तबला वादन को नई उंचाई देने वाले किशन महाराज

विद्यार्थी जीवन से ही मेरा संकटमोचन मंदिर जाने का क्रम रहा है। आज भी गांव जाने पर कोशिश रहती है कि हर शनिवार को अपने दर्शन कर सकूं। 1995 से लेकर 1999 तक मैं साइकिल से जाता रहा था।  इसी दौरान पिपलानी कटरा में साइकिल की बड़ी दुकान के सामने मैंने  एक बुजुर्ग को बाएं हाथ से हैंडपम्प चलाकर दाहिने हाथ का चुल्लू बनाकर पानी पीने के लिए झुकने की स्थिति में देखा। सहज मानवीय स्वाभाव के तहत मैं साइकिल से उतरा और हैंडपम्प  चलाने के लिए उद्यत हुआ। बुजुर्ग ने पहले अपना हाथ कड़ा कर प्रतिकार सा किया पर कुछ सोचकर ढीला छोड़ दिया। मेरे दो-चार पम्प चलाने के बाद उन्होंने बाएं हाथ से इशारा कर रुकने को कहा और अपना सिर उठाते-उठाते ठेठ बनारसी लहजे में पूछा, इतना ठारे में भिनसहरे किधर चल दिए? आओ चाय पीते हैं।

मुझे बहुत अजीब लगा पर उनके पीछे चल दिया। सामने चाय की दुकान पर पहुंचते ही बुजुर्ग मेरी ओर मुखातिब हुए। सादा या रंगीन? एक बनारसी होने के नाते रंगीन का अर्थ अच्छी तरह बूझता था। रंगीन यानी भांग मिलाकर। मैं समझ गया कि बुढ़ऊ बनारसी इस्टाइल में मुझे खिझा रहे हैं। मैंने भी हंसकर कहा, बनारस में चाय कब से रंगीन होइ गइल? वे खूब जोर से ठठाकर हंसे और फिर अगले तीस सेकेण्ड तक हंसते ही रहे। दुकानदार और आसपास खड़े लोग भी। असली बनारसी हो बउआ? बाद में पता चला, वे प्रख्यात तबलावादक पं. किशन महाराज थे। 3 सितम्बर  १९२३ को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन जन्मे किशन महाराज ने आज ही के दिन यानी 4 मई 2008 को गोलोक वास किया था।

पंडित जी तबले के 6 घरानों में सबसे युवा बनारस घराने से सम्बंध रखते थे। इस घराने की नींव करीब दो सौ साल पहले पं. राम सहाय ने रखी। छह माह के एकांतवास के बाद उन्होंने बनारसबाज शैली का सृजन किया था। गत, टुकड़ा, परन, उठान, बनारसी ठेका और फर्द सहित बीस से अधिक संयोजन शैलियों पर आधारित बनारसबाज की मजबूत नींव पर पं. बलदेव सहाय, पं. भैरव सहाय, पं. शारदा सहाय और पं.सामता प्रसाद (गुदई महाराज) जैसे दिग्गजों ने बनारसबाज का महल खड़ा किया और पद्मविभूषण पं. किशन महाराज ने उसमें चार चांद लगाए। कम उम्र में ही पिता के देहांत के बाद उनकी तबले की शिक्षा का भार चाचा पं. कंठे महाराज ने सम्भाला।

मात्र आठ वर्ष की अवस्था में सार्वजनिक प्रस्तुतियों का क्रम आरम्भ होने के बाद बहुत शीघ्र ही उन्होंने उस्ताद फैय्याज खान, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, पं. भीमसेन जोशी, पं. वसंत राय, पं. रवि शंकर, उस्ताद अली अकबर खान जैसे बड़े नामों के साथ संगत का अवसर हासिल किया। कथक की दुनिया के महान हस्ताक्षर शम्भु महाराज, सितारा देवी, नटराज गोपी कृष्ण और बिरजू महाराज के कार्यक्रमों में उनकी यादगार उपस्थिति रही। वर्ष 1965 में ब्रिटेन में कॉमनवेल्थ कला समारोह में भाग लेने के बाद से वे लगातार विदेश में भी कार्यक्रम करने लगे। उनके माथे पर लाल रंग का टीका हमेशा रहता था।

तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धति प्रचलित हैं, किंतु पं. किशन महाराज दोनों घुटनों पर बैठकर वादन करते थे। ख्याल गायन के साथ उनका तबला श्रोताओं पर जादू करता था। उनके ठेके में एक भराव था। दांये और बांये तबले का संवाद श्रोताओं पर विशिष्ट प्रभाव डालता था। उनकी लोकप्रियता कलासाधना, वैविध्यपूर्ण व्यक्तिगत प्रतिभा, प्रतिष्ठा और विद्वत्ता की द्योतक थी। उन्हें ‘संगति सम्राट’,  ताल विलास सम्मान,  उस्ताद इनायत खां मेमोरियल अवार्ड, केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड-१९८4, उस्ताद हाफ़िज़ अली खां अवार्ड-१९८६, कालिदास सम्मान-१९९६ समेत तमाम पुरस्कार-सम्मानों के अलावा भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण सम्मान भी प्राप्त हुए थे।

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