हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आया एक मामला यह संकेत देता है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों और किशोरों को निशाना बनाकर चल रही गतिविधियाँ कितनी गंभीर हो चुकी हैं। कोरियन वेब सीरीज़ और ऑनलाइन गेमिंग के माध्यम से एक किशोरी के लंबे समय तक मानसिक रूप से प्रभावित रहने की घटना ने अभिभावकों और विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
जाँच में यह भी सामने आया कि इस प्रकार का कंटेंट केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि सुनियोजित डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यह घटना जेन-जी की साइबर सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर नए प्रश्न खड़े करती है।
डिजिटल युग ने ज्ञान, मनोरंजन और संवाद की अभूतपूर्व संभावनाएँ खोली हैं, किंतु इसके साथ-साथ कुछ ऐसी सूक्ष्म और अदृश्य चुनौतियाँ भी उभरी हैं, जिनका प्रभाव समाज की जड़ों तक को हिलाने की क्षमता रखता है।
हाल के वर्षों में कोरियन पॉप संस्कृति, वेब सीरीज़ और ऑनलाइन गेमिंग के बढ़ते प्रभाव को केवल एक सांस्कृतिक प्रवृत्ति समझना भूल होगी। यह एक सुनियोजित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र है, जो विशेष रूप से किशोरों और युवाओं के मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर संचालित हो रहा है। हालिया समाचार रिपोर्टें इस ओर संकेत करती हैं कि जेन-जी को लक्षित कर यह कंटेंट केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विचार, पहचान और उपभोक्ता व्यवहार को नियंत्रित करने का माध्यम बनता जा रहा है।
किशोरावस्था मानवीय जीवन का वह चरण है, जहाँ व्यक्ति पहचान, स्वीकार्यता और नवीनता की तलाश में रहता है। मानसिक अस्थिरता, भावनात्मक प्रयोगशीलता और सामाजिक स्वीकार्यता की तीव्र इच्छा इस आयु वर्ग की विशेषताएँ हैं। यही कारण है कि डिजिटल दुनिया का चमकीला, त्वरित और आभासी संसार किशोरों को सहज ही अपनी ओर खींच लेता है।
कोरियन पॉप संगीत, ड्रामा और वेब सीरीज़ न केवल रंगीन दृश्यावली और भावुक कथानक प्रस्तुत करते हैं, बल्कि ऐसे पात्र रचते हैं जिनसे किशोर स्वयं को जोड़ने लगते हैं। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब यह जुड़ाव केवल पसंद तक सीमित न रहकर आदत और फिर लत में परिवर्तित हो जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म इस लत को और सशक्त बनाते हैं, क्योंकि वे उपयोगकर्ता की रुचि के अनुसार लगातार समान या अधिक तीव्र कंटेंट परोसते रहते हैं।
पहली दृष्टि में कोरियन कंटेंट को वैश्वीकरण के स्वाभाविक परिणाम के रूप में देखा जा सकता है। किंतु गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित रणनीति का हिस्सा है। कोरिया ने मनोरंजन उद्योग को एक सॉफ्ट पावर के रूप में विकसित किया है। संगीत, फैशन, सौंदर्य उत्पाद, खान-पान और जीवनशैली, सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
किशोर जब किसी वेब सीरीज़ या पॉप आइकन को फॉलो करता है, तो वह अनजाने में उसके पहनावे, भाषा, भाव-भंगिमा और जीवनशैली को भी अपनाने लगता है। यह धीरे-धीरे स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक मूल्यों से दूरी का कारण बन सकता है, विशेषकर तब जब परिवार और शिक्षा तंत्र समय रहते संतुलन स्थापित न कर पाएँ।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे चिंताजनक पहलू डार्क वेब से जुड़ा है। डार्क वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है, जहाँ सामान्य सर्च इंजन काम नहीं करते और जहाँ पहचान छिपाकर गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, किशोरों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखकर उन्हें विशेष प्रकार के डिजिटल जाल में फँसाया जाता है। यह जाल कई चरणों में काम करता है।
पहले चरण में आकर्षक और अपेक्षाकृत सामान्य कंटेंट दिखाया जाता है। दूसरे चरण में भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाया जाता है। तीसरे चरण में किशोरों को गुप्त ऑनलाइन समूहों या गेमिंग कम्युनिटी से जोड़ा जाता है और अंततः कुछ मामलों में आर्थिक लाभ, गिफ्ट कार्ड, क्रिप्टो भुगतान या डिजिटल इनाम के ज़रिए उनसे अवैध गतिविधियाँ कराई जाती हैं।
जेन-जी वह पीढ़ी है जो तकनीक के साथ ही बड़ी हुई है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम इनके दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यह पीढ़ी तेज़ी से सीखती है, परंतु साथ ही त्वरित संतुष्टि की ओर भी आकृष्ट होती है। यही विशेषता साइबर अपराधियों और डिजिटल मैनिपुलेटर्स के लिए अवसर बन जाती है। इसके अतिरिक्त परिवार और बच्चों के बीच संवाद की कमी भी समस्या को बढ़ाती है। जब माता-पिता डिजिटल दुनिया को केवल मोबाइल या इंटरनेट तक सीमित समझ लेते हैं और उसके भीतर चल रही जटिल प्रक्रियाओं से अनजान रहते हैं, तब किशोर बिना किसी मार्गदर्शन के इस दुनिया में भटकने लगते हैं।
