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संघ के तृतीय वर्ष समापन समारोह को लेकर कांग्रेसी और वामपंथी भले ही हो-हल्ला करते रहे पर उस मंच पर पूर्व राष्ट्रपति ने राष्ट्रवाद और भारत की गौरवशाली परंपरा को याद करते हुए ऐतिहासिक मंतव्य रखा. मोहनजी भगवत के हिंदी में दिए गए और प्रणबदा के अंगरेजी में दिए गए भाषण में प्रमुख मुद्दा ‘राष्ट्रवाद, राष्ट्रहित’ ही था. विचारधाराएं अलग-अलग होती हैं, विचार अलग-अलग होते हैं, लेकिन सबके मन में देश को बड़ा करने का भाव होता है। इसलिए संवाद की आवश्यकता होती है। प्रणवजी ने बड़ा मार्ग बना दिया है। इस मार्ग से दोनों ओर से चलना जारी रहना चाहिए। आशय एक, भाषा अलग होने से संवाद के जरिए एक-दूसरे की भाषा समझ सकते हैं। प्रणवदा की भाषा संवैधानिक है, जो जीवनमूल्य हमें मिले, उसकी एक भाषा है। उदा.प्ल्यूरिज्म, डायवर्सिटी, सेक्युलरिज्म, हैपिनेस इंडेक्स आदि शब्द प्रणवदा के भाषण में हैं। संघ के शब्द हैं- विविधता, पंथ निरपेक्षता, सबका सुख, अनेकता, आनेवाले समय में एक-दूसरे की भाषा समझकर समान आशय का संवाद करते रहना देश की दृष्टि से आवश्यक है। संघ को कांग्रेस परायी नहीं है, दुश्मन तो बिलकुल नहीं है। कांग्रेस के नेता भी संघ के लिए अस्पर्श नहीं हैं। प्रणवदा ने अत्यंत साहसी निर्णय लेकर एक कदम रखा है। कांग्रेस के लोग यह कदम बड़ा बनाएंगे या उनके पदचिह्न पोंछ डालने की उठापटक करेंगे?

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में 7 जून अपनी विशिष्ट मुहर लगानेवाला साबित हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष के संघशिक्षा वर्ग के समापन के अवसर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे। प्रति वर्ष यह वर्ग होता है, प्रति वर्ष उसका समापन होता है और प्रति वर्ष संघ के बाहर के किसी मान्यवर व्यक्ति को समापन के अवसर पर आमंत्रित किया जाता है, इसमें नया कुछ नहीं है। सरसंघचालक मोहनजी भागवत ने यही मुद्दा अपने भाषण में रखा। लेकिन, ‘तृतीय वर्ष समापन के लिए प्रणव मुखर्जी आनेवाले हैं’ यह देश की दृष्टि से सनसनीपूर्ण खबर का विषय बन गया। कुछेक ने उसे वैसा जानबूझकर बनाया और मीडिया के लोग विवाह के पहले ही बच्चे के नामकरण की तैयारी में जुट गए।

ये सारी चर्चाएं सुनते समय मुझे महात्मा गांधी के तीन बंदरों की याद आती रही। पहला बंदर आंख पर हाथ रखकर बैठा था, जो कहता था मैं सत्य नहीं देखूंगा। दूसरा कान पर हाथ धरे बैठा था, जो कहता था मैं सत्य नहीं सुनूंगा और तीसरा मुंह पर हाथ धरे बैठा था, जो कहता था मैं सत्य नहीं बोलूंगा। लगता है, संघ के विरोधी इसमें अक्ल के तारे तोड़ने की स्पर्धा में लगे थे। प्रणवदा को क्या बोलना चाहिए, यह कुछ लोगों ने सुझाया। उन्हें नहीं जाना चाहिए, यह कुछ लोगों की राय थी। एक ने तो यह खोज की कि उनके जाने से संघ की प्रतिष्ठा बढ़ती है। प्रणवदा आए और उन्हें जो बोलना था, वह बोला। फिर उस पर चर्चा आरंभ हुई। इस पर क्यों नहीं बोले, उस पर क्यों नहीं बोले, यह विषय क्यों छोड़ा, वह विषय क्यों नहीं लिया- इस पर चर्चा करनेवालों के गुरु सीताराम येचुरी ने अपनी गुरुता दिखाते हुए विलक्षण वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा, “संघ को उसके इतिहास की याद दिला दी होती तो अच्छा होता। संघ पर कांग्रेस ने तीन बार प्रतिबंध लगाया। पहली बार सरदार पटेल ने….” आदि आदि। पूर्व राष्ट्रपति को सुझाव देनेवालों की बुद्धि की जितनी तारीफ की जाए उतनी ही कम है।

