…ऑस्कर, नाम तो सुना ही होगा !!

विश्व का शायद ही कोई कोना हो जहां इंसान  रहते हों और फिल्में ना देखी  जाती हों। कहीं बड़े धूमधाम से बनती हैं और लोग उनके रिलीज होने का महीनों या सालों इंतजार करते हैं, तो कहीं पर लोग तमाम प्रतिबंधों के बावजूद चोरी-छिपे देख ही लेते हैं। कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, एक समय भारत का सबसे ज्वलंत राष्ट्रीय प्रश्न था। विश्व की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म अवतार के दूसरे भाग की प्रतीक्षा तो लोग 2009 में पहले भाग के रिलीज होने के बाद से ही कर रहे थे और अब जाकर उनकी मनोकामना पूर्ण होने को है।

लगभग हर क्षेत्र और भाषा के फिल्म उद्योग में एक परम्परा अवश्य रही है, फिल्म के हर प्रभाग के लिए सम्मानों या पुरस्कारों को देने की। समय के साथ ज्यादातर पुरस्कार समारोह अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं लेकिन कुछेक मौकों को छोड़ दें तो एक अवार्ड अपनी जगह पर अटल खड़ा है, ऑस्कर अवार्ड। इसका पहला आयोजन आज के ही दिन यानी 16 मई 1929 को हॉलीवुड में होटल रुज़वेल्ट में किया गया था। इस समारोह में 270 दर्शक थे तथा एंट्री फीस ५ डॉलर की थी। पुरस्कार समारोह के बाद होटल मेफेयर में एक पार्टी भी रखी गई।

 

वैसे एक बात और बता दूं। दुनिया भर में भले ही यह इस नाम से फेमस है लेकिन इसका असली नाम एकेडमी पुरस्कार ( The Academy Awards ) है। यह पुरस्कार अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस (AMPAS) द्वारा दिया जाता है जो कि फिल्म उद्योग में निर्देशकों, कलाकारों और लेखकों सहित पेशेवरों के बढ़िया काम को पहचान देने के लिए प्रदान किया जाता है। एकेडमी की स्थापना 11 जनवरी 1927 को लॉस एंजेलिस के एम्बेसडर होटल में एम जी एम स्टूडियो के प्रमुख लुइस बी मेयर, एक्टर कानरेड नागेल, डायेक्टर फ्रेड निबलो और प्रोड्यूसर फीड बीटसोन सहित 36 लोगों ने की थी। वे एक ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जिसका फायदा पूरी फिल्म इंडस्ट्री को हो। संगठन के पहले अध्यक्ष डगलस फेयरबैंक्स चुने गए।

इन अवार्ड्स के लिए फिल्मों का चुनाव एकेडमी के सदस्य करते हैं। यह संख्या 5500 से लेकर 6000 के बीच में होती है। इन सदस्यों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया जाता। ये सदस्य देश-विदेश में फिल्म जगत से जुड़े हुए लोग ही होते हैं। इन में सबसे ज्यादा संख्या अभिनेताओं की (22 प्रतिशत) होती है। पहले नोमिनेशन बैलेट्स  एकेडमी के सक्रिय सदस्यों को भेजे जाते हैं। हर वर्ग का सदस्य अपने वर्ग को नामांकित करता है। बैलेटिंग का काम पूरा होने के बाद अंतिम समय तक प्राइस वाटर हाउस कूपर  के केवल दो लोगों को अंतिम रिजल्ट पता होता है। वर्तमान समय में यह अवार्ड 25 श्रेणियों में दिया जाता है।

अब बात करते हैं, इसके जन सामान्य के बीच पुकारे जाने वाले नाम और अवार्ड में दी जाने वाली प्रतिमा की। जॉर्ज स्टैनले द्वारा बनाई गई ऑस्कर प्रतिमा एक योद्धा की है जिसे आर्ट डेको में बनाया गया है। इस प्रतिमा में एक योद्धा अपनी तलवार लिए हुए पांच तीलियों वाली फिल्म की रील पर खड़ा है। ये पांच तीलियां एकेडमी की पांच मूल शाखाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो कि इस प्रकार हैं – अभिनेता, लेखक, निर्देशक, निर्माता और टेक्नीशियन। पीतल की बनी इस प्रतिमा पर  सोने की परत चढ़ी हुई होती है। यह प्रतिमा 13.5 इंच (34 सेमी) लंबी और 8.5 पाउंड (3.85 किलो) की है।

ऑस्कर नाम रखे जाने को लेकर तमाम कहानियां सामने आती हैं। आधिकारिक तौर पर 1932 में वाल्ट डिज्नी ने इस पुरस्कार के लिए धन्यवाद देते हुए ऑस्कर नाम का प्रयोग किया था। इसके बाद इस नाम का जिक्र टाइम मैगजीन में छठे पुरस्कार समारोह के बाद 1934 में हुआ। 1939 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस (AMPAS) ने अधिकारिक रूप से पुरस्कारों के लिए ऑस्कर शब्द अपना लिया।

सबसे अंत में बात करते हैं भारतीयों को मिले ऑस्कर पुरस्कारों की। सबसे पहले यह सम्मान 1983 में गांधी फिल्म  के लिए कॉस्टयूम डिजाइनर भानु अथैया को मिला। उसके बाद 1992 में प्रख्यात निर्देशक सत्यजित रे को लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान दिया गया। 2009 में तीन भारतीयों को ऑस्कर मिले। रसूल पूकुटी को बेस्ट साउंड मिक्सिंग के लिए, ए आर रहमान और गुलज़ार को बेस्ट ओरिजिनल सोंग के लिए जबकि ए आर रहमान को ही बेस्ट ओरिजिनल स्कोर के लिए पुरस्कार मिले।

ये सभी पुरस्कार डैनी बोयल की फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर के लिए मिले थे। वैसे 1958 में महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ बेस्ट फोरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी के लिए गई थी, जो इटालियन-फ्रेंच ड्रामा फिल्म नाइट्स ऑफ़ कैबिरिया से सिर्फ एक वोट से पीछे रह गई थी। इसी प्रकार 2001 में आमिर खान की लगान फाइनल राउंड तक पहुंची थी पर नो मैन्स लैंड जैसी लाजवाब फिल्म के आगे टिक न सकी और उसे तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

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