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रिज़वान अडातिया फाउंडेशन की स्थापना दानशूर, प्रेरणास्पद वक्ता एवं सीओजीईएफ ग्रुप अफ्रीका के चेयरमैन श्री रिज़वान अदातिया ने की है, जो मूलतः भारत के पोरबंदर (जहां महात्मा गांधी का जन्म हुआ) के हैं। श्री रिज़वान को लगता है कि सौभाग्य से उन्हें भारी सफलता मिली है और अतः वे अपने स्रोतों, अनुभवों एवं ज्ञान को जरूरतमंदों के बीच बांटना चाहते हैं। उनका कम्पनी-समूह पिछले सात वर्षों से मोजाम्बिक, कांगो एवं भारत में विकास कार्यक्रम चला रहा है और अगले ५ वर्षों में और १२ देशों में इसके विस्तार की योजना है।
वीं सदी में प्रोद्यौगिकी विकास एवं आर्थिक प्रगति मानवी दुखों को कम करने के दो मुख्य साधन हैं। मानवी समाज ने इन दो मामलों में काफी प्रगति की है; लेकिन फिर भी अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। कुछ समाजों ने अन्यों के मुकाबले अधिक तेजी से विकास किया है। प्रगतिशील देशों की ५०% से अधिक जनसंख्या आज भी भारी कठिनाइयों से गुजर रही है (एचडीआई-२०१४)। गरीबी और मजदूरी के मामले में महिलाएं आज भी बदतर हालात में हैं। वे परिवार और बच्चों की मूलभूत आवश्यकताओं की परिपूर्ति के लिए खटती रहती हैं। आज महिलाएं और बच्चे गरीबी एवं परेशानी का चेहरा बन गए हैं। यूनेस्को के सांख्यिकी संस्थान ने २०१५ में जानकारी दी कि ‘कठिनाइयों में जी रहे बच्चे आज भी स्कूल नहीं जाते। वे गरीब हैं, ग्रामीण इलाके के हैं और इनमें अक्सर लड़कियों की संख्या अधिक होती है।’
अफ्रीका एवं एशिया के लगभग ६० देश मानवी विकास सूचकांक में सब से पीछे हैं। उनके पास बुनियादी साधनों की कमी है, उनके बच्चों को स्कूल भेजने के लिए सहायता की जरूरत है, उनके जीवन की कठिनाइयां दूर करने की आवश्यकता है, ताकि वे शांतिपूर्ण जीवन जी सके। श्री रिज़वान सोचते हैं कि उनका संघर्ष गरीबी, कुपोषण, बीमारियों तथा शिक्षा व रोजगार तक पहुंच से है। ताजा विश्व खुशहाली सूचकांक २०१५ से इस परिदृश्य का पता चलता है और हमें सोचने के लिए मजबूर करता है।
मानवी कष्ट प्रोद्यौगिकी एवं आर्थिक विकास के बावजूद कम नहीं हुए हैं। स्वास्थ्य की समस्याओं का स्वरूप बदलता रहता है और इससे विकसित देशों के समक्ष भी चुनौती बनी हुई है। युवकों पर शिक्षा का बोझ बढ़ रहा है और रोजगार की भी दुनिया भर में समस्याएं हैं। तनाव बहुत बढ़ गया है और नवयुवक इसका सामना करने की कोशिश कर रहे हैं। अतः अच्छा स्वास्थ्य पाना, खुशहाल होना और आंतरिक आनंद प्राप्त करना एक वैश्विक चुनौती बन गई है।
मूल स्थान, धनसम्पदा एवं प्रोद्यौगिकी के बावजूद हर कोई आंतरिक शांति चाहता है। इस प्रसन्नता को लोग बहुविध साधनों के जरिए खोज रहे हैं। कुछेक को धनसंग्रह करने में आनंद आता है, अन्य मादक पदार्थों की शरण में जाते हैं, कुछ परिवार में और कुछ अपने व्यवसाय में आनंद पाते हैं। कुछ लोग प्रसन्नता की चाह में गलती कर बैठते हैं, लेकिन खुशी का समय तो बहुत अल्प होता है।
