हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

मोदी की विदेश नीति ऐतिहासिक आयामों वाली हैं। वह तो मोदी के मुकुट का चमचमाता रत्न है, जिससे पहली नजर में आंखें चौंधिया जाए। इसे अगर ठीक से राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए तो आम चुनावों पर इसका गहरा असर हो सकता है। यह भाजपा पर निर्भर है कि वह इसे अपने अन्य कार्यों के समानांतर इसका ठीक प्रकार से महिमामंडन कर पाती है या नहीं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को शपथ ग्रहण करने के बाद अपनी भूमिका से विदेश नीति में भी आम जन की रुचि जगाई तथा भाजपा को उसके बाद ज्यादातर विधान सभा चुनावों में जो सफलताएं मिलीं उनमें इसके योगदान से इन्कार नहीं किया जा सकता है। वस्तुतः लंबे समय तक एक राज्य का मुख्यमंत्री रहने के कारण प्रधानमंत्री के रूप में उनकी विदेश नीति को प्रश्नों के घेरे में खड़ा किया गया था। कहा गया था कि एक क्षेत्रीय सोच के व्यक्ति के लिए आज की जटिल अंतरर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में वैदेशिक मोर्चे पर सफलतापूर्वक काम करना कठिन होगा। उनके कार्यकाल के अंतिम दौर में यदि हम विदेश नीति का निष्पक्ष आकलन करें तो उनके मुकुट का यह ऐसा चमचमाता हुआ रत्न दिखाई देगा जिससे पहली नजर में आंखें चौंधिया जाए। निश्चय ही चुनाव में भी इसका इस रूप में असर हो सकता है।

मोदी ने अपने कार्यकाल में अब तक 57 देशों की यात्राएं की हैं। उनके नेतृत्व में विदेश मंत्रालय ने कुल 192 देशों में से 186 देशों की यात्राएं की हैं। यह अपने-आपमें रिकॉर्ड है। आज तक भारत की किसी सरकार ने इतनी संख्या में देशों तक पहुंच नहीं बनाई थी। यह भी सभव है कि जाते-जाते वे और कुछ देशों तक संपर्क करके ऐसा रिकॉर्ड बना दें जो कभी टूटे ही नहीं।

अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के सभी आठ देशों के नेताओं को बुलाकर उन्होंने पहले दिन ही साफ कर दिया कि विदेश नीति उनकी प्राथमिकता में है। शपथ ग्रहण समारोह के अगले दिन पड़ोसी देशों के आठ नेताओं से द्विपक्षीय वार्ता की कल्पना इसके पहले किसने की थी? उन्होंने पड़ोसी देशों की नीति के लिए ‘नेबर फर्स्ट’ शब्द दिया। विदेश यात्रा की शुरुआत दक्षिण एशिया से ही की। वे चार बार नेपाल, दो बार श्रीलंका, दो बार म्यान्मार, दो बार बांग्लादेश, तीन बार अफगानिस्तान और एक बार पाकिस्तान जा चुके हैं। चाहकर भी भारत विरोधी सरकार के कारण मालदीव न जा सके तो उसे परिस्थितियों को अपने अनुसार निर्मित कर पूरा कर दिया गया। ये यात्राएं केवल यात्रा करने के लिए नहीं थीं। सबके फलितार्थ हैं।

1970 के दशक से भारत पर यह आरोप हमेशा लगता रहा है कि वह अपने पड़ोसियों से संबंध ठीक नहीं रख पाता। पड़ोसियों से अच्छे संबंधों में सबसे बड़ी समस्या चीन है। वह चेकबुक कूटनीति का उपयोग कर इन देशों को यहां धन और परियोजाओं का मुंह खोल देता है जिसमें वे फंस जाते हैंं और कई बार वे भारत को आंखें दिखाने लगते हैं। पाकिस्तान को वह और भी कई तरीकों से मदद करता है। चीन ने मालदीव से लेकर श्रीलंका, भूटान और यहां तक कि नेपाल तक को हमसे दूर करने की कोशिश की और उसमें कुछ सफलताएं भी मिलीं। मोदी के नेतृत्व में भारत ने बिना चीन की मुखालफत किए अपनी कूटनीति को शांति से अंजाम दिया और उसमें अब सफलता मिल रही है। मालदीव के चुनाव में चीन समर्थित नेता मोहम्मद यमीन की पराजय तथा भारत समर्थित मोहम्मद सालिह की विजय ताजा उदाहरण है। बांग्लादेश में चीन अपने खजाना खोल चुका था। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना तक कह चुकी थीं कि हमारी नीति सभी देशों से अच्छा संबंध रखना है और चीन से हमारे संबंधों को लेकर भारत को चिंतित नहीं होना चाहिए। वही शेख हसीना आज यह निर्णय करती हैं कि देश की सबसे बड़ी परियोजनों के लिए पहले से तय 30 हजार करोड़ की राशि चीन से नहीं लेंगी। यह बदलाव यूं ही तो नहीं हुआ।

