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दिल्ली उपद्रव; शब्दों का पतन, संस्कारों का सूखा?

दिल्ली उपद्रव; शब्दों का पतन, संस्कारों का सूखा?

वर्दी वाले सैनिकों को भद्दी गालियाँ देती युवती — एक दृश्य, अनेक प्रश्न

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, समाचार..
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दिल्ली में हुए एक हालिया आंदोलन ने देश के एक बड़े वर्ग को भीतर तक झकझोर दिया- इतना कि इस पर लिखे बिना रहा नहीं जा सकता। जो दृश्य सामने आए- देश के प्रधानमंत्री के लिए अपशब्दों की बौछार, वर्दीधारी सुरक्षाकर्मियों के प्रति खुली अभद्रता और बहुसंख्यक समाज के प्रति तिरस्कार का भाव- वे इतने व्यापक रूप से देखे और साझा किए गए कि उनकी पुनरावृत्ति इस आलेख में आवश्यक नहीं।

जो चौंकाने वाला था, वह केवल भाषा की अशिष्टता नहीं थी- वह सहजता थी जिसके साथ यह भाषा सार्वजनिक मंच पर, कैमरे के सामने, बिना किसी झिझक के प्रयुक्त हुई। यही सहजता असली प्रश्न खड़ा करती है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या हुआ- वह सबने देखा। प्रश्न यह है कि एक समाज, जो सदियों से मर्यादा और संयम को अपनी पहचान मानता रहा, इस बिंदु तक कैसे और क्यों पहुँचा। यही प्रश्न इस आलेख के मूल में है।

प्रोटेस्ट के नाम मोहतरमा ...

प्राथमिक आवेग: बच्चों को, फिर माता-पिता को कोसना

जिस किसी ने भी वे वीडियो देखे, उसकी पहली प्रतिक्रिया आक्रोश की थी और स्वाभाविक भी। बहुतों ने उन युवाओं को कोसा, फिर उनके माता-पिता को। यह प्रतिक्रिया मनोवैज्ञानिक रूप से समझ में आती है, पर व्यावहारिक रूप से निरर्थक। “बच्चों” को गाली देने से समस्या हल नहीं होगी। उनके माता-पिता को दोष देने से भी नहीं क्योंकि संभवतः वे स्वयं उतने ही असहाय हैं जितना यह घटनाक्रम हमें असहाय बनाता है। बदलते युग में अपनी संतान को विवेकशीलता और संस्कार कहाँ से, किस स्रोत से दें, यह प्रश्न स्वयं माता-पिता की पीढ़ी के लिए भी उतना ही अनुत्तरित है।

ಅಲ್ಪಸಂಖ್ಯಾತ on X: "What concerns me is the ...

संवादहीनता का परिवार

यह मान लेना सरल है कि पारिवारिक वातावरण और अभिभावकों की शिक्षा बच्चों के संस्कार की नींव है। पर आज के परिवार में उतना संवाद शेष बचा है भी, जो यह नींव रख सके? माता-पिता दोनों की व्यावसायिक व्यस्तता, संयुक्त परिवार की संरचना का क्षरण और डिजिटल उपकरणों का पारिवारिक समय में हस्तक्षेप, इन सबने वह स्थान लगभग समाप्त कर दिया है जहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मूल्य मौखिक रूप से हस्तांतरित होते थे। बच्चा अपने प्रश्नों के उत्तर परिवार से नहीं, बल्कि उस एल्गोरिदम-चालित डिजिटल भीड़ से पा रहा है जो स्वयं किसी सुसंगत मूल्य-व्यवस्था से बँधी नहीं।

क्या माता-पिता स्वयं आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं?

यह प्रश्न असुविधाजनक है, पर टालने योग्य नहीं। जो माता-पिता स्वयं मदिरापान, क्लब-संस्कृति और उपभोक्तावादी जीवनशैली में रमे हों, क्या वे बच्चों के सामने संयम और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करने की स्थिति में हैं?

