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                                                                  प्रभात झा  (सांसद राज्य सभा एवं भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ) एवं तरुण सागर जी 

   

क्रान्तिकारी संत तरूण सागर जी महाराज मध्य प्रदेश की माटी बुंदेलखण्ड के दमोह जिले के गुहंची ग्राम में एक सामान्य परिवार के घर पैदा हुये। 13 वर्ष की उम्र में सन्यास और 20 वर्ष की उम्र में दिगम्बर मुनि दिक्षा। 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने भगवान महावीर स्वामी जी का दूत बनकर पूरे देश में आध्यात्मिक अलख जगाया। मैंने उन्हे बहुत निकट से देखा है। उनके कड़वे प्रवचन समाज को शीतलता प्रदान करते थे। वे सदैव सत्य के निकट रहे। अनेकों संतों के सम्पर्क में आने के बाद जब मैं मुनीवर तरूण सागर जी महाराज के संपर्क में आया तो लगा कि वचन जरूर कठोर हैं लेकिन उनका हृदय भगवान महावीर स्वामी से जुड़ा हुआ है। वे स्वयं के प्रति निर्मोही थे लेकिन समाज के प्रति निर्मल थे। उनके रोम रोम में अध्यात्म का वट-वृक्ष लगा हुआ था।

वे अपनी वाणी को चरित्र जामा पहनाते थे। वे जैसा बोलते थे, वैसा ही जीते थे। समाज जीवन में उन्होने न केवल जैन धर्म का मन जीता, बल्कि भारत के सभी समाजों के मन में अपने आध्यात्मिक विचारों को लोगों के मन में अंकुरित किया। वे सरल थे, सपाट थे, लेकिन उनके ज्ञान के कपाट का विस्तार बहुत बड़ा था। अपनी जीवन शैली से उन्होंने समूचे भारत का मन जीता। आडम्बरयुक्त समाज में आडम्बरमुक्त जीवन जीने के वे भारत में प्रेरणा के केन्द्र बने।

वे अखंड प्रवास, अखंड प्रवचन और पैदल चलकर भारत को नापने और समझने की कोशिश में लगे रहे। भारत के संत समाज में उनकी अलग पहचान थी। वे इस बात पर जोर देते थे कि जो लोग समाज जीवन रेखा से जुड़े है उनकी जीवन शैली मर्यादित होनी चाहिये। वे समाज सेवा को मनुष्य जीवन का कर्म मानते थे। उन्होंने अपने प्रवचनों में अनेक बार कहा कि ‘‘आप जैसा जीते हो, वैसा ही बोलो तो समाज स्वीकार करेगा।’’

तरूण सागर जी महाराज के बचपन का नाम पवन कुमार जैन था। मां शांति के उदर से पैदा हुये एवं पवन के पिता न केवल नाम से ही बल्कि कर्म से भी प्रतापी थे। वे बचपन से ही आध्यात्मिक हो गये थे। मैं उनके गांव गया हूं, उनके छोटे भार्इ से मिला हूं। उनके घर-मकान को देखकर कोर्इ यह नहीं कह सकता कि इतने बड़े संत की यह टूटी-फूटी मड़र्इ है।

वे देश के राजनेताओं के दैनिक जीवन शैली पर सदैव बोला करते थे। वे जन सेवक को और जन प्रतिनिधियों को जन सामान्य की तरह रहना चाहिये। उन्होने मध्य प्रदेश की विधान सभा में साथ ही हरियाणा की विधानसभा में सर्वदलीय विधायकों को आध्यात्मिक आचार संहिता पर बल देते हुये कहा कि उसे सदैव अपने जीवन में उतारना चाहिये। वे इस बात के समर्थक थे कि जिन्हे समाज आदर्श मानता है उन्हे कभी भी अपने आदर्शों के मानदंड को नहीं तोड़ना चाहिये।

