उठाएं और इतनी बड़ी हिंसा पर चुप्पी साधे रहें तो आपको झूठा और पाखंडी मानना ही होगा। जो भी हो हम सबको इन घटनाओं के बाद ज्यादा गहराई से अपने विचार और व्यवहार पर विचार करने की आवश्यकता है। अच्छा होगा कि केंद्र सरकार एनआईए को संपूर्ण हिंसा की जांच सौंप दे ताकि राष्ट्रव्यापी साजिशों का खुलासा हो सके।

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