क्या स्वयं उन्हें भारत के इतिहास, महापुरुषों के जीवन-चरित्र और धार्मिक-दार्शनिक परंपरा का इतना ज्ञान है कि वे इसे आगे हस्तांतरित कर सकें? जब अभिभावक स्वयं अपनी सभ्यतागत जड़ों से कटे हों, तो संतान में उसकी अपेक्षा करना तर्कहीन है। स्वयं असंस्कारित माता-पिता, ऊपर से संवादहीनता, यह संयोजन वही विषैला वातावरण रचता है जो दिल्ली की सड़कों पर व्यवहार बनकर प्रकट हुआ।

सामाजिक निगरानी: सभ्यता का पहला चेकपॉइंट

प्राचीन काल से समाज ने अपने मूल्य, नैतिकता और आचार-संहिता स्वयं गढ़े हैं और उनके पालन का प्रथम उत्तरदायित्व भी स्वयं समाज का रहा है, प्रशासन का नहीं। “चार लोग क्या कहेंगे” यह वाक्य आज व्यंग्य और उपहास की वस्तु बन चुका है, जबकि वास्तव में यह सभ्यता का सेफ्टी वाल्व था। यह अनौपचारिक निगरानी बिना किसी कानून, अदालत या पुलिस के हस्तक्षेप के व्यक्ति के आचरण को मर्यादा में रखती थी और साथ ही प्रभावित परिवार की निजता भी सुरक्षित रखती थी, विषय बिना सार्वजनिक हुए, बिना औपचारिक दंड-प्रक्रिया में गए, स्वतः सुलझ जाता था।

व्यक्ति की राष्ट्र से संबद्धता एक श्रृंखला में चलती है- व्यक्ति, परिवार, समाज, गाँव, राष्ट्र। व्यक्ति के पतन को परिवार संभालता है, परिवार के पतन को समाज। जब समाज अपनी यह मध्यस्थ भूमिका त्याग देता है, तो व्यक्ति की कड़ी सीधे राष्ट्र से जुड़ जाती है- बिना उन मध्यवर्ती संस्थाओं के, जो पहले हर विचलन को शुरुआत में ही थाम लेती थीं। यही आज हो रहा है: परिवार और पड़ोस अब न तो निगरानी करते हैं, न सुधारते और अंततः विचलन प्रशासन और कानून तक या फिर सार्वजनिक सड़क तक जा पहुँचता है।

गुरु-शिष्य परंपरा में मर्यादा: अधिकार और श्रद्धा का संतुलन

भारतीय शिक्षा-परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध केवल ज्ञान के हस्तांतरण का माध्यम नहीं था, अपितु मर्यादा की एक संपूर्ण पाठशाला था। शिष्य गुरु के समक्ष असहमति भी रख सकता था- उपनिषदों और पुराणों में ऐसे अनेक संवाद मिलते हैं जहाँ शिष्य ने गुरु से गंभीर, यहाँ तक कि चुनौतीपूर्ण प्रश्न पूछे, परंतु यह असहमति सदैव श्रद्धा और मर्यादा की सीमा के भीतर रहती थी। प्रश्न करने का अधिकार था, पर अपमान करने का अधिकार कभी नहीं। यही भेद आज के विमर्श में सबसे अधिक लुप्त हो चुका है।

आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में असहमति और विरोध का अधिकार अनिवार्य है, और होना भी चाहिए- प्रधानमंत्री सहित कोई भी पद आलोचना से ऊपर नहीं। परंतु गुरु-शिष्य परंपरा हमें यह सिखाती है कि असहमति की तीव्रता और भाषा की मर्यादा दो भिन्न वस्तुएँ हैं।

एक शिष्य अपने गुरु के निर्णय से असहमत होकर भी उसे “गुरु” के रूप में संबोधित करता रहता था, क्योंकि वह पद और व्यक्ति के बीच का भेद समझता था। आज के विरोध-प्रदर्शनों में यह भेद पूर्णतः मिट चुका है- असहमति सीधे अपमान में, वैचारिक विरोध सीधे व्यक्तिगत गाली में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि जिस परंपरा ने कभी “अधिकार के प्रति असहमति” और “अधिकार के प्रति अवमानना” के बीच रेखा खींचना सिखाया, वह परंपरा ही शिक्षा-व्यवस्था से बाहर हो चुकी है।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने ज्ञान तो दिया, पर गुरु-शिष्य संबंध की उस मर्यादा-सिखाने वाली संरचना को साथ नहीं लाई, परिणामस्वरूप विद्यार्थी को यह तो पता है कि असहमत कैसे हों, पर यह नहीं पता कि असहमति को मर्यादा के भीतर कैसे व्यक्त करें।

