मानव नहीं प्रकृति केंद्रित हो विकास

आज पूरा विश्व प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से होने वाले पर्यावरण परिवर्तन से परेशान है। इसलिए आवश्यकता है कि वनों के संरक्षण में तेजी लाई जाए तथा ऊर्जा के हानिरहित विकल्पों के शोध को प्राथमिकता दी जाए।

मानव के भौतिक विकास ने पर्यावरण को सर्वाधिक प्रभावित किया है। भारतीय परम्परा में जीवों की चार कोटियां हैं- जरायुज, अण्डज, उद्भज और स्वेदज। भारतीय जीवनपद्धति में विकास के क्रम में जीवों की ये चारों कोटियां केंद्र में रही हैं। परन्तु दुर्भाग्यवश तथाकथित आधुनिकता और भौतिक सुखों के प्रति बढ़ती लिप्सा के कारण मानव ने पर्यावरण को ताक पर रख दिया है। आधुनिक भौतिक विकास और वैश्वीकरण से आज समग्र विश्व प्रभावित है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यही कारण है कि जिनके पूर्वज पृथ्वी पर कुछ भी क्रियाकलाप सम्पन्न करने से पहले प्रार्थना करते थे कि हे पृथ्वी हम जो भी खनन इत्यादि कार्य तेरे अन्दर करें उसकी तू शीघ्र ही भरपाई कर ले- यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु, आज उन्हीं को पृथ्वी ही नहीं अपितु पञ्च तत्त्व को भी प्रदूषित करने में किञ्चित संकोच नहीं है। उत्तरोत्तर विकास एक सहज प्रवृत्ति है परंतु विकास एकरेखीय नहीं होना चाहिए और न ही विकास के क्रम में मानव के अतिरिक्त प्रकृति के अन्य तत्त्वों की अनदेखी ही होनी चाहिए। इस अनदेखी के परिणाम बहुत भयंकर होते हैं और आज समग्र मानवता उन दुष्परिणामों का सामना कर रही है।

आज यदि सूक्ष्मता से देखें तो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश सब प्रदूषित हैं। प्रदूषणजनित अनेक समस्यायों का सम्पूर्ण विश्व प्रत्यक्ष सामना कर रहा है परन्तु अनेक संकट ऐसे भी हैं जो प्रत्यक्ष नहीं हैं अपितु परोक्ष हैं। उनके परिणाम और अधिक घातक हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण, वनोन्मूलन, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से व्यापक पर्यावरण प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन हो रहा है। पृथ्वी से हरीतिमा निरन्तर सिकुड़ रही है और ताप लगातार बढ़ रहा है। आर्कटिक और अंटार्कटिका में हिम पिघल रहा है। वैश्विक तापन से आज  विश्व का प्रत्येक क्षेत्र प्रभावित है। यदि दो डिग्री भी तापमान बढ़ गया तो प्रलय की आशंका है और अनेक क्षेत्रों के जलमग्न होने की सम्भावना है। जलवायु पर यदि दृष्टिपात करें तो वर्षा और वर्षण की आवृत्ति, मात्रा और मार्ग में भी परिवर्तन आया है। बाढ़, भूस्खलन, भू अपरदन में वृद्धि हुई है। फसल चक्र व फसलोत्पादन में परिवर्तन व जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। जो परिवर्तन शताब्दियों में होना चाहिए वो दशकों में हो रहा है। परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि उसे रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर किए जा रहे अनेक प्रयत्न ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहे हैं।

आज पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से पूरा विश्व चिन्तित है और प्रभावित भी है। इस परिवर्तन का सर्वाधिक दुष्प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिये समय-समय पर वैश्विक स्तर पर अनेक सम्मेलनों का आयोजन दशकों से होता रहा है परन्तु परिणाम ‘ढाक के तीन पात’ ही रहता है। एक ओर अमेरिका और चीन जैसे विकसित देश हैं जिनकी कथनी-करनी में बहुत अन्तर है और जो अपना कार्बन उत्सर्जन कम नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके विकास की गति धीमी होने की सम्भावना है। ये देश अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं में तनिक भी कटौती करने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर विकासशील देश हैं जिनका कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है परन्तु उनसे यह आशा की जाती है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कटौती करें। यही वह पेंच है जहां जाकर पर्यावरण-संरक्षण व जलवायु-परिवर्तन का समग्र विमर्श आकर रुक जाता है। यह ऐसा द्वन्द्व है जिसका समाधान अति आवश्यक है। इस संदर्भ में भारत सदैव समाधान एवं स्थायी व सुरक्षित विकल्प हेतु पहल करता रहा है। पिछले वर्ष ग्लासगो में सम्पन्न कॉप 26 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलवायु संकट के प्रति भारत की सजगता और कटिबद्धता दर्शाते हुए इस बात पर बल दिया कि जलवायु परिवर्तन के संकट से विकासशील देश सर्वाधिक प्रभावित हैं। यह एक बड़ी चुनौती है जिसका सामना कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता अपितु सभी को मिलकर इस का सामना करना चाहिए। इस सम्मेलन में कुछ लक्ष्य निर्धारित किये गये जिसमें शताब्दी के मध्य तक नेट-जीरो को सुनिश्चित करना और तापमान 1.5 डिग्री रखना, 2050 तक नेट-जीरो के उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करना, 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य को प्राप्त करना, कोयले के फेज-आउट में तेजी लाना, वनों की कटाई रोकना, डीजल वाहनों के स्थान पर इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग, अक्षय ऊर्जा में निवेश को बढ़ावा देना आदि सम्मिलित हैं। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 2070 तक ‘नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन’ का वादा किया है। इस सम्मेलन में कोयले के उपयोग में कटौती, मीथेन उत्सर्जन रोकने तथा वनों की कटाई पर रोक लगाने पर विशेष बल दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हाल की जर्मनी यात्रा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस यात्रा में दोनों देशों ने सतत् विकास पर केंद्रित समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसमें दोनों पक्षों के मध्य सामाजिक विनिमय, जलवायु, पर्यावरण, सतत् विकास और ऊर्जा आदि विभिन्न क्षेत्रों पर वार्ता हुई। इसमें जर्मनी ने 2030 के लिए निर्धारित जलवायु के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारत को अतिरिक्त 10 अरब यूरो की सहायता देने का वचन दिया है। जिसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति और 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन विद्युत क्षमता स्थापित करना सम्मिलित है। यह सहायता हरित और सतत विकास को बढ़ावा देने तथा इसके लक्ष्यों को सुनिश्चित करने के लिए है। इस यात्रा में भारत और जर्मनी द्वारा जलवायु संरक्षण और जैव विविधता के संरक्षण आदि क्षेत्रों में अपनी साझेदारी को सशक्त बनाने के लिए संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर निश्चय ही जलवायु के संकट का सामना करने में भारत के लिए बहुत ही उपयोगी होगा।  यह भारत सरकार की जलवायु परिवर्तन के प्रति सजगता और दूरदृष्टि ही है कि उसके समग्र क्रियाकलापों और वार्ताओं में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के संकट के समाधान के प्रति उसकी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

