इतिहास की हत्या कितनी बेरहमी से हुई

100साल बनने में लगे तोड़ने में लगभग 300साल लग गये विदिशा के विजय मंदिर को जो 300फ़िट ऊँचा था। मुग़ल इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है कि यह मंदिर 100 गज ऊँचा था और मीलों दूर से इसका शिखर दिखाई देता था।

तीन सौ साल के ध्वंस के बाद भी जब दीवारें नहीं टूटी तब औरंगज़ेब ने इसे तोप के गोलों से उड़ाने का आदेश दिया। मंदिर को ध्वस्त कर इस विशाल मंदिर के मलवे से ही आलमगीरी मस्जिद का निर्माण कर दिया गया। और शहर का नाम भी विदिशा से आलमगीरपुर कर दिया गया।

नब्बे के दशक में तेज बारिश से मस्जिद का मसला धसका और मंदिर का आधार सामने आया भारतीय पुरातत्व ने खुदाई की तब इस एक हज़ार साल पुराने मंदिर से जुड़े तथ्य और अभिलेख प्राप्त हुये। उत्खनन का विरोध हुआ और काम रोक दिया गया।तब से यही स्थिति है इस मंदिर की।

विध्वंस के अवशेष एक किलोमीटर के दायरे में जगह-जगह आज भी बिखरे पड़े हैं।कभी आईये और देखिये कि इतिहास की हत्या यहाँ कितनी बेरहमी से हुई हम नहीं कहेंगे, कहेंगे इस परिसर में फैले पड़े ध्वंस के बाद के अवशेष जो अपनी कहानी खुद बयां करने में पूरी तरह सक्षम है।

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