श्रीलंका में महेन्द्र राजपक्षे जब चीन के हाथों खेलने लगे तो भारत ने कई तरीके से वहां ऑपरेशन किया। इसमें प्रमुख था राजपक्षे के विरुद्ध नेताओं और समूहों को एकजुट करना। इस गठबंधन के परिणामस्वरुप राजपक्षे हारे एवं भारत के लिए अनुकूल राष्ट्रपति, फिर प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए। यह अलग बात है कि आज फिर वहां राजनीतिक संकट खड़ा हुआ है। किंतु अब किसी सूरत में श्रीलंका चीन का खिलौना नहीं बनेगा। भारत श्रीलंका को चीन के कर्ज जाल से निकालने की कोशिश कर रहा है। उसने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हंबनबटोटा बंदरगाह चीन को सौंप दिया था। मोदी की कूटनीति के परिणामस्वरुप श्रीलंका ने दोबारा समझौता किया जिसके अनुसार चीन बंदरगाह का केवल वाणिज्यिक उपयोग कर सकेगा, सामरिक नहीं।

भूटान ने तो चीन को दूतावास खोलने के लिए जमीन तक दे दी थी। मोदी की पहली यात्रा के बाद ही भूटान ने फैसला बदल दिया। भूटान की जमीन पर चीन सड़के बनाने के लिए जिस तरह अड़ा था उसमें भारत जितनी कड़ाई से पेश आया वह एक उदाहरण बन गया है। इससे दुनिया भर में संदेश गया है कि भारत अपने दोस्त देशों के लिए चीन जैसी बड़ी सैन्य महाशक्ति से भी टकराव का जोखिम मोल लेने से नहीं चूकता।

ठीक है मोदी चाहकर भी पाकिस्तान को बदल नहीं सके। कुछ लोग कहते हैं कि वे पाकिस्तान को सबक नहींं सिखा पाए। यह न भूलिए कि पाकिस्तान सार्क सम्मेलन की मेजबानी की पूरी तैयारी कर चुका था। ऐन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने यात्रा रद्द की और ऐसी कूटनीतिक रणनीति बनाई कि एक-एक देश वहां जाने मना करने लगे। कुछ समय के लिए दक्षिण एशिया में ही उसको अलग-थलग कर दिया गया। आतंकवाद संबंधी कूटनीति से भारत ने प्रमुख देशों को प्रभावित किया। अमेरिका तक ने उसकी सहायता पर रोक लगाई। अब चीन और सउदी अरब ने उसे बचाने के लिए धन दे दिया है तो उसमें कुछ नहीं कर सकते। चीन अपने निवेश से उसे आर्थिक उपनिवेश बनाने की ओर अग्रसर है और पाकिस्तान उसमें फंस रहा है।

अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति स्पष्ट दृढ़ता का अभी एक बड़ा परिणाम आया है। अमेरिका के प्रतिबंधों तथा चेतावनियों के बावजूद भारत ने रूस से हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 खरीदने का सौदा किया। अमेरिका ने ऐसा करने पर प्रतिबंधों की चेतावनी दी थी। भारत की रक्षा तैयारी योजना के लिए यह आवश्यक था और ऐसा किया गया किंतु अमेरिका ने प्रतिबंध नहीं लगाया। इसी तरह ईरान पर अमेरिका का प्रतिबंध लगने के बावजूद छः महीने तक भारत ने सात अन्य देशों की तरह तेल आयात की छूट पाई। यह सब ऐसे तो नहीं हुआ होगा। मोदी ने अमेरिकी नेताओं एवं अधिकारियों से इसके लिए संवाद चलाया। नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि अमेरिका से विरोध मोल लेकर भारत हानि में रहेगा। सबसे ज्यादा व्यापारिक लाभ भारत को अमेरिका से ही है। साथ ही सामरिक साझेदारी से आगे वह रक्षा साझेदार भी बन चुका है। विश्व पटल पर वह भारत को पूरा महत्व दे रहा है। इसलिए उसे विश्वास में लेकर ही ये कदम उठाए जाएं। भारत ने रूस से रक्षा प्रणाली खरीदने की तैयारी की बात भी अमेरिका को काफी पहले बताई तथा ईरान से तेल आयात करने की भी। अमेरिका को समझाया गया कि चीन और पाकिस्तान को देखते हुए रूसी हथियार प्रणाली हमारी मजबूती के लिए आवश्यक है। भारत कमजोर पड़ा तो यह अमेरिकी नीतियों का कमजोर पड़ना होगा। इसी तरह ईरान से तेल न मंगाने पर भारत के सामने समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। चीन तो तेल लेता ही रहेगा, हमें महंगा तेल लेना पड़ेगा। इससे अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचेगा। इस कूटनीति का परिणाम हमारे सामने है। अमेरिका से भी हमारे अच्छे रिश्ते हैं और हमारा काम भी हो गया। इससे बेहतर और सफल विदेश नीति का उदाहरण क्या हो सकता है?