  प्रणवदा के संघ के मंच पर जाने की जो चर्चा मीडिया ने शुरू की, कांग्रेस व कम्युनिस्टों ने उसको खाद-पानी डाला, इसके लिए उन्हें धन्यवाद। हम खुद को ही अपने ही पैरों के जूतों से मार रहे हैं, यह उनके ध्यान में ही नहीं आया। प्रणवदा के संघ के मंच पर जाने की चर्चा सहिष्णुता के मुद्दे पर पहुंची, और ये लोग कितने भीषण असहिष्णु हैं, यह उन्होंने अपने ही बोलने और लेखन से दिखा दिया। प्रणवदा संघ के कार्यक्रम में क्या बोले यह जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि, सभी तथाकथित सहिष्णुवादियों का नकाब टरटर फटता गया और उसे उन्होंने अपने ही हाथों से फाड़ा। इसलिए 7 जून इतिहास में अमर हुए बिना नहीं रहेगा।

सरसंघचालक मोहनजी भागवत का भाषण हिंदी में हुआ। प्रणव मुखर्जी का भाषण अंग्रेजी में हुआ। दोनों भाषणों का विषय एक ही था, भाषण का आशय भी एक ही था। इतना एक जैसा कि किसी को लगे कि शायद दोनों ने तय करके ही भाषण किया हो। दोनों के भाषणों में विलक्षण समानता है। दोनों जानते हैं कि, वे पृथक संगठनों से जुड़े हैं, संगठन के विचार और अनुशासन दोनों ओर अलग-अलग है। मोहनजी भागवत ने आरंभ में ही कह दिया, “संघ संघ है, प्रणव मुखर्जी प्रणव मुखर्जी हैं।”

मोहनजी ने अपना विषय संघ की शैली में और संघ की परिभाषा में प्रस्तुत किया। वहां उपस्थित संघ स्वयंसेवक और उनका भाषण अपने-अपने घरों में टीवी पर सुननेवाले संघप्रेमियों को यह भाषा तुरंत समझ में आती है। मोहनजी ने कहा, “पूरे देश पर प्रभुत्व चलाने के लिए अपना काम नहीं है, संघ के विशिष्ट वर्ग का संगठन करना अपना काम नहीं है। संघ का काम सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है। हमारे लिए कोई भी भारतवासी पराया नहीं है, भारतभूमि में पैदा हुआ प्रत्येक व्यक्ति भारतपुत्र है। विविधता में एकता की हमारे देश की हजारों वर्षों से परम्परा है। भाषा, सम्प्रदाय की विविधता पहले से ही है। अपनी विविधता की रक्षा और दूसरे की विविधता का स्वागत करते हुए, उनका सम्मान करते हुए मिलजुलकर रहना और विविधता में एकता का साक्षात्कार कर लेना यह हमारी संस्कृति है।”

प्रणव मुखर्जी की भाषा संघ की भाषा नहीं है, परंतु आश्चर्यजनक ढंग से उन्होंने अपने भाषण में संघ ही प्रस्तुत किया। विपरीत अर्थ खोजने की जिन्हें आदत है और जिनकी रोजीरोटी का वह धंधा है, वह उन्हें करने दें। प्रणवदा ने राष्ट्र, राष्ट्रवाद, देशभक्ति जैसे शब्दों के अर्थों से अपने भाषण की शुरुआत की। उन्होंने कहा, “एक भूप्रदेश में समान संस्कृति, भाषा और इतिहास के आधार पर रहनेवाले समूह को राष्ट्र कहते हैं।” उन्होंने आगे राष्ट्रवाद को स्पष्ट करते हुए कहा, “राष्ट्रवाद का अर्थ है अपने राष्ट्र से एकरूप होकर उसके हितों की रक्षा करते हुए अन्य राष्ट्रों के हितों को अपने से पृथक करना।” और, देशभक्ति माने है, “अपने देश के प्रति भक्तिभाव और देश का पूर्ण समर्थन है।”

