अल्पसंख्यक होने का पुनः निर्धारण हो

भारतीय राजनीति में अल्पसंख्यकवाद हमेशा से एक ज्वलंत मुद्दा रहा है। अभी हाल के दिनो में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा  इस विषय पर कोर्ट में करी गई अपील ने इस मुद्दे को फिर एक बार सुर्ख़ियो में ला खड़ा किया है। अल्पसंख्यक प्रश्न आज का है, ऐसा नही बल्कि देश के दूसरे बड़े आबादी वाले समूह ने आजादी से पूर्व भी अपने को अल्पसंख्यक दिखा अंग्रेज़ी सरकार से विशेष सुविधा लेने की अपील करते आये है।

ये अल्पसंख्यकवाद भारत में विभाजन का एक प्रमुख कारण भी बना क्या इस यथार्थ से हम परिचित नही है?। आज भी इस अल्पसंख्यक राजनीति का सबसे अधिक लाभ मुस्लिम वर्ग ही ले रहा है,ये एक तरह का मुस्लिम तुष्टिकरण ही है। अल्पसंख्यक मन्त्रालय का निर्माण एक तरह से मुस्लिम वर्ग का ही संरक्षण करना मात्र हो गया है। इसी पर विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल कहते है की “अल्पसंख्यक मन्त्रालय का कोई औचित्य ही नही बल्कि इस नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण ही हो रहा है”। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थपाना इसी अल्पसंख्यकवाद की देन कही जा सकती है। इसी अल्पसंख्यक स्टेटस की माँग ने बंगाल विभाजन के बीज बोए थे।

इसी ने बाद में एक मजहब, पूजा पद्धति के आधार पर एक देश को जन्म दिया। आज़ादी के बाद संविधान निर्माता एवं सरकार में शामिल लोगों ने कई ऐसे प्रावधान बनायें जिनसे भारत में किसी भी वर्ग को ऐसा ना महसूस हो की उसके किसी भी प्रकार के अधिकारो का तनिक भी हनन हो रहा है। इसे देखते आजादी के बाद बनी सरकार ने और पूज्य बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान में कुछ अनुच्छेदों के माध्यम से कुछ समुदायों के रीति-रिवाजों, उनकी संस्कृति, उनके रिलिजन पूजा विधि को संरक्षित करने हेतु सविधान के मौलिक अधिकारो में अनुच्छेद 29 एवं 30 को जोड़ा। इसमें ये सुनिश्चित किया गया की विशेष पूजा विधि, भाषा, रीति-रिवाज आदि को  संरक्षित और उनके संवर्धन हेतु सरकार  कुछ विशेष प्रवधानो को निर्मित करेगी।

यद्धपि भारतीय संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग किया गया है लेकिन इसकी परिभाषा कही नहीं दी गई हैं।  यह केंद्र सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की परिभाषा पर ही आधारित है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30 के अलावा 350A तथा 350B में भी अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग जरूर किया गया है, लेकिन इसकी  परिभाषा नहीं दी गई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि “भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों को उनकी अपनी विशेष भाषा लिपि या संस्कृति बनाए रखने का अधिकार होगा। वही, अनुच्छेद 30 में बताया गया है कि धर्म या भाषा पर आधारित अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा”।

वही, अनुच्छेद 350A और 350B में भाषाई अल्पसंख्यक की बात कही गई है।  भारत सरकार ने 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत पांच समुदायों जिसमे मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी तथा बौद्ध को अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में मान्यता दी तथा वर्ष 2014 में जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक की श्रेणी में शामिल किया गया। वैसे समय- समय पर कोर्ट द्वारा अल्पसंख्यको को चिन्हित करने के कार्य को राज्य सरकारों पर सौंपा गया है। वर्ष 2002 में “TMA पाई फाउंडेशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया वाद” में माननीय सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की संविधानिक बेंच  ने कहा कि, “राज्य कानून के संबंध में धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक का निर्माण करने वाली इकाई केवल राज्य सरकार हो सकती है”।  अर्थात राज्य सरकार अपने राज्य में अल्पसंख्यक का निर्धारण कर सकती है एवं उनके अधिकारों, हितों की पुष्टि के लिए कार्य कर सकती है।

वही, 2005 के ही “बाल पाटिल वाद” में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारत में भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक निर्धारित करने का काम राज्य का होगा। वही केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में यह कहा है कि अब अल्पसंख्यक की परिभाषा को परिभाषित करने का समय आ गया है। लेकिन इन सबके बावजूद भी भारत में अभी तक अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। जहां संविधान में अल्पसंख्यक शब्द की कोई भी परिभाषा नहीं दी गई है,वर्ष 1993 में गठित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने भी अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किया था। वहीं 2006 में अल्पसंख्यक मामले के मंत्रालय का गठन हुआ तो भी उसने अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किया। आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी अल्पसंख्यक कौन है यह परिभाषित नही किया गया है।

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया है कि राज्य सरकारें अब हिंदुओं सहित किसी भी धार्मिक या भाषाई समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकती है। एक याचिका में कहा गया है कि भारत के 6 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदू अल्पसंख्यक है लेकिन वह अल्पसंख्यकों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ उठाने में सक्षम नहीं है वर्ष 2011 की जनसंख्या के अनुसार लक्षदीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं।  भारत में बहुत से ऐसे राज्य है जहां पर अल्पसंख्यक ही बहुसंख्यक है उदाहरण के तौर पर जम्मू कश्मीर एवं लक्षदीप में मुस्लिम बहुसंख्यक है वही मिजोरम, नागालैंड में ईसाई बहुसंख्यक है. पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं।

इसके विपरीत असम, पश्चिम बंगाल केरल या उत्तर प्रदेश बिहार में मुसलमानों की जनसंख्या अच्छी- खासी है फिर भी उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है और वे इसका लाभ ले रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ वे समुदाय जो वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त ना होने के कारण वह लाभ से वंचित है। उदाहरण के तौर पर लक्षद्वीप में मात्र 2% हिंदू है लेकिन वे वहां अल्पसंख्यक ने होकर बहुसंख्यक है और 98% आबादी वाले मुसलमान अल्पसंख्यक है। भारत एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष और लोक कल्याणकारी राज्य है जो सभी वर्गों के लोगों को गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है लेकिन इतने वर्षों के बाद भी अल्पसंख्यक को परिभाषित नहीं किया गया है।

अब समय आ गया है कि अब राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बल्कि प्रदेश, प्रादेशिक स्तर पर भी अल्पसंख्यकों को परिभाषित किया जाए एवं जिन राज्यों में जिस समुदाय के लोग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से तथा जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यक हैं उन्हें अल्पसंख्यकों का दर्जा दिया जाए ताकि वह समाज एवं राष्ट्र की मुख्यधारा में आ सके। अन्यथा इस अल्पसंख्यक के नाम पर हो रही राजनीति और उस आधार पर हो रही बंदरबाट पर रोक लगनी चाहिये।

This Post Has One Comment

  1. Anonymous

    सटीक विश्लेषण

आपकी प्रतिक्रिया...