मोदी की विदेश नीति ने इस धारणा को तोड़ा है कि राष्ट्रीय हितों के लिए कई बार झुक कर समझौता करना पड़ता है, अन्यथा देशों से संबंध बिगड़ जाते हैं। मोदी ने यह साबित किया है कि बिना संबंध बिगाड़े भी संवेदनशील मुद्दे पर डटे रह कर अपने हितों की पूर्ति की जा सकती है। आखिर ट्रंप जैसा व्यक्ति बार-बार बोलने के बावजूद भारतीय सामानों पर उस तरह शुल्क नहीं लगा रहा जिस तरह उसने चीनी सामानों पर लगा दिया है।

अमेरिका ने हिन्द महासागर का नेतृत्व भारत को सौंपने की घोषणा कर दी तथा भारत का ध्यान रखते हुए एशिया प्रशांत क्षेत्र की जगह हिन्द प्रशांत क्षेत्र नाम दिया। अपने सैन्य कमान का नाम भी हिन्द कमान रख दिया। क्या इसकी कल्पना पहले की गई थी? चीन के साथ भी दक्षिण चीन सागर पर मोदी सरकार का रुख कभी अस्पष्ट नहीं रहा। हम अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ युद्धाभ्यास भी करते हैं, फिर भी चीन के साथ सतह पर सामान्य संबंध बने हुए हैं। अप्रैल में चीन के राष्ट्पति शी जिनपिंग ने वुहान में मोदी को आमंत्रित कर अनौपचारिक वार्ता की। इसी तरह पुतिन ने भी मई में सुची में बुलाकर बातचीत की। यह सब मोदी के भारत के साथ द्विपक्षीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों पर संबंध बेहतर करने के लिए ही तो था। वैदेशिक मोर्चे पर एक भी अवसर नहीं आया है जहां मोदी के नेतृत्व में भारत को द्विपक्षीय-अंतरराष्ट्रीय संबंधों के निर्वहन के लिए हितों को कुछ समय के लिए हाशिये पर डालना पड़े।

पड़ोसी की तरह ही मोदी ने पूर्वी एशिया के देशों के लिए ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ शब्द दिया। यह ‘लूक ईस्ट पॉलिसी’ से आगे का कदम है। इस पूरे क्षेत्र में भारत पहले से कई गुणा ज्यादा सक्रिय है। आपसी संबंधों का ही परिणाम था कि गणतंत्र दिवस समारोह में आसियान के दसों राष्ट्राध्यक्ष मुख्य अतिथि बने। शिंजो अबे के नेतृत्व में जापान आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी तथा नागरिक संवाद के मामले में जितना निकट आया है उतना पहले कभी नहीं था। मोदी और शिंजो अबे एक दूसरे के साथ मित्रता का व्यवहार करते हैं। पश्चिमी विश्लेषकों ने मोदी की विदेश नीति को ‘मोदी डॉक्ट्रिन’ नाम दे दिया है। इस पर अध्ययन और शोध हो रहे हैं।

मोदी को लेकर सबसे ज्यादा आशंकाएं मुस्लिम देशों के संदर्भ में उठाई जा रही थीं। नेताओं, बुद्धिजीवियों तथा मीडिया के एक वर्ग ने मोदी की छवि मुसलमानों के दुश्मन की बनाई थी। आप देख लीजिए, सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से लेकर ईरान, अफगानिस्तान, कतर, ओमान, जोर्डन, बु्रनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीस्तीन, बांग्लादेश, मध्य एशियाई देश, अफ्रिकी देश सब जगह मोदी का अभूतपूर्व स्वागत हुआ और सबने अच्छे संबंध बनाए रखे हैं। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा अफगानिस्तान ने तो अपने-अपने यहां सबसे ब़ड़ा नागरिक सम्मान मोदी को दिया। संयुक्त अरब अमीरात ने वहां रहने वाले भारतवंशी हिन्दुओं के लिए मोदी के आग्रह पर मंदिर बनाने के लिए जमीन तक दी जहां निर्माण हो रहा है। प्रोटोकॉल तोड़कर नेता उनके स्वागत के लिए आए। पूरी निर्भयता से मोदी ने इजरायल की यात्रा की, वहां के प्रधानमंत्री को बुलाकर उनकी मेजबानी की तो उसी साहस से वे फलस्तीन भी गए। मजे की बात देखिए कि फलस्तीन जाने के लिए जहाज जॉर्डन के शाह ने दिया तो इजरायल के जहाज उनकी सुरक्षा कर रहे थे। यह अभूतपूर्व दृश्य था। इस तरह मोदी के वैश्विक करिश्मे को स्वीकार करना ही होगा। यह उनके प्रधानमंत्री बनने के पूर्व अकल्पनीय था।

