आदिपुरुष : राम-रावण के चेहरे 

‘आदिपुरुष’ में राम के रूप में लोग प्रभास को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो गैट अप के अलावा पूर्वधारणाएं भी हैं।
इस देश ने राम, कृष्ण और शिव को सदैव युवा चेतना और सर्वश्रेष्ठ सौंदर्य के प्रतीक के रूप में देखा है। चूँकि इनके चित्र, मूर्तियां आदि पुरुष कलाकारों ने बनाये हैं जिनके चित्त में सौंदर्य का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक स्त्री ही है अतः अवचेतन में छाया स्त्रीरूप इन महानायकों की मूर्ति व चित्रों में उतर आया है।
आप कोई भी प्राचीन मूर्ति या वर्तमान चित्र उठा लीजिये आपको इनके चेहरे स्त्रियों की भांति कोमल ही मिलेंगे।
उनके ऐसे चेहरे हमारे सौंदर्यबोध का दर्पण है।
जब जब समाज में कामुकता बढ़ती है, स्त्री में पौरुष व पुरुषों में स्त्रैणता बढ़ती है तब मामला उलटने लगता है और इसीलिए  मध्ययुग के घोर विलासी व कामुक युग की कई पेंटिंग्स में आपको ये महानायक दाढी मूंछों में दिखाई देंगे।
वर्तमान के रील्स व फेमनिज्म के कामुक युग में भी यही गति है इसीलिए पुनः इन महानायकों में  दाढ़ीमूँछ की स्वीकार्यता बढ़ी है। लेकिन इसके बावजूद यदि प्रभास को लोग राम के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे तो इसके पीछे दो कारण हैं-
1- या तो उन्हें क्लीन शेव दिखाया जाता या दाढ़ी मूँछ में जो वनवासी जीवन के अनुरूप होता परंतु उन्हें  केवल मूंछों में दिखाना व लक्ष्मण को मूंछों के साथ दाढ़ी में दिखाना अटपटा, अतार्किक व अस्वीकार्य लगता है।
2- उनके चेहरे पर राम की मोहक स्निग्ध स्मित के स्थान पर एक खुरदुरी कठोरता है जो राम की ऐतिहासिक छवि के विपरीत है। यही कारण है कि RRR में रामचरण तेजा को दर्शकों ने राम का चरित्र न होने के बाद और दाढ़ी मूँछ होने पर भी राम के रूप में देखा और सराहा।
जाहिर है राजमौली जी की न केवल आर्ष साहित्य पर गहरी पकड़ है बल्कि लोकमानस को पढ़ने की अपूर्व क्षमता भी।
रामानंद सागर की रामायण बिना किसी उच्च तकनीक और उर्दू के शब्दों के प्रयोग के बावजूद जनमानस के ह्रदय में पैठ गई तो इसके मूल में अरुण गोविल जी व सुनील लहरी जी की कड़ी मेहनत भी थी कि किस तरह अरुण गोविल महीनों तक राम की स्मित का अभ्यास शीशे के सामने करते रहे और सात्विक जीवन जीते रहे।
तकनीक चाहे जितनी प्रयोग कर लें लेकिन ऐतिहासिक चरित्रों की मूल छवि से छेड़छाड़ लोकमन स्वीकार नहीं करता। उदाहरण के लिए यदि छत्रपति शिवाजी के प्रसिद्ध झालर वाले ‘राजटोप’ स्थान पर ‘किमॉश’ पहनाकर एक चित्र भी बना दे तो महाराष्ट्र की जनता पगला उठेगी।
रावण के बारे में भी उसकी छवि का ही मामला है जिसके आसपास भी सैफ अलीखां नहीं हैं तिसपर उनका हिंदू विद्वेषी होना।
भारत के फ़िल्म निर्माताओं के पास स्क्रिप्ट राइटिंग, कास्टिंग, ड्रेस डिजाइनर्स और जनता की इच्छा व मानस को पढ़ सकने वाले फ़िल्म निर्देशकों का अभाव है।
बॉलीवुड का बिना बायकॉट के भी डूब जाना तय है।
दक्षिण सिनेमा  को भी सावधान रहना होगा।

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