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कुछ ही सालों के दौरान फिल्मों में जिस तरह तेजी से बदलाव आया यदि इसी तरह बदलाव आता रहा तो 2050 तक फ़िल्में कैसी होंगी? सकारात्मकता की ओर हम फिर लौटेंगे या नकारात्मकता अधिक बढ़ेगी? नई नई तकनीक हमें कहां ले जाएगी? हो सकता है कुछ सालों में ही हम चांद पर फिल्माई गई फिल्म देखें।

हम बचपन से ही सुनते आए हैं परिवर्तन संसार का नियम है। सही भी तो है, यदि परिवर्तन ही न होता तो भला हम आदिमानव से इंसान कैसे बन पाते। आज हम यह न कह रहे होते कि बंदर हमारे पूर्वज हैं बल्कि हम खुद ही बंदर होते। ऐसे में परिवर्तन तो ज़रूरी ही था। जैसे-जैसे इंसान की जरूरतें पूरी होती गईं वैसे-वैसे उसकी लालच भी बढ़ती गई। इंसान की यह पुरानी आदत है कि वह एक तरह की चीजों से ऊब जाता है। पहले वह नई चीज ढूंढ़ता है फिर उस नई चीज का लगातार इस्तेमाल करके उसे पुराना करता है और फिर उससे ऊब कर फिर किसी नई चीज़ की ओर बढ़ता है। परिवर्तन का नियम तो इस कदर से संसार और कुदरत पर लागू है कि मेरे हिसाब से अब उस लोमड़ी ने भी अंगूरों का स्वाद चख लिया होगा जिसने अंगूरों तक न पहुंच पाने के कारण उन्हें खट्टा बता दिया था। यहां हम केवल फिल्मों में आए बदलाव की चर्चा करेंगे।

फिल्मों में आए सामाजिक बदलाव

यही बदलाव था जिसके साथ समाज का निर्माण हुआ, सामाजिक नियमों का गठन हुआ और फिर धीरे-धीरे इस समाज और इसके नियमों में परिवर्तन आने लगा। अब जब समाज में बदलाव आया तो भला समाज का दर्पण कही जाने वाली फिल्मों में बदलाव कैसे न आता। फिल्मों में आए बदलाव को आप सामाजिक बदलाव से कुछ इस तरह जोड़ सकते हैं कि नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा आज पुरानी फिल्मों को देखना पसंद नहीं करता। उन्हें ये फिल्में उबाऊ लगती हैं। और वहीं जो लोग बुजुर्ग हो चुके हैं उनकी शिकायत यही रहती है कि 70 के बाद और 80 से पहले की फिल्मों जैसा स्वाद और आनंद आज की फिल्मों में नहीं। इस तरह जो 70 से पहले की फिल्में हैं वे मात्र धरोहर बन कर रह गई हैं। या तो उन्हें सिनेमा का अध्ययन करने वाले बच्चे देखते हैं या फिर वे जो गांव जावर से आज भी जुड़े हैं।

यह तो आपके सामने ही है कि किस तरह से आज ठेठ गांव समाज और फिल्मों दोनों जगह से विलुप्त होते जा रहे हैं। पिछले 10 से 15 वर्षों के भीतर आपने कितनी ऐसी फिल्में देखी हैं जिनमें गांव का किसान हीरो है और जमींदार विलेन, जोर लगाइए और सोचिए कि इन वर्षों में आपने कितनी ऐसी फ़िल्में देखीं जिनमें खलनायक एक डाकू है? नहीं याद आएंगी, क्योंकि अब लुटेरों ने भेस और ठिकाने दोनों बदल लिए हैं। अब वे डाकू के रूप में नहीं लूटते। अब गांव को डाकुओं का संकट नहीं बल्कि देश को आतंकियों और देश के भीतर छुपे देशद्रोहियों से संकट है। इसीलिए अब फिल्मों का गब्बर डकैती छोड़ कर बड़े-बड़े बिजनेसमैन और राजनेताओं को सबक सिखाने पर उतारू हो गया है। अब कोई भी बेरोजगार युवक गांव से शहर कमाने नहीं आता बल्कि छोटे शहर का युवक बड़े शहर में अपनी पहचान बनाने जाता है।

अब अगर हमें सामाजिक बदलाव का असर सिनेमा पर देखना हो तो हमें कुछेक फिल्मों को ध्यान में लाना होगा। जैसे कि आपको दो फ़िल्मों, ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ और ’रब ने बना दी जोड़ी’ तो याद ही होंगी। दोनों फ़िल्में एक ही बैनर तले बनी हैं- यशराज फिल्म्स। लेकिन दोनों फिल्मों में समय के साथ आए सामाजिक बदलाव ध्यान दीजिए। पहली यानि डीडीएलजे में लड़की की मां तक चाहती है कि वह लड़के के साथ भाग जाए। ऐसे में वह अपने गहनों को भी तिलांजलि देने को तैयार है (जबकि आप तो जानते ही हैं भारतीय महिला के लिए गहनों का क्या मोल है)। जबकि इससे पहले की फिल्मों में मां ही बेटी को अपने प्रेमी से अलग हो कर उसके पिता की मर्जी से शादी करने के लिए राजी करती थी।