पश्चिमी व्यक्तिवाद और भारतीय पारिवारिक दर्शन का द्वंद्व

भारतीय सामाजिक संरचना पारंपरिक रूप से व्यक्ति को परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी मानती रही है- “मैं” से पहले “हम”। पश्चिमी उदार व्यक्तिवाद, जिसे शिक्षा और मीडिया के माध्यम से आयात किया गया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य मानता है, प्रायः सामुदायिक उत्तरदायित्व की कीमत पर। जब यह आयातित विचार भारतीय सामाजिक ढाँचे पर बिना समुचित रूपांतरण के आरोपित हो जाता है, तो न व्यक्ति को स्वतंत्रता का दायित्व-बोध मिलता है, न समाज को अपनी परंपरागत निगरानी-भूमिका निभाने की वैधता शेष रहती है। परिणाम एक सांस्कृतिक निर्वात है- न पूर्ण पश्चिमी व्यक्तिवाद, न परंपरागत सामाजिक अनुशासन, न लोकसंग्रह की भावना, न गुरु-शिष्य परंपरा की मर्यादा-शिक्षा।

निष्कर्ष

दिल्ली की सड़कों पर जो कुछ घटित हुआ, वह किसी एक दिन, एक आंदोलन या एक पीढ़ी की उपज नहीं है- वह उस दीर्घकालिक क्षरण का सतह पर आया हुआ प्रमाण है, जो पिछले कुछ दशकों से चुपचाप चल रहा था। परिवार में संवाद घटा, अभिभावक स्वयं अपनी सभ्यतागत जड़ों से कट गए, समाज ने अपनी निगरानी की भूमिका त्याग दी, और शिक्षा-व्यवस्था ने ज्ञान तो दिया पर मर्यादा सिखाना छोड़ दिया।

इन सबका परिणाम अकस्मात प्रकट नहीं होता- वह वर्षों तक भीतर संचित होता रहता है और फिर किसी एक अवसर पर, किसी एक सड़क पर, भाषा और व्यवहार बनकर फूट पड़ता है।

इसलिए इस घटना को किसी एक आंदोलन, एक राजनीतिक पक्ष, या एक पीढ़ी तक सीमित करके देखना आत्मघाती होगा। यह पूरे समाज के लिए एक दर्पण है। यदि हमें एक ऐसी युवा पीढ़ी चाहिए जो असहमति को भी मर्यादा में, तर्क और भाषा की गरिमा के साथ व्यक्त कर सके, तो पहला कदम स्वयं अभिभावकों को शिक्षित और संस्कारित करना है- न कि केवल संतान को उपदेश देना।
साथ ही, सामाजिक निगरानी की उस परंपरागत व्यवस्था का पुनर्स्थापन आवश्यक है जो कभी बिना कानून के भी समाज को मर्यादा में रखती थी और लोकसंग्रह तथा गुरु-शिष्य परंपरा जैसी अवधारणाओं का पुनर्जीवन आवश्यक है जो व्यक्ति को यह सिखाती थीं कि असहमति और अवमानना के बीच की रेखा कहाँ खिंचती है।

यह कोई ऐसा कार्य नहीं जो एक कानून, एक नीति, या एक सरकारी अभियान से पूर्ण हो जाए। यह परिवार, मोहल्ले और समाज के स्तर पर धैर्यपूर्वक, पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाला पुनर्निर्माण है- एक ऐसा आत्ममंथन जो असुविधाजनक अवश्य है, पर जिसे टालने का विकल्प अब समाज के पास शेष नहीं बचा। दिल्ली की वह घटना एक चेतावनी है और चेतावनियों का उत्तर आक्रोश नहीं, आत्मनिरीक्षण होता है।

– सुमित गर्ग

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Tags: Civil SocietyDelhi ProtestdemocracyFamily ValuesGuru Shishya Paramparahindi vivekindian cultureIndian EducationIndian SocietyIndian ValuesparentingPolitical DiscussionRespectsocial mediaYouth Culture

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