पूर्वी हिमालय में चीन और भारत के बीच बसे भूतान की जनसंख्या ७,७०,००० है। वह सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (ग्रॉस नेशनल हैपीनेस) का विकास कर रहा है और पिछले ४० वर्षों से इसे सरकारी नीतियों में लागू भी कर रहा है। प्रसन्नता की बहुविधता और उसकी सामूहिकता तथा सामुदायिकता को सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक (जीएचएन) में उल्लेखित नौ बातों से जांची जाती है। वे हैं- मानसिक स्वास्थ्य, समय उपयोग, सामुदायिक चेतना, सांस्कृतिक विविधता, पर्यावरणीय लचीलापन, जीवन स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, एवं सुशासन। भूतान के प्रयोग से पता चलता है कि हमारी नीतियों एवं कार्यक्रमों में हम जब तक महिलाओं पर बल नहीं देते तब तक उच्च सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (जीएनएच) प्राप्त करना संभव नहीं है। हम कह सकते हैं कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) ने इस महत्वपूर्ण घटक पर ध्यान नहीं दिया और इससे हमारे समाजों में व्यापक पैमाने पर विषमता दिखाई देती है।
प्राचीन सभ्यताओं, दर्शन एवं योग व ध्यान जैसे स्वदेशी ज्ञान ने आंतरिक शांति के साधन उपलब्ध किए हैं। ‘दान’ का आदर्श इन समाजों में गहराई से जुड़ा है, जिससे आंतरिक आनंद प्राप्त होता है। ऐसी सभ्यताओं ने हमें ऐसे मार्ग बताए हैं जिनसे क्लेश, नैराश्य एवं रोगों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है। इससे हम यथार्थ के अनुसार जीवन चला सकते हैं।

श्री रिज़वान अपनी सफलता का श्रेय, देने और बांटने के चिंतन, ध्यान की शक्ति एवं योग से प्राप्त लाभ को देते हैं। वे जब १९८६ में भारत में प्रति माह मात्र १७५ रु. ३ डॉलर का वेतन पाते थे, तभी उन्होंने दान देने में रुचि ली। उन्होंने अपने पहले वेतन में से १२० रु. २ डॉलर उस गरीब व्यक्ति को दे दिए जो दवाएं खरीदने की भी क्षमता नहीं रखता था। उन्हें लगता है कि वह उनके जीवन का सब से खुशी का दिन था। इस तरह का कार्य उन्होंने अपने जीवन में जारी ही रखा।
गरीब एवं सीमांत व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर उसे खुशहाल समाज का अंग बनाने के लिए ही रिज़वान अडातिया फाउंडेशन की स्थापना हुई है। श्री रिज़वान कहते हैं कि, ‘जिनके पास कुछ भी नहीं है उनमें हम आशा, साहस और चेतना की किरण जगाते हैं और जिनके पास प्रचुर मात्रा में धन हैं उन्हें हम उद्देश्य, सार्थकता एवं दान की प्रेरणा देते हैं।’
रिज़वान अडातिया फाउंडेशन लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर उनके जीवन के क्लेश दूर कर उन्हें अन्य के समान जीने का अवसर प्रदान करने के लिए काम करता है। इस तरह के काम से मोजाम्बिक में ‘बोरहोल्स कार्यक्रम’ के अंतर्गत महिलाओं के जीवन में सुधार लाया जा सका। महिलाएं मीलों चल कर दूर-दूर से पानी लाती थीं। अगस्त २०१५ में ५ नलकूप सफलता से पूरे किए गए, जिनसे १०,००० से अधिक लोगों को पेयजल मुहैया कराया जा सका। इस तरह मीलों लम्बे अंतर से पानी लाने की महिलाओं की मजबूरी दूर हो गई। उनका आंतरिक आनंद वैश्विक प्रसन्नता एवं सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता की कुंजी है।