हालांकि इस फिल्म में हीरो यह कह कर घर से भागने से मना कर देता है कि वह लड़की के पिता की मर्ज़ी से ही शादी करेंगे। जैसा कि आप जानते ही हैं भारतीय समाज में इसे बहुत सम्मानित माना जाता है। घर से भागना एक तरह से कलंक बन जाता है। शायद इसीलिए तो लड़की लड़का अगर गाड़ी में भी जाते हैं तो समाज उसे भागना ही कहता है। कहने का मतलब यह है कि फिल्म में उस समय के समाज में एक बदलाव लाने की कोशिश की गई है वह भी एक संस्कारी ढंग से।

अब दूसरी फिल्म यानि रब ने बना दी जोड़ी को देख लीजिए, यहां विचार पूरी तरह से अलग हैं। वो सात दिन और हम दिल दे चुके सनम जैसी कुछेक फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो पहले की फिल्मों में अगर हिरोइन की शादी हो जाती थी तो उसका जीवन जैसे थम सा जाता था। उसका पति अगर हिरोइन के प्यार के बारे में जान भी लेता तो उसे प्रेमी से मिलाने की बात तो किसी शर्त पर नहीं कहता। लेकिन इस फिल्म में पति चाहता है कि अगर उसकी पत्नी अपने दब्बू पति के साथ ख़ुश नहीं है तो वह अपने मनचाहे लड़के के साथ भाग जाए।

यहां समाज में बदलाव आया, शादीशुदा के साथ प्रेम संबंध और भाग जाने का विचार कहीं न कहीं समाज को स्वीकार्य हो गया है। इसका ताजा उदाहरण कानपुर के सुजीत गुप्ता का माना जा सकता है जिसने अपनी पत्नी शांति गुप्ता, जिससे मात्र नौ दिन पहले उसका विवाह हुआ था, की शादी उसके प्रेमी के साथ धूमधाम से करा दी। तो हम यह मान सकते हैं कि फिल्मों में वही दिखाने की कोशिश की जाती है जो समाज में उस समय के अनुसार चल रहा है। इन्हीं बदलावों को हम बाद की अन्य फ़िल्मों में भी देख सकते हैं।

हमारे समय की दो मशहूर फ़िल्में, ’कॉकटेल’और ’जब तक है जान’ हैं जो लिव-इन जैसे संबंध और ’न उम्र की सीमा हो’वाली प्रेम कहानी को दिखाते हैं। और फ़िल्में हिट हो जाती हैं जबकि एक दशक पहले ’उम्र की सीमा न रहे’वाली प्रेम कहानी ’लम्हे’ को भारतीय पूरी तरह से नकार देते हैं। इससे यह माना जा सकता है कि समाज अब ऐसी परिस्थितियों को अपना रहा है।

तकनीकी बदलाव

समय के साथ समाज में आए बदलाव के कारण फिल्मों की पटकथा के बदल जाने के बाद जो एक बड़ा बदलाव फिल्मों में आया वह है तकनीकी बदलाव। इस बदलाव ने तो जैसे हिंदी सिनेमा की दशा और दिशा ही बदल दी। यही तकनीकी बदलाव है जिसके कारण हम पौराणिक कथाओं को पसंद करते हुए आज की आधुनिक कहानियों से ज्यादा वाहवाही कर उठाते हैं। हम यहां पहले उस मुग़ल ए आज़म की बात करते हैं जिसे हिंदी सिनेमा के सर का ताज कहा जाता है। मुग़ल-ए-आज़म के. आसिफ़ की पहली विराट फ़िल्म थी जिसने आगे आने वाली पुश्तों के लिए फ़िल्म निर्माण के पैमाने ही बदल दिए। बाहुबली फिल्म से पहले युद्ध पर आधारित फिल्मों में सबसे बड़ा नाम मुग़ल ए आज़म का ही लिया जाता था। आधी सदी पहले भव्य और आलीशान सेट, शानदार नृत्यों और भावपूर्ण संगीत से सजी फिल्म मुग़ल-ए-आज़म रुपहले पर्दे पर आई थी, लेकिन के. आसिफ़ अपने इस सपने को पूरा करने के लिए 14 साल तक जूझते रहे। पहले एक साल में सिर्फ पृथ्वीराज कपूर और दुर्गा खोटे के दृश्य शूट हुए थे। पूरे वर्ष के दौरान मात्र एक सेट के दृश्य ही शूट हो पाए थे। आपको जान कर हैरानी होगी कि इस फिल्म के एक सेट को तैयार होने में महीनों का समय लग जाता था। कुछ सेट दस साल तक भी नहीं बन पाए। इस फ़िल्म की शूटिंग मोहन स्टूडियो में हुई थी। आउटडोर शूटिंग जयपुर में हुई थी। करीब सौ लोगों की यूनिट सर्दियों में जयपुर गई थी, पर शूटिंग गर्मियों में हुई। यूनिट के लोग भारतीय सेना के बैरक में रहते थे। फिल्म में युद्ध के दृश्यों के लिए सेना ने मदद की थी। इतने लम्बे समय के बाद यह फिल्म बन पाई।