ऑनलाइन गेमिंग आज बच्चों और किशोरों में अत्यधिक लोकप्रिय है। मल्टीप्लेयर गेम्स, वर्चुअल रिवॉर्ड्स और वैश्विक प्रतिस्पर्धा उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। इन खेलों में प्रयुक्त रणनीतियाँ, मिशन-आधारित संरचना और टीमवर्क, कई बार वास्तविक जीवन की गतिविधियों से अधिक आकर्षक प्रतीत होती हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यही गेमिंग प्लेटफॉर्म बच्चों को निर्देशों का पालन करने, लंबे समय तक ध्यान केंद्रित रखने और जोखिम उठाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, जो बाद में अवांछित डिजिटल गतिविधियों में प्रयुक्त हो सकते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बिना निगरानी के गेमिंग किशोरों को मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।
भारत जैसी बहुलतावादी संस्कृति में बाहरी प्रभाव हमेशा से आते रहे हैं, किंतु वे आमतौर पर स्थानीय संस्कृति के साथ घुल-मिल जाते थे। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब बाहरी प्रभाव स्थानीय पहचान को प्रतिस्थापित करने लगें। कोरियन कंटेंट के प्रभाव में कई किशोर अपनी भाषा, वेश-भूषा और सामाजिक व्यवहार में तीव्र परिवर्तन दिखा रहे हैं। यह परिवर्तन स्वयं में नकारात्मक नहीं है, किंतु जब यह अंधानुकरण में बदल जाए और आत्मपहचान को कमजोर करने लगे, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। जेन-जी के लिए यह समझना आवश्यक है कि वैश्विक संस्कृति अपनाने का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं होता।
इस चुनौती का समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि संवाद और समझ में निहित है। माता-पिता को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों में रुचि लेनी होगी। यह जानना आवश्यक है कि वे कौन-सा कंटेंट देख रहे हैं, किन लोगों से ऑनलाइन संवाद कर रहे हैं और किन प्लेटफॉर्म पर समय बिता रहे हैं। शिक्षा तंत्र को भी डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना होगा कि ऑनलाइन दुनिया में कौन-सी जानकारी सुरक्षित है और कौन-सी नहीं। आलोचनात्मक सोच ही वह उपकरण है, जो किशोरों को डिजिटल जाल से बचा सकता है।
सरकार और साइबर एजेंसियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डार्क वेब गतिविधियों पर सतत निगरानी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कठोर साइबर कानूनों के बिना इस समस्या से निपटना कठिन है। साथ ही, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना भी समय की माँग है। एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट वितरण पारदर्शी होना चाहिए और बच्चों के लिए अलग-से सुरक्षित डिजिटल स्पेस विकसित करने की आवश्यकता है। केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे; इसके साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी आवश्यक है।
समाचार माध्यमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को सनसनी फैलाने के बजाय तथ्यपरक और शिक्षाप्रद सामग्री प्रस्तुत करनी चाहिए। बच्चों और किशोरों को भयभीत करना समाधान नहीं है; उन्हें सशक्त बनाना ही वास्तविक समाधान है। मीडिया को यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी संस्कृति विशेष को दोषी ठहराने से समस्या का सरलीकरण होता है, जबकि असली मुद्दा डिजिटल दुरुपयोग और मानसिक शोषण है।

कोरियन कंटेंट का बढ़ता प्रभाव, डार्क वेब की गतिविधियाँ और जेन-जी की संवेदनशीलता, ये तीनों मिलकर एक जटिल सामाजिक चुनौती का निर्माण करते हैं। यह समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और नैतिक भी है। समाधान एकतरफा नहीं हो सकता। इसके लिए परिवार, शिक्षा, मीडिया, सरकार और स्वयं किशोरों, सभी को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।
डिजिटल दुनिया को न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही आँख मूँदकर अपनाया जा सकता है। संतुलन, जागरूकता और संवाद ही वह मार्ग हैं, जिनसे जेन-जी को डिजिटल जाल से बचाकर एक सशक्त, आत्मविश्वासी और संस्कारित नागरिक बनाया जा सकता है।
– डॉ दीपक कोहली


Really a great article to read to sensitise people specially Gen Z about Korean conspiracy.
Regards.