  राष्ट्र, राष्ट्रीयता, देशभक्ति संघ के बुनियादी विषय हैं। प्रणवदा ने अपने भाषण के आरंभ से ही इन बुनियादी विषयों को स्पर्श किया और बाद में ई.स. पूर्व काल से अंग्रेजों के शासन तक देश के इतिहास को संक्षेप में पेश किया। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशीला, वल्लभी आदि विद्यापीठों का जिक्र कर उन्होंने अठाराह सौ वर्ष हम शिक्षा के क्षेत्र में किस तरह अग्रणी थे इसे विशद किया। उन्होंने उल्लेख किया कि चाणक्य का अर्थशास्त्र बेहतर ग्रंथ है। यूरोप में राष्ट्र निर्माण होने के पूर्व भारतीय राज्य पूर्ण विकसित हुआ था, इसका सुंदर पुनरावलोकन उन्होंने किया। ये सारे विषय संघ स्वयंसेवक संघ में अनेक बार सुनते होते हैं।

हमारे राष्ट्रवाद की विशेषता क्या है?, यह तो प्रणवदा ने बिलकुल संघ की भाषा में पेश किया। उन्होंने कहा, “हमारा राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ यह हमारी इच्छा होती है। सारे विश्व को हम एक परिवार मानते हैं और सबके सुख और बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करते हैं। सर्वसमावेशकता और सहअस्तित्व हमारी राष्ट्रीय पहचान है। विभिन्न प्रकार की संस्कृति, भाषा, श्रद्धा से भारत की अलग पहचान बनी है। सहिष्णुता से हमें शक्ति मिलती है। बहुविविधता का हम स्वीकार और सम्मान करते हैं। हमारी सामूहिक मानसिकता का अनेक वर्षों से यह एक अंग है। किसी भी तरह से हमारा राष्ट्रवाद, धार्मिक, क्षेत्रीय अथवा बंदिस्त विचारों के आधार पर तथा विद्वेष व असहिष्णुता के आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ तो हमारी राष्ट्रीय आत्मीयता मलीन होगी। जो कुछ पृथकता दिखाई देती है वह सतही है, हम अलग पहचान रखनेवाले सांस्कृतिक घटक हैं, जिनका इतिहास समान है। साहित्य समान है और सभ्यता भी समान है। महान इतिहासकार विन्सेंट कहता है, ‘भारत में गहराई से सांस्कृतिक एकता है।”

मोहनजी ने कहा, विविधता में एकता है… प्रणवदा कहते हैं देश में गहन सांस्कृतिक एकता है। पृथकता सतही है। अंदर से हम सब एक हैं। आशय एक है, कहने की भाषा अलग है।

भारतीय राज्य में मौर्य काल से अंग्रेजों के काल तक किस तरह उतार-चढ़ाव होते गए, इसे बताते हुए प्रणवदा कहते हैं कि, यद्यपि हम छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित रहे, फिर भी पांच हजार वर्ष की हमारी संस्कृति अभिन्न रही है। इस देश में आए विदेशी तत्त्वों को हमने अपने में समाविष्ट कर लिया। वर्तमान भारत विविध जनसमूहों से किस तरह बना है, इसे उन्होंने रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता की एक पंक्ति बोलकर स्पष्ट किया। भारत का राष्ट्रवाद महात्मा गांधी, पं.नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल के कारण किस तरह मजबूत हुआ, यह उन्होंने सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। 1950 में राज्य संविधान पर अमल शुरू हुआ। यह हमारा राज्य संविधान “कानून की केवल धाराएं न होकर वह भारत के सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन की सनद (magna carta) है। हमारे राज्य संविधान से राष्ट्रवाद का उदय होता है। भारतीय राष्ट्रवाद संवैधानिक देशभक्ति है। जिसमें हमारी विविधता की रक्षा, स्वयं को सुधारने की क्षमता और दूसरे से सीखने की तैयारी जैसे विषय आते हैं।”

प्रणवदा द्वारा प्रयुक्त शब्द Constitutional Patriotism है। मुझे लगता है कि संघ के मंच पर अन्य किसी द्वारा व्यक्त न किया गया यह शब्द है और वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस पर विभिन्न पहलुओं से विचार करना होगा और उस भाषा में राष्ट्रवाद को पेश करना होगा; क्योंकि भारतीय राज्य, संविधान के अनुसार चलता है। अतः संविधान की धाराएं समझने की अपेक्षा संविधान की आत्मा समझ लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रणवदा ने अत्यंत चुनिंदा शब्दों में संविधान का आत्मतत्व पेश करने का साहस किया है। इस विषय को विस्तार देते हुए वे आगे कहते हैं, “भारत की आत्मा बहुविविधता और सहिष्णुता में बसती है। यह बहुविविधता सैकड़ों वर्षों के संमिश्रण से निर्माण हुई है। पंथ निरपेक्षता और सर्वसमावेशकता हमारी दृष्टि से श्रद्धा का विषय है। संमिश्र संस्कृति हमें एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करती है। 122 भाषाएं, 1600 बोली-भाषाएं, 60 प्रकार के उपासना पंथ और तीन तरह के वांशिक समूह से 120 करोड़ आबादी का यह देश बना है। हम सभी एक व्यवस्था में, एक ध्वज के तले, और भारतीय की पहचान कायम रखकर रहते हैं।”

अनेकता भारत की पहचान है और अनेकता में एकता भारत की जान है। उसकी रक्षा होनी चाहिए। मोहनजी भागवत ने अपने भाषण में इस विषय पर सर्वाधिक बल दिया है। इस तरह के विविधतापूर्ण भारतीय लोगों में समान आकांक्षा निर्माण करना, राष्ट्रीय गुणों की निर्मिति करना, संगठितता निर्माण करना, देश को परमवैभवसम्पन्न करने की अभिलाषा निर्माण करना संघ का काम है। मोहनजी ने अपने भाषण में संघशैली में यह स्पष्ट किया।

प्रणव मुखर्जी इसी आशय को अपनी पद्धति से आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “आज हमारे आसपास हिंसा, अंधःकार, भय, अविश्वास हमें अनुभव होता है। हमें इससे मुक्त होना आना चाहिए। केवल अहिंसक समाज ही समाज की लोकतांत्रिक रचना में सभी घटकों का सहभाग सुनिश्चित कर सकता है। जो पीछे रह गए हैं अथवा दूर रखे गए हैं, उनकी दृष्टि से यह बहुत आवश्यक है। दीर्घकाल तक हम दुख और कष्ट सहते रहे हैं। आप युवा हैं, अनुशासनबद्ध हैं, बेहतर ढंग से प्रशिक्षित हैं, और उच्च विद्या से विभूषित हैं। शांति, सहयोग और सुख के लिए हमें सबको जुट जाना चाहिए। हमारी मातृभूमि की यह अपेक्षा है। हमारी मातृभूमि को उसकी आवश्यकता भी है।”

प्रणव मुखर्जी ने स्वयंसेवकों को लक्ष्य कर मातृभूमि का आवाहन किया। पूरे वैचारिक भाषण को उन्होंने एक भावनात्मक स्पर्श दिया है। भारत माता संघ स्वयंसेवकों का परम श्रद्धा का विषय है। संघ शाखा में रोज प्रार्थना बोली जाती है। इस प्रार्थना में संघ स्वयंसेवक भारत माता को परमवैभव की ओर ले जाने के लिए  ‘शील, शक्ति, ज्ञान, वीरव्रत, ध्येयनिष्ठा’ जैसे गुणों की ईश्वर से याचना करते हैं। मोहनजी ने अपने भाषण में इसका विस्तार किया है। यह सब किसलिए? अपने चहुंओर जो अंधःकार है, उसे दूर करने के लिए, देश को समृद्ध और बलवान बनाने के लिए।