वहीं दूसरी तरफ बात बाहुबली 2 की करें  तो 17 दिसंबर 2015 को फिल्म की शूटिंग शुरू हुई और अप्रैल 28, 2017 को दुनिया भर के सिनेमा घरों में प्रदर्शित हो गई। स्पेशल इफेक्ट्स से सजी इस फिल्म को बन कर प्रदर्शित होने में मात्र एक साल और चार महीने का समय लगा। इसका कारण सिर्फ और सिर्फ फिल्मों में आए तकनीकी बदलाव हैं। इसकी कामयाबी का क्रेडिट एक्टिंग, कहानी, डायलॉग्स और विजुअल इफेक्ट्स को तो जाता ही है लेकिन फिल्म को 1500 करोड़ तक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान तऋद का रहा। वीएफएक्स तकनीक का वीएफएक्स असल में होता है विजुअल इफेक्ट्स। यह ऐसी तकनीक होती है जहां सीजीआई से तैयार सींस को वास्तविक सींस से इस तरह से जोड़ा जाता है कि दोनों में कोई अंतर दिखाई नहीं दे। इसके लिए ग्रीन या ब्लू स्क्रीन का इस्तेमाल किया जाता है। अब तो वीएफएक्स श्रेणी में ऑस्कर भी दिया जाता है। आपको याद होगा फिल्म लाइफ ऑफ पाई के सीन, जिसमें एक लड़का नाव में एक शेर के साथ रहता है, सबकुछ इसी तकनीक के जरिए फिल्माया गया था और यह सब पर्दे पर बिल्कुल वास्तविक लगता है। दरअसल इस तकनीक के जरिए फिल्मांकन कर सींस को बेहद प्रभावशाली बनाया जाता है जो पर्दे पर आपको बिल्कुल वास्तविक लगता है।

तो इस तरह से तकनीकी बदलाव के कारण समय भी बचा और आज तक की सबसे बड़ी, पसंदीदा और मनोरंजक फिल्म भी तैयार हो गई। वैसे मैं अपनी बात कहूं तो मुझे बाहुबली के दोनों भाग बेहद पसंद आए किन्तु मेरे लिए बॉलीवुड के सर का ताज आज भी मुग़ल ए आज़म ही है।

एक्शन फिल्मों नें बदलाव

वहीं बात एक्शन फिल्मों कि करें तो पहले की एक्शन फिल्मों में जहां डिशुम डिशुम की आवाज के साथ देसी फाइटिंग देखने को मिलती थी वहीं आज की फिल्मों में मिश्रित मार्शल आर्ट का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाने लगा है। हम चाहे ’कमांडो’श्रृंखला की फिल्मों की बात करें या फिर ’मुन्ना माइकल’,  बागी 2, ’नाम शबाना’आदि जैसी एक्शन फिल्मों में मिश्रित मार्शल आर्ट के इस्तेमाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महिलाओं को लेकर आए बदलाव