तरूण सागर जी महाराज की मान्यता थी कि नेता वही हो सकता है जो समाज के तानों को सुन सकता हो, विनम्र हो, विशाल हृदय का हो, विपरीत विचारधारा वालों को अपने व्यवहार से अपनी धारा में जोड़ ले। वही व्यक्ति समाज का नेतृत्व कर सकता है। उनका राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से, परमपूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवतजी से बहुत निकट का संबंध था। एक बार उन्होने नागपुर के संघ के उत्सव में परमपूज्य सरसंंघचालक जी से आग्रह किया कि आपके गणवेश में चमड़े का प्रयोग होता है उसे यदि छोड़ दें और कपड़े के बैल्ट गणवेश के उपयोग में लायें। यह अहिंसात्मक दिशा में अनुठा कदम होगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने मुनिवर सागर जी महाराज का गा्रहय करते हुये अपने गणवेश में निकर का बेल्ट कपड़े का कर दिया और चमड़े का उपयोग बंद कर दिया।

वे अपनी वाणी और व्यवहार से ऐसे बड़े फैसले सहज और सरलता से करा लेते थे। राष्ट्र चिन्तन से वे सदैव जुड़े रहते थे। उनकी मान्यता रही कि जो लोग अपने समाज जीवन में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं, उन्हे सदैव पथ परहेज का पालन करना चाहिये। जब कभी किसी संत की दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें समाज के सामने आती थी, तो वे बहुत आहत होते थे। वे कहते थे ‘‘संत समाज भारत का आध्यात्मिक मेरूदंड है इसे सदैव अड़िग और अटूट बने रहना चाहिये।’’ वे भक्तों को भी आगाह करते थे कि चमत्कार और मोहित करने वाले चमत्कारी संतो से समाज को बचना चाहिये।

वे अपने कड़वे प्रवचन के लिये जाने जाते रहे। उनके बोल भले ही कड़वे होते थे, लेकिन संदेश मीठे होते थे। चाहे धर्म की बात हो, राजनीति की बात हो, समाज जीवन की बात हो, उनके कड़वे प्रवचन दवा की घूंट के समान है जो पीने में जरूर कड़वा लगता है, लेकिन रूग्नता का सटीक उपचार कर देता है। अपने कड़वे प्रवचन में उन्होने धर्म राजनीति और समाज में व्याप्त बुराइयों-बीमारियों से निजात दिलाने के संदेश दिये हैं। उनके बोल कड़वे जरूर हैं संदेश सच और मीठे हैं।

उन्होने अपने प्रवचन में एक बार कहा था, ‘‘लक्ष्मी पूजा के काबिल तो है, लेकिन भरोसे के काबिल कतर्इ नहीं हैं। लक्ष्मी की पूजा तो करना, मगर लक्ष्मी पर भरोसा मत करना और भगवान की पूजा भले ही मत करना, लेकिन भगवान पर भरोसा हर हाल में रखना।’’

मुनिवर सागर महाराज अपने देह के लिये नहीं, देश के ध्येय के लिये जिये। वे मानवता के पुजारी थे। मनुष्य सेवा उनकी प्राथमिकता थी। वे हमेशा कहा करते थे, ‘‘समाज खड़ा होगा, तो देश सबल होगा’’। वे राजनीति और राजनीतिज्ञों की गिरती साख से भी बड़े चिंतित थे।

वे भारतीय दाम्पत्य जीवन को आध्यात्म में ले जाने वाले प्रवचन दिया करते थे। उन्होंने अपने शरीर की कभी चिंता नहीं की। उनकी मान्यता रही कि, ‘‘यह शरीर माटी का पुतला है और तुझे इस माटी में ही मिल जाना है, लेकिन कुछ ऐसा कर जाओ की इस धरा पर रहने वाले लोग देखकर, आपको पाथेय मानकर आगे बढ़ने लगे’’।

उनकी शरीर त्यागने की उम्र नहीं थी। वे मात्र 51 वर्ष के थे। उन्होने अपने 37 साल के सन्यासी जीवन में एक विशेष स्थान बनाया। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। कठोर प्रवचन देकर लोगों के मन में अपने प्रति श्रद्धा पैदा करवा लेना यह सामान्य घटना नहीं कही जा सकती। वे त्रिकालदर्शी थे। वे अपने और समाज के बारे में बहुत आगे की समझते सोचते थे। उन्होने मृत्यु को सहज स्वीकार कर अपने सभी भक्तों को आगाह कर दिया था कि अब वे काया छोड़ रहे है और आध्यात्मिक काया के माध्यम से समाज की सेवा सतत करते रहेंगे। उन्हे मृतात्मा नहीं कहा जा सकता, बल्कि हमस ब उन्हे आत्मिक आत्मा के रूप में सदैव पूजते रहेंगे। उनके चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि।

 

 

 

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