प्रणवदा ने अपने भाषण का समापन करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में सुख और आनंद की प्राप्ति सबसे बड़ा काम होता है। हमने आर्थिक विकास भले अच्छा किया हो फिर भी हम हैपिनेस इंडेक्स (आनंद का सूचकांक) में विश्व में 133वें स्थान पर हैं। संसद के सदन में कौटिल्य का एक श्लोक लिखा गया है, जो कहता है राजा को प्रजा के सुख में ही अपना सुख देखना चाहिए। केवल अपने ही सुख का वह विचार न करें। प्रणवदा ने वह पढ़कर सुनाया और कहा कि सरकार के सभी कार्यों का केंद्रबिंदु जनता ही होना चाहिए। राज्य में शांति, सौहार्द और सुख सब ओर से निर्माण होना चाहिए यह अपेक्षा भी उन्होंने व्यक्त की।

संघ राष्ट्रवादी संगठन है। संघ की राष्ट्र की संकल्पना सर्वसमावेशक और विश्व मानव के कल्याण की है। यह संकल्पना संघ की खोजी हुई संकल्पना नहीं है, भारतीय राष्ट्र की वह प्राचीन अवधारणा है। उसे प्रत्यक्ष में लाने के लिए संघ का काम चलता है। इसके लिए पूरे समाज का सहयोग जरूरी है। अकेले संघ का यह काम नहीं है, पूरे समाज का यह काम है। समाज की सज्जन शक्ति को संघ को समझकर इस काम में सहभागी होना चाहिए। मोहनजी ने अपने भाषण का समापन करते हुए यह बात कही। प्रणवदा ने अपने भाषण के समापन में सुख के पैमाने की सबको याद दिलाई और उसके लिए परस्पर को समझकर, संवाद स्थापित करने की आवश्यकता प्रतिपादित की।

प्रणव मुखर्जी का राजनीतिक जीवन कांग्रेस में शुरू हुआ। देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद- राष्ट्रपति पद- उन्होंने सम्हाला। राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल अविवादित रहा। राष्ट्रपति भवन में उन्होंने राजनीति नहीं की। सच्चे अर्थों में वे 130 करोड़ जनता के राष्ट्रपति बने। ऐसे व्यक्ति को दलीय विचार नहीं करना चाहिए, राष्ट्रीय विचार करना चाहिए। नागपुर के कार्यक्रम में वही उन्होंने व्यक्त किया। मोहनजी ने कहा है, विचारधाराएं अलग-अलग होती हैं, विचार अलग-अलग होते हैं, लेकिन सबके मन में देश को बड़ा करने का भाव होता है। इसलिए संवाद की आवश्यकता होती है। प्रणवजी ने बड़ा मार्ग बना दिया है। इस मार्ग से दोनों ओर से चलना जारी रहना चाहिए। आशय एक, भाषा अलग होने से संवाद के जरिए एक-दूसरे की भाषा समझ सकते हैं। प्रणवदा की भाषा संवैधानिक है, जो जीवनमूल्य हमें मिले, उसकी एक भाषा है। उदा.प्ल्यूरिज्म, डायवर्सिटी, सेक्युलरिज्म, हैपिनेस इंडेक्स आदि शब्द प्रणवदा के भाषण में हैं। संघ के शब्द हैं- विविधता, पंथ निरपेक्षता, सबका सुख, अनेकता, आनेवाले समय में एक-दूसरे की भाषा समझकर समान आशय का संवाद करते रहना देश की दृष्टि से आवश्यक है। संघ को कांग्रेस परायी नहीं है, दुश्मन तो बिलकुल नहीं है। कांग्रेस के नेता भी संघ के लिए अस्पर्श नहीं हैं। प्रणवदा ने अत्यंत साहसी निर्णय लेकर एक कदम रखा है। कांग्रेस के लोग यह कदम बड़ा बनाएंगे या उनके पदचिह्न पोंछ डालने की उठापटक करेंगे?

बॉक्सः

वसुधैव कुटुम्बकम्

    संघ की पद्धति के अनुसार मुख्य भाषण के पूर्व व्यक्तिगत गीत होता है। इस समय संघ का ध्येयवाद व्यक्त करनेवाला ‘वसुंधरा परिवार हमारा हिंदू का यह विशाल चिंतन, इस वैश्विक जीवन दर्शन से मानव जाति होगी पावन’ गीत गाया जाता है। इस गीत का भाव ही दोनों भाषणों में व्यक्त हुआ है।

–  मो: 9869206101

 

 

 

 

 

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