अगर फिल्मों में आए परिवर्तन की बात चल ही रही है तो फिर महिलाओं की बात भला कैसे न हो। सन 1931 के कुछ समय उपरांत ही भारतीय समाज में व्याप्त नारी जीवन की विडंबनाओं को लेकर कई फिल्में बनाई गईं जिनमें ‘दुनिया ना माने’, ‘अछूत कन्या’  ‘आदमी’, ‘देवदास’, ‘इंदिरा एम.ए.’, बाल योगिनी’ प्रमुख रूप से सम्मिलित हैं । इस तरह की फिल्मों में नारी जीवन से संबंधित जिन समस्याओं को उजागर किया गया उनमें ‘बाल विवाह’, ‘अनमेल विवाह’, ‘पर्दा प्रथा’, ‘अशिक्षा’ आदि थे। इस तरह पर्दे पर ज्यादातर महिलाओं को कमजोर और दया का पात्र दिखाया गया लेकिन समय के साथ यह दौर बदला। इसके बाद दौर आया ‘दामिनी’, ‘बेंडिट क्वीन’, ‘मम्मो’, ‘फायर’, ‘सरदारी बेगम’, ‘मृत्युदंड’, ‘गॉड मदर’, ‘हरी-भरी’, ‘गजगामिनी’, ‘अस्तित्व’, ‘जुबैदा’, ‘क्या कहना’, ‘लज्जा’, ‘चांदनी बार’, आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इनके अलावा ‘नसीम’, ‘जख्म’, ‘हमारा दिल आपके पास है’, ‘फिज़ा’  जैसी फिल्मों का जिनमें महिलाओं पर जुल्म तो हुए लेकिन उन्होंने जुल्म का मुंहतोड़ जवाब भी दिया। वहीं आज की दंगल, बेगम जान, पार्च्ड, नीरजा, पिंक, निल बातें, सन्नाटा जैसी कई फिल्मों ने महिलाओं के उस पक्ष को उजागर किया जो खुद में एक बदलाव हैं।

क्या होगा यदि यूं बदलती रहीं फिल्में

पूरे लेख में हमने चर्चा की कि कैसे तब से अब तक फिल्मों में बदलाव आए। जैसा कि सब जानते हैं बदलाव समाज के लिए जरूरी है और समाज के लिए जरूरी है तो सिनेमा के लिए भी जरूरी है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि कुछ ही सालों के दौरान फिल्मों में जिस तरह तेजी से बदलाव आया यदि इसी तरह बदलाव आता रहा तो 2050 तक फ़िल्में कैसी होंगी? जब 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्म में पहली बार बड़े पर्दे पर देविका रानी ने चार मिनट का चुम्बन दृश्य दिया था तब उनकी आलोचना करने वालों ने क्या यह सोचा होगा कि 2018 तक ऐसे दृश्य आम हो जाएंगे, क्या किसी के मन में यह खयाल आया होगा कि सालों बाद पोर्न फिल्मों में काम करने वाली सनी लियोन हिंदी फिल्मों की इतनी बड़ी स्टार बन जाएंगी कि उन पर फिल्म बनाई जाएगी? नहीं शायद बिलकुल नहीं।

तब भले किसी ने नहीं सोचा किन्तु आज हम सोच सकते हैं कि ये जो बदलाव हम आज देख रहे हैं ये आने वाले कल में और न जाने क्या कुछ बदल देंगे। महिला सशक्तिकरण को देखते हुए यह भी बड़ी बात नहीं कि 2050 तक ये सवाल उठा दिया जाए कि हर बार बेबस हिरोइन ही क्यों हो? हर बार बदला हीरो ही क्यों लें? हर बार दुष्कर्म या छेड़छाड़ लड़कियों के साथ ही क्यों हो? आज भले ये हंसने वाली बात लग रही हो किन्तु आने वाले समय में यह संभव हो सकता है।

जैसा हमने ऊपर पढ़ा कि आज की फिल्मों में लिव इन रिलेशनशिप को महत्व दिया जा रहा है, उस हिसाब से हो सकता है कि आगे के समय में फिल्मों से विवाह का चलन ही समाप्त कर दिया जाए। जिस तरह से विजुअल इफेक्ट्स का बोलबाला हो रहा है उस तरह से यह संभव है कि आने वाले सालों में हमें चांद पर फिल्माई गई फ़िल्में देखने को मिले, जिन्हें बनाने में महज कुछ महीनों का समय लगे। या ऐसा भी हो सकता है कि हम चींटियों की कहानी को बड़े पर्दे पर देखें जिनमें चींटियां अनिमेशन न हो कर वास्तविक नजर आएं।

बदलाव का एक पहलू जहां अच्छा है वहां दूसरा पहलू भयावह भी। यह बदलाव की ही देन है जो अभिनेत्रियों के कपडे सिकुड़ते जा रहे हैं, यह बदलाव ही है जो हमारे बच्चे पर्दे पर चल रही हिंसा को भी मनोरंजन मान कर उसका मजा ले रहे हैं। ये बदलाव ही हैं जिसने अंदर की संवेदनाओं को मारने में अहम भूमिका निभाई है। ये बदलाव ही हैं जो हम गांवों को लगभग भूलते चले जा रहे हैं। यह सिनेमा का बदलाव ही है जिसने ऑटो शंकर जैसे अपराधियों को अपराध के नए-नए तरीके सुझाए। यदि इस तरह का बदलाव इसी तेजी से आता रहा तो कल्पना कर लीजिए उस आने वाले कल की जिसे आप अपनी अगली पीढ़ी के लिए सुनहरा मान रहे हैं।

 

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