मोदी ने विदेश नीति पर जो दूसरी छाप छोड़ी, वह है सम्पूर्ण विश्व में फैले भारतवंशियों के अंदर स्वाभिमान पैदा करना तथा अपने मूल देश के प्रति संवेदशील बनाना। पहले भी नेता विदेश दौरों में भारतीयों या भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते थे। मोदी ने इसका वर्णक्रम बदल दिया। इसे बड़े इवेंट का रूप दिया गया तथा विदेश यात्रा का स्थायी कार्यक्रम बना दिया गया। इसका प्रभाव इतना हुआ कि प्रवासियों के अनेक कार्यक्रमों में वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक शिरकत करने लगे। इससे पहली बार दुनिया भर में फैले भारतवंशियों की चेतना झंकृत हुई, वे भारत से सीधे जुड़ा महसूस करने लगे और जैसा मोदी कहते थे आप सब भारत का एम्बेसडर बनकर काम करें। वैसे देखा जाए तो विदेश नीति में मोदी का एक बड़ा योगदान भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं अध्यात्म के प्रति गौरवबोध कराना है। इन सबका प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता लेकिन इसका जो मनोवैज्ञानिक असर सत्ता एवं समाज पर पड़ता है उसका व्यापक दूरगामी असर होता है। आप सोचिए, बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं के अंदर इससे कितना आत्मविश्वास पैदा हुआ होगा। वर्षों से उपेक्षित और दमित समुदाय के अंदर आत्मविश्वास पैदा करने के ऐसे कदम विदेश नीति में काफी मायने रखते हैं। इसका देश के अंदर भी त्वरित असर होता है। आम लोग मोदी की वाहवाही करते देखे गए। अपनी छवि के कारण नेता ऐसा साहस नहीं कर पाते। मोदी ने अध्यात्म एवं संस्कृति को विदेश नीति के एक कारगर अस्त्र रूप में उपयोग किया है। उदाहरण के लिए बौद्ध कूटनीति उनकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण अंग बन गया है। श्रीलंका से आरंभ यह कूटनीति मंगोलिया, म्यान्मार, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम जैसे देशों तक विस्तारित हुई। महात्मा बुद्ध की ज्ञान भूमि, कर्मभूमि एवं निर्वाण भूमि तो भारत ही है। धर्म के आधार पर भावनात्मक रूप से जोड़ने की कूटनीति का मोदी ने बखूबी इस्तेमाल किया।

नेपाल में चीन के समानांतर भारत भी आर्थिक सहायता कर रहा है, अनेक परियोजनाओं पर काम हो रहा है, रेलवे और सड़क मार्ग का विस्तार भी भारत कर रहा है किंतु अंतिम अस्त्र के रूप में धार्मिक कूटनीति का प्रयोग मोदी ने किया। पिछली द्विपक्षीय यात्रा के दौरान वे जनकपुर गए, वहां पूजा अर्चना की, मंदिर के भीतर भी लोगों को संबोधित किया तथा बाहर एक बड़ी सभा के समक्ष भाषण दिया। इनमें दोनों देशों के बीच अनादिकाल से अविच्छिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक संबंधों की याद दिलाई। वहां के विकास के लिए कई घोषणाएं कीं। उसके बाद मुक्तिधाम गए। वहां पूजा अर्चना की तथा बाद में पहले की तरह पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा। राम सर्किट रेल चलाकर एक साथ भारत नेपाल, श्रीलंका के लोगों को सांस्कृतिक रूप से साथ लाने की कोशिश की गई है।

इस तरह मोदी की विदेश नीति ऐतिहासिक आयामों वाली हैं। इनको अगर ठीक से राजनीतिक मुद्दा बनाया जाए तो आम चुनावों पर इसका गहरा असर हो सकता है। यह भाजपा पर निर्भर है कि वह इसे अपने अन्य कार्यों के समानांतर इसका ठीक प्रकार से महिमामंडन कर पाती है या नहीं।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu
%d bloggers like this: