चिरस्थायी संपदा – “चरित्र-निष्ठा”‼️

“चरित्र” ही जीवन की आधारशिला है । “भौतिक” एवं “आध्यात्मिक” सफलताओं का मूल भी यही है । “विश्वास भी लोग उन्हीं का करते हैं, जिनके पास “चरित्र” रूपी सम्पदा है ।”

वस्तुतः “चरित्र” मनुष्य की मौलिक विशेषता एवं उसका निजी उत्पादन है । व्यक्ति इसे अपने बलबूते विनिर्मित करता है । इसमें उसके “निजी दृष्टिकोण,” “निश्चय,” “संकल्प” एवं “साहस” का पुट अधिक होता है । इसमें बाह्य परिस्थितियों का यत्किंचित ही योगदान रहता है। “बाह्य परिस्थितियाँ तो सामान्य स्तर के लोगों पर ही हावी होती है ।”

जिनमें मौलिक विशेषता है, वे नदी के प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में मछली की तरह अपनी भुजाओं के बल पर चीरते छरछराते चल सकते हैं । “निजी पुरुषार्थ” एवं “अंत:शक्ति” को उभारते हुए “साहसी व्यक्ति” अपने को प्रभावशाली बनाते व “व्यक्तित्व” के बल पर जन सम्मान जीतते देखे गए हैं । यह उनके “चिंतन की उत्कृष्टता”, “चरित्र की श्रेष्ठता” एवं “अंतराल की विशालता” के रूप में “विकसित व्यक्तित्व” की ही परिणति है ।

“चरित्र विकास” ही जीवन का “परम उद्धेश्य” होना चाहिए । इसी के आधार पर जीवन लक्ष्य प्राप्त होता है । इस सम्पदा के हस्तगत होने पर ही जीवन का वास्तविक आनंद प्राप्त किया जा सकता है । “यही सम्पत्ति वास्तविक सुदृढ़ और चिरस्थायी होती है । अतः हर स्थिति में इस संजीवनी की रक्षा की जानी चाहिए ।”

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