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*** घनश्याम श्रीवास्तव ***
    

 भारत के इतिहास में या कुछ मामलों में तो पूरे विश्व के इतिहास में अगर देखा जाए तो बिहार कई मामलों में क्रांति वाहक रहा है- चाहे गणराज्यीय व्यवस्था हो, अध्यात्म हो या समय-समय पर सामाजिक व राजकीय व्यवस्था में परिवर्तन की बात हो। पौराणिक काल, प्राचीन काल, मध्यकाल या फिर आधुनिक काल का भारत हो- हर काल की अगर हम ठीक से और गहराई से पड़ताल करें तो हम पाएंगे कि बिहार या तब का मगध राज कई मामलों में क्रांतिकारी विचारों का उद्गम और प्रश्रय केंद रहा है जिसने पूरे आर्यावर्त और विश्व को प्रभावित किया है।
    राजकीय व्यवस्था के रूप में विश्व की पहली गणराज्यीय व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए राजशाही ही सबसे अच्छी व्यवस्था हो सकती है, इस विचार को सबसे पहले बिहार ने ही नकारा और विकल्प के रूप में गणराज्यीय व्यवस्था का प्रतिपादन किया। वैसे तो द्वापर युग के महाभारत काल में भीष्म ने महाभारत के शांतिपर्व के अध्याय के १०७/१०८ श्लोकों में युधिष्ठिर को गणराज्यों के बारे में बताते हुए कहते हैं. ‘‘ जिन गणराज्यों में गण यानी कि लोग जब एकता के साथ रहते हैं तब वे गणराज्य बहुत फलते-फूलते हैं तथा लोग भी समृद्धशाली होते हैं। बुद्धिमान, ईमानदार और शास्त्र विद्या में निपुण होते हैं। वे एक दूसरे को धोखा नहीं देते और दुख और कष्ट में एक दूसरे की मदद करते हैं। यही कारण है कि वे विकास और प्रगति करते हैं।’’
श्लोक:१०७
भेदे गण: विनेशुर ही भिन्नास्तु सुजय: परै:
तस्मात संघात्योजेन प्रयतेरण गण: सदा
गणराज्य लोगों के अंतरकलह के कारण ही नष्ट होते हैं। इसलिए गणराज्य में लोगों में हमेशा आपसी रिश्ता अच्छे होने चाहिए।
भीष्म आगे कहते हैं
श्लोक:१०८
तेशाम अयोन्याभिन्नानाम् स्वशक्तिम् अनुतिष्ठितम्
निग्र: पंडितै: कार्य: क्षिप्रमेव प्रधानत:
    इसलिए गणराज्यों में बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे ऐसे दुष्ट लोगों को दबा दे जो लोगों में विभेद पैदा करते हों।
इस उद्धरण से साफ जाहिर होता है कि महाभारत काल में सिर्फ राजघराने (हस्तिनापुर तथा इंद्रप्रस्थ) ही नहीं थे अपितु गणराज्यों का भी प्रचलन था।
खैर यह तो बात पुराणों की हो गई जिसे कोई ठोस प्रमाण नहीं होने से वाद विवाद का विषय बनाया जा सकता है। पर जहां तक ऐतिहासिक सबूतों की बात है तो विश्व का सबसे पुराना अगर कोई गणराज्य है तो वह है लिच्छवि गणराज्य, न कि ग्रीस (यूनान); जैसा कि कई लोगों का मानना है।
     जब हम बिहार को क्रांति वाहक कहते हैं तब हम यहां बताते चलें कि पूरे विश्व को गणराज्यीय व्यवस्था बिहार की ही देन है। इसी गणराज्यीय व्यवस्था को हम गणतंत्र, प्रजातंत्र, रिपब्लिक या डेमोक्रेसी कहते हैं। इसी की प्राचीनतम व्यवस्था हम भारत के गांव-गांव में पंचायतों के रूप में देख सकते हैं। इस तरह की राजकीय व्यवस्था कमोबेश में विश्व के सभी प्रमुख देशों में लागू है।
बिहार का जन्म
    बिहार का प्राचीन नाम मगध था। मगध साम्राज्य देश का सबसे शक्तिशाली राज्य माना जाता था। मौर्य वंश, गुप्त वंश, शुंग वंश तथा अन्य कई राजवंशों ने इस पर राज किया। बिंबिसार, अजातशत्रु, चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार तथा सम्राट अशोक इन राजवंशों के ध्वजधारक थे। मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य को कौन नहीं जानता? जिनके प्रधान मंत्री आर्य चाणक्य की देश भाक्ति से कौन अपरिचित है? अपने को विश्व विजेता कहनेवाला सिकंदर जब पूरे भारत को रौंदता हुआ घुसा जा रहा था तो उसे ललकार कर मगध की सीमा पर रोकनेवाला आर्य चाणक्य और उसका शिष्य चंद्रगुप्त ही था। सिकंदर को मुंह की खानी पड़ी। आगे चलकर चंद्रगुप्त-चाणक्य ने पूरे भारत को एक किया। इन्ही के वंशज बिंदुसार और फिर उसके पुत्र सम्राट अशोक ने मगध राज्य की सीमा को पश्चिम में अफगान तक फैला दिया था। मगध राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र थी जिसे आज पटना के नाम से जाना जाता है।
भगवान बुद्ध के महानिर्वाण के बाद बौद्ध धर्म का प्रचार धीमा पड़ गया था। आगे चलकर इसे पुन: बढ़ाने का काम सम्राट अशोक ने किया और अपने पुत्र महेंद्र को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा। पाटलीपुत्र के जिस गंगा घाट से महेंद्र रवाना हुए वह घाट आज भी पटना में विद्यमान है जिसे महेंद्रु कहते हैं।