पूर्वी अफ्रीका के कुछ देशों एवं एशिया के कुछ इलाकों में लगभग ५०% से अधिक जनसंख्या बेहद गरीबी में जीती है। उनकी रोजाना आमदनी १.२५ डॉलर से भी कम है। उनके जीवन में गुणवत्तापूर्ण सुधार लाने की तुरंत आवश्यकता है। फाउंडेशन सम्बंधित सरकारों, कार्पोरेट घरानों एवं अंतरराष्ट्रीय दानदाता संगठनों के सहयोग से इस गरीब जनता तक पहुंचने की भरसक कोशिश कर रहा है। फाउंडेशन ने अफ्रीका एवं एशिया के ३० से अधिक संगठनों के माध्यम से आगामी १० वर्षों में ‘‘१० लाख से अधिक परिवारों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण बदलाव लाने का लक्ष्य रखा है।’’
लाखों लोगों को आत्मनिर्भर बनाने, शिक्षा के स्तर में सुधार लाने, युवकों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने, समन्वित विकास के लिए महिलाओं के नेतृत्व को सहायता व समर्थन देने, जरूरतमंदों को चिकित्सा सुविधाएं, राहत एवं स्वस्थता के लिए समर्थन मुहैया करा कर आंतरिक आनंद दिलाने का फाउंडेशन का सपना है। २०११ की एफएओ रिपोर्ट के अनुसार यदि पुरुषों को उपलब्ध संस्थागत समर्थन महिलाओं को भी प्राप्त हो तो गरीबी में १४% की कमी आ सकती है।
महिला समुदाय को उत्पादकता कार्यों से जोड़ने के लिए फाउंडेशन गुजरात के जूनागढ़ एवं पोरबंदर जिलों के ग्रामीण इलाकों में महिला सशक्तिकरण योजना आरंभ कर रहा है। हाल में गोद लिए गए मलिया गांव में सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए आगामी दो वर्षों में इस कार्यक्रम के अंतर्गत २००० महिलाओं से सीधे पहुंच बनाई जाएगी।
फाउंडेशन ने हाल में भारत के गुजरात में मलिया हातिना (जनसंख्या २१,६००) गांव को सर्वकष विकास के लिए गोद लिया है। पहला कार्यक्रम यह था कि उन्हें राजस्थान की यात्रा पर ले जाया गया, ताकि वे किस तरह कमाए और भविष्य के लिए बचत करे इसे अपनी आंखों से देख सके। पड़ोसी राज्य की महिलाओं द्वारा की गई प्रगति से वे खुश हुईं और अपने भविष्य के बारे में आश्वस्त भी हुईं।
फाउंडेशन राष्ट्र निर्माण में युवकों के सामुदायिक नेतृत्व को विकसित करने और उन्हें सक्षम बनाने के प्रति वचनबद्ध है। शिक्षा और रोजगार सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत पिछड़ी एवं सीमांत महिलाओं में ऐसे महिला नेतृत्व की पहचान की जाएगी, उन्हें सक्षम बनाया जाएगा और परिणामस्वरूप वे सक्षम महिलाएं अपने कार्यक्षेत्र में बेहतर ढंग से काम कर सकेगी। इस विकास कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शामिल ‘स्वयंसेवक’ इस कार्यक्रम का अविभाज्य अंग है और वे ‘परिवर्तन का नेतृत्व’ करेंगे। इस कार्य में सहायता के लिए बड़े पैमाने पर स्वयंसेवक एवं महिला नेतृत्व का फाउंडेशन गठन करेगा। इसमें प्रसिद्ध व्यक्ति, सामाजिक नेता, राजनीतिक नेता एवं प्रसार माध्यम भी सक्रियता से हिस्सा ले रहे हैं।
समस्या विशाल है। किसी एक सरकार या संस्था इतनी विशाल जनसंख्या तक अपनी पहुंच नहीं बना सकती। कोई एक अकेला भी इतने विशाल अंतर की परिपूर्ति नहीं कर सकता। सरकारों, संस्थाओं एवं समुदायों का यह काम है कि वे मिलजुलकर प्रयास कर इन लोगों के जीवन के क्लेश दूर करें और उन्हें आंतरिक आनंद दिलाए। रिज़वान अडातिया फाउंडेशन धनसम्पन्न कम्पनियों एवं संगठनों से अपली करता है कि वे इस सपने के पूरा करने में अपना योगदान करें और उदारता से दान दें।

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