मानव नहीं प्रकृति केंद्रित हो विकास

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आज पूरा विश्व प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से होने वाले पर्यावरण परिवर्तन से परेशान है। इसलिए आवश्यकता है कि वनों के संरक्षण में तेजी लाई जाए तथा ऊर्जा के हानिरहित विकल्पों के शोध को प्राथमिकता दी जाए।

पर्यावरण संरक्षण से बचेगा मानव जीवन

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मानव जाति के संरक्षण के लिए पर्यावरण की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। दिन-प्रतिदिन दूषित होते पर्यावरण की रक्षा एवं इसके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में इसकी घोषणा की गई…

क्या भोजन का पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है ?

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पर्यावरण जैविक (जीवित जीवों और सूक्ष्मजीवों) और अजैविक (निर्जीव वस्तुओं) का संश्लेषण है। प्रदूषण को पर्यावरण में हानिकारक पदार्थों की मौजुदगी के रूप में परिभाषित किया गया है जो मनुष्यों और अन्य जीवित जीवों के लिए हानिकारक हैं।  प्रदूषक खतरनाक ठोस, तरल पदार्थ या गैस हैं जो सामान्य से अधिक…

मधुमक्खी से संचालित होता है प्रकृति का चक्र

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आज पांचवा विश्व मधुमक्खी दिवस है। पर्यावरण प्रणाली में मधुमक्खियों के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर वर्ष 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इसे मनाने का प्रस्ताव स्लोवेनिया के बीकीपर्स एसोसिएशन के नेतृत्व में 20 मई 2017 को संयुक्त राष्ट्र के सम्मुख रखा गया था, जबकि…

भारतवर्ष के पर्यावरण को कैसे बचायें ?

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WINTER HAVEN, FL (July 7, 2011) -- Look how far we’ve come! With just 100 days until Grand Opening on October 15, LEGOLAND® Florida has released a new batch of photographs as rides begin to appear at the park. From The Royal Joust to LEGO® Technic Test Track Coaster, construction crews are hard at work transforming the property into the interactive theme park geared toward families with children ages 2-12. (PHOTO/LEGOLAND Florida, Merlin Entertainments Group, Chip Litherland)
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भारत के पर्यावरण को बचने के लिए कौन से पेड़ लगाएं कि ज्यादा लाभ हो और मेहनत सही दिशा में हो ? स्कंदपुराण में एक सुंदर श्लोक है : अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम् न्यग्रोधमेकम्  दश चिञ्चिणीकान्। कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।। अश्वत्थः यानि पीपल (100% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है) पिचुमन्दः यानि नीम (80%…

जीवन के लिए जरूरी है पृथ्वी को संवारना

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आज समूची दुनिया विश्व पृथ्वी दिवस मना रही है और यह कहीं न कहीं उस दिवस की वर्षगांठ है। जिसे सुरक्षित रखने की आज के समय में महती जरूरत है। गौरतलब हो कि पृथ्वी दिवस मनाने की शुरुआत 22 अप्रैल 1970 में हुई थी और इस वर्ष पृथ्वी दिवस का…

प्रकृति बेचारी, विकास की मारी, हर चुनाव हारी!

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सच में प्रकृति की अनदेखी वो बड़ी भूल है जो पूरी मानवता के लिए जीवन, मरण का सवाल है। बस वैज्ञानिकों तक ज्वलंत विषय की सीमा सीमित कर कर्तव्यों की इतिश्री मान हमने वो बड़ी भूल या ढिठाई की है जिसका खामियाजा हमारी भावी पीढ़ी भुगतेगी। इसे हम जानते हैं,…

जलवायु परिवर्तन परिषद परिणाम नेट जीरो ?

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  इस परिषद में पर्यावरणविदों को एक नया शब्द मिला है, नेट जीरो। इसकी संकल्प पूर्ति के लिए आधी सदी शेष है। यूरोप का ‘नेट जीरो’ लक्ष्य 2050 है तो चीन का 2060 अपेक्षित है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सन 2070 तक ‘नेट जीरो’ के रूप में कार्बन मुक्त करने का उद्देश्य सामने रखा है। नेटजीरो की संकल्पना क्या वास्तविकता में परिवर्तित हो सकती है? या यह मात्र स्वप्न देखने जैसा ही रहेगा? इस पर भी चर्चा हो रही है। 

छठ : वनस्पति विज्ञान का भी पर्व

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कार्तिक मास पूरा ही प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए है। अन्नकूट के मूल में जो धारणा रही, वह इस ऋतु में उत्पादित धान्य और शाक के सेवन आरंभ करने की भी है। अन्न बलि दिए बिना खाया नहीं जाता, इसी में भूतबलि…

महिलाएं क्यों रखती हैं हरितालिका तीज का निर्जला व्रत?

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उत्तर भारत में 'तीज' के नाम से महिलाओं का बहुत ही प्रचलित व्रत होता है हालांकि यह काफी कठिन होता है क्योंकि इस दिन महिलाओं को बिना अन्न व जल के पूरा दिन और रात रहना होता है। सूर्योदय के बाद से अगले सूर्योदय तक व्रत करने वाली महिला अन्न-जल…

भारतीय पारंपरिक खानपान का खजाना

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हमारी भारतीय परंपरा विश्व भर मे इसकी सभ्यता, तथा खानपान के लिए जानी जाती है। जिस तरह भारत मे अपने आप मे बहुत विविधताएँ है, जेसे रहन सहन, पहनावा, वातावरण, उसी तरह उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम के खान पान मे भी विविधताएँ देखने को मिलती है। जो वहाँ के वातावरण,मौसम,…

मारीशस के तुलसी अरुण-मृदुल सेवक सुखदाता

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अरुणजी का अवसान मारीशस में एक युग की समाप्ति है, किन्तु भारत भी अससे अछूता नहीं रहा है। अरुणजी ने जिस प्रकार से बीसवी शताब्दी के उत्तरार्ध तथा इक्कीसवी सदी के प्रारंभ में समय की आवश्यकता के अनुरूप समाज को श्रीराम चरित से जोड़ने का सद्प्रयास किया, वह अभिनंदनीय तो है ही, किन्तु अनुकरणीय भी है।

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