भारत पर्यावरण और जलवायु के प्रति अपनी दृष्टि व योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर प्रतिबद्ध है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए भारत सरकार विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन पर बल दे रही है। यह भारत सरकार की पर्यावरण व जलवायु के प्रति एक सजग दृष्टि ही है कि देश में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए उज्जवला योजना, पुणे में इथेनॉल उत्पादन हेतु ई-100 पायलट परियोजना, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना, रेलवे-तंत्र का विद्युतीकरण, हवाईअड्डों पर सौरऊर्जा का प्रयोग, जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना आदि अनेक योजनाएं क्रियान्वित होकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही हैं।

इन अनगिनत चुनौतियों के समाधान का मार्ग यही है कि वनों की कटाई को रोका जाए, वृक्षारोपण व वृक्षों के संरक्षण को प्रोत्साहित किया जाए। कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने पर बल दिया जाए और इसके लिये आवश्यक शोध व अनुसंधान में निवेश किया जाए। ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों, कोयले, पेट्रोलियम तथा लकड़ी आदि पर निर्भरता को कम न्यूनतम किया जाए। विकास की गति को धीमा करना कठिन है परन्तु इस गति का नियमन व पर्यावरण-अनुकूलन तो किया ही जा सकता है। इसके लिए भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों को ईमानदार प्रयत्न करने की आवश्यकता है।

जलवायु संकट एक ऐसा संकट है जिसका समाधान कोई एक देश नहीं प्रस्तुत कर सकता अपितु सभी को एक साथ समाधान के लिए आगे आकर कदम बढ़ाना होगा। मानवकेन्द्रित विकास का रुख प्रकृतिकेन्द्रित विकास की ओर मोड़ना होगा। मानव को इस दम्भ से बाहर आना होगा कि वही सर्वशक्तिमान है। उसे प्रकृति की शक्ति को समझकर उसके प्रति विनम्र भाव प्रदर्शित करते हए प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर लगाम लगानी होगी। मानवता और मानवाधिकार का ढोंग रचने वाले देशों को अपने छद्म आवरण से बाहर आकर प्रकृति, पर्यावरण, व वैश्विक मानवता के प्रति अपने उत्तरदायित्त्व को समझना होगा और उसका निर्वहन करना होगा। जब तक जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिये ईमानदार प्रयत्न नहीं होते तब तक सारी वार्ताएं, सारे समझौते बस शब्दजाल ही साबित होंगे जिनका परिणाम शून्य होगा। अतः सद्परिणाम और पर्यावरण का स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए जलवायु परिवर्तन की गति धीमी करने के लिए सबको एक साथा आकर काम करना होगा । अन्यथा वह दिन दूर नहीं है कि कोई एक क्षेत्र, एक देश ही नहीं अपितु समग्र विश्व हाहाकार करेगा। आज इन सभी चुनौतियों से निपटने और एक उत्तम स्वस्थ पर्यावरण व समाज की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक है कि भारत सहित विश्व के समस्त देश ईशोपनिषद् के मन्त्र ’ तेन त्यक्त्येन भुञ्जीथाः। मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’ के मर्म को समझें तथा भोगलिप्सा से बाहर आकर यत्किञ्चित त्याग का आचरण करें। इस धर्मदृष्टि का वैश्विक स्तर पर भारत ही प्रवर्तक हो सकता है और भारत सरकार अपने विभिन्न क्रियाकलाओं व योजनाओं  के माध्यम से इस लक्ष्य की ओर अग्रसर है।

     – ममता त्रिपाठी

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