      मगध में बौध धर्म के प्राचारार्थ कई बौद्ध मठ बने और बौद्ध धर्म के प्रचारकों के प्रवास के लिए जगह-जगह बौद्ध विहार बने। आगे चलकर इन्हीं बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण मगध का नाम विहार हो गया और फिर कालांतर में बिहार हो गया। बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण कर उस पर अधिपत्य जमा लिया और
      मगध यानी बिहार देश की प्रशासनिक राजधानी नहीं रहा। लेकिन सोलहवीं सदी में शेरशाह सूरी ने दिल्ली में मुगल बादशाह हुमायूं को हराकर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा कर किया तब बिहार पुन: प्रकाश में आया। शेरशाह के मरणोपरांत दिल्ली की सत्ता पर जब अकबर काबिज हुआ तो उसने बिहार को अपने अधीन कर बंगाल के नवाबों
को सौप दिया। अंग्रेजों ने भी बंगाल, उडीसा और बिहार को एकसाथ मिलाकर ही राज्य करते रहे। बिहार का अलग से कोई अस्तित्व नहीं था।
आधुनिक बिहार
     १८५७ जब देश में अंगे्रजी हूकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता का पहला संग्राम हुआ तो बिहार भी पीछे नहीं रहा और आरा के बाबू कुंवर सिंह के नेतृत्व में इस संग्राम में कूद पड़ा। १९१२ में बंगाल के विभाजन के कारण बिहार का नाम फिर अस्तित्व में आया। आगे चलकर १९३५ में उड़ीसा को भी अलग कर दिया गया।
अग्रणी बिहार
     यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि बिहार कई मामलों में आरंभ से ही अग्रणी रहा है। भारत के जितने आधुनिक धर्म हैं वे सभी बिहार की देन हैं। जैन धर्म का प्रादुर्भाव बिहार में ही हुआ। बौद्ध धर्म की जन्मस्थली भी बिहार ही है। जैन धर्म की धर्मस्थली भी बिहार ही है। इसके प्रमाणस्वरूप पटना के कुछ दूरी पर पावापुरी आज भी अपनी पूरी शानोशौकत से विद्यमान है जहां लाखों जैन धर्मावलंबी नित्य आते हैं। सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरू गोविंद सिंह जी की जन्मस्थली भी बिहार ही है। उनका जन्म बिहार के पटना साहिब में हुआ था।
देश के विश्व प्रसिद्ध खगोलशास्त्री आर्यभट्ट बिहार के ही थे तो आधुनिक भारत के साथ-साथ अमेरिका में भी गणित के क्षेत्र में तहलका मचा देने वाले गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह भी बिहार के ही हैं। पूरे विश्व में सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चल कर बड़े से बड़े दमनकारी और शासन को उखाड़ कर फेंका जा सकता है इसकी परिकल्पना करनेवाले तथा व्यवहार में इसे पूरा कर दिखानेवाले महान क्रांतिकारी और मानवता के अग्रणी चिंतक महात्मा गांधी ‘बापू’ ने भी भारत में अपने आंदोलन के लिए सबसे पहले बिहार के ही चंपारण को ही चुना। फिर वहां से जो क्रांति की मशाल जली तो उसकी लपटों में पूरी अंग्रेजी सरकार, जिसके राज्य में कभी सूरज अस्त नहीं होता था, झुलस कर राख हो गया। इन्हीं महात्मा गांधी के अग्रणी अनुगामियों में जयप्रकाश नारायण थे। वह भी बिहार के ही थे, जिन्होंने इंदिरा गांधी के द्वारा देश पर थोपे गए आपात काल के विरुद्ध जबरदस्त आंदोलन छेड़ा और बिहार के पटना से संपूर्ण क्रांति का नारा दिया और इस प्रकार भारत के इतिहास में दूसरी आजादी की लड़ाई में भारतीय जनता का सफल नेतृत्व किया और इंदिरा गांधी के दमनकारी शासन को उखाड़ फेका।
     देश जब आजाद हुआ तब आजाद भारत को प्रथम राष्ट्रपति देने का गौरव बिहार  को ही नसीब हुआ। और इस प्रकार देश रत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति बने। राजेंद्र बाबू महात्मा गांधी के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे।
बिहार के साहित्यकार
      साहित्य के क्षेत्र में भी बिहार देश के मानस पटल पर सदा से ही रहा है। जहां तक हिंदी भाषा को योगदान का सवाल है बिहार के योगदान को भूला नहीं जा सकता। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की अमर कृति ‘रश्मि रथी’ को कौन भूल सकता है! वास्तव में ‘रश्मि रथी’ ने इतिहास के पार्श्व में पड़े कर्ण को अमर कर दिया। तभी से महारथी कर्ण खलनायक नहीं बल्कि प्रतिनायक बन गया। वीर रस के प्रखर कवि दिनकर की ये पंक्तियां…
‘‘खम ठोकता है मानव पर्वत के जाते पांव उखड़
मानव जब जोर लगाता है पर्वत पानी बन जाता है’’
…मानव की ताकत को ललकारती है और बताती है कि मनुष्य के सामाने कुछ भी असंभव नहीं, बस भगीरथ प्रयास की जरूरत होती है।
महान लेखक प्रेमचंद के बाद आंचलिक कथाओं के झंडे को बुलंद करतेे रहनेवाला अगर कोई रचनाकार था वे थे फणिश्वर नाथ रेणु ‘जिनकी परती परिकथा’, ‘संवदिया’, ‘मैला आँचल’ और ‘मारे गए गुलफाम’ को कौन नहीं जानता!
     

‘मैला आँचल’ और ‘मारे गए गुलफाम’ पर तो फिल्में भी बन चुकी हैं। जी हां, ‘मारे गए गुलफाम’ का ही फिल्म रूपांतरण थी राज कपूर की फिल्म ‘तीसरी कसम’ जिसे बिहार के दूसरे मूर्धन्य गीतकार जनकवि शैलेंद्र ने निर्मित किया था। गोपाल सिंह नेपाली, बाबा नागार्जुन, वैसे तो शरत चंद्र चटोपाध्याय बंगाली भाषा के लेखक थे पर थे वे मूलत: बिहार में भागलपुर के। अमर कृति ‘चंद्रकांता’ नामक तिलस्मी उपन्यास के लेखक देवकी नंदन खत्री भी मूलत: बिहार के ही थे।
     उर्दू भाषा को भी समृद्ध करने में बिहार का काफी योगदान रहा है। शाद अजीमाबादी, जमील मझारी, मौलाना शबनम कामली, कैफ अजीमाबादी एवं बिस्मिल जैसे लोगों का अविस्मरणीय योगदान है। बिस्मिल यानी मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व शायर राम प्रसाद बिस्मिल, जिनका गीत ‘‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है; देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है’’ देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का जोशीला तराना बन गया था।
      हिंदी तो हिंदी, अंग्रेजी साहित्य में माइल स्टोन माने जानेवाले ‘एनिमल फार्म’ के मशहूर लेखक जॉर्ज ओरवेल (एरिक अर्थर ब्लेयर) का जन्म भी बिहार के ही मोतिहारी में हुआ था।
     बिहार का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है। पर आज के बिहार से हम तुलना करें तो लगता है जैसे बिहार अपनी विरासत को खोता जा रहा है। और इसके लिए वहां की जनता नहीं बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतज्ञ जिम्मेदार हैं। राजनीतिक रूप से भी बिहार पूरे देश को समय-समय पर जागरूकता का संदेश देता रहा है। फिर भी बिहार में जात-पांत की जड़ें बहुत गहरी हैं। राजनीतिक धरातल की बात करें तो पूरा बिहारी समाज ऊपर से लेकर नीचे के स्तर तक जात-पांत में बटा है। इसलिए कभी विश्व को उच्चतम शैक्षणिक मार्ग दिखानेवाले प्रतिभा संपन्न बिहार जात-पांत के विष की भेंट चढ़ गया है। बड़े बड़े ओहदों पर जात-पांत के झंडाबरदार बाहुबली कुंडली मारकर बैठ गए और बिहार का सत्यानाश करते चले गए। लेकिन पिछले महीने हुए आम चुनाव में बिहार ने पूरे भारत को रचनाशील संदेश देते हुए जात-पांत से ऊपर उठकर और नरेंद्र मोदी की बातों को मानते हुए गठजोड़ की राजनीति को तिलंाजलि दी और जात-पांत और तुष्टिकरण करनेवालों को धत्ता बताते हुए किसी एक पार्टी को अपना पूरा समर्थ दिया है। बिहार में जात-पांत के खिलाफ उठी हवा ने उत्तर प्रदेश को भी अपनी चपेट में ले लिया।
    आनेवाले समय में बिहार में आया यह क्रांतिकारी परिवर्तन पूरे देश में प्रगति का वाहक बनेगा। साथ ही बिहार भी पूरे देश के साथ-साथ प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ेगा। ऐसा लग रहा है कि बिहार अब अंगड़ाई ले रहा है और करवट बदलने की अवस्था में आ रही है।

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