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ऐसा लग रहा है कि स्वाधीनता के ६९ वर्ष बाद भारत के इतिहास में वास्तविक अर्थ में आर्थिक सुधारों और क्रांति का पर्व आरंभ हो चुका है। इसकी साक्ष्य है मोदी सरकार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम। ५०० और १००० रु. के नोटों का निर्मौद्रिकरण कर के उन्हें रद्द कर देना। समस्त भारतीयों के जीवन पर दूरगामी परिणाम करने वाला यह निर्णय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ८ नवम्बर को घोषित किया। देश की अर्थव्यवस्था में इन नोटों का प्रतिशत लगभग ८२ है। उन्हें एक झटके में रद्द कर मोदीजी ने काले धन पर सीधे मानो ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ही किया है। इसके पूर्व पाकिस्तान पर किए गए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से सीमा पार दुश्मन को चोट पहुंची थी, लेकिन ८ नवम्बर के ‘स्ट्राइक’ से काला धन जमा करने वाले संग्रहखोरों को प्रहार हुआ है। इन बड़े नोटों को रातोंरात रद्द करने के एक निर्णय के जरिए मोदीजी ने एक तीर से तीन शिकार किए हैं- काले धन, आतंकवाद और भ्रष्टाचार पर अंकुश। इसी कारण इस निर्णय के बाद देश की गरीब जनता से लेकर अर्थविदों तक सभी ने इस निर्णय का स्वागत ही किया है।

भारत में सभी स्तरों पर हो रहे भ्रष्टाचार से जनता ऊब चुकी है। इस निर्णय से भारतीय तरुणाई तो बहुत खुश है। पिछले कुछ वर्षों में देश भर में काले धन की समांतर अर्थव्यवस्था निर्माण हुई है। ‘टैक्स हेवन’ माने जाने वाले देशों और स्विस बैंकों में भारतीय धनाढ्यों का अपरिमित काला धन जमा है। इस बारे में तरह-तरह के अनुमान व्यक्त किए जाते हैं। यही धन विभिन्न माध्यमों से पुनः भारत में आता है। इसमें से काफी धन अपराधी दुनिया से जुड़ा है तथा इसी काले धन से आतंकवाद की ‘अर्थव्यवस्था’ चलती है। काले धन पर नियंत्रण लगने के बजाय यही धन भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना चाहता था। अतः कठोर उपायों की आवश्यकता थी। अब यही देखिए कि ५०० और १००० रु. के नोट बंद होने के बाद से कश्मीर में फौजियों पर होने वाली पत्थरबाजी अचानक रुक गई। कश्मीरी युवकों को अचानक क्या कोई साक्षात्कार हो गया है? जवाब यह है कि ऐसा कुछ नहीं है; बल्कि बिदागी के रूप में मिलने वाले नोट अब बंद हो गए हैं। भारत में आंतरिक आतंकवाद के बारे में भी ऐसा ही है। काले धन की आपूर्ति रुकी और आतंकवाद भी रुक जाएगा। मोदीजी के इस निर्भीक निर्णय का एक मुख्य पहलू है देश की अर्थव्यवस्था की मुद्रा का कवच मजबूत व सुरक्षित बनाना तथा सीमा पार से अघोषित युद्ध जारी रखने वाले आतंकवादी तत्वों को दुर्बल बनाना। नकली मुद्रा आर्थिक एवं वित्तीय मोर्चे पर एक अचूक अस्त्र माना जाता है। इस अस्त्र को नाकाम बनाने का मोदी सरकार ने जो जबरदस्त व साहसी निर्णय किया है वह स्वागतार्ह ही है।

हर चुनाव में लोगों को आकर्षित करने के लिए स्विस बैंकों में रखा काला धन, विदेशों में रखा काला धन हमेशा गहमागहम चर्चा का विषय हुआ करता था। लेकिन उससे कोई फल नहीं निकलता। इसके बजाय भारतीय अर्थव्यवस्था में छिपे काले धन, करवंचना के लिए चालाकी से किए गए उसके उपयोग को लक्ष्य कर आघात करना बहुत आवश्यक था। इस निर्णय से देश के भीतर मौजूद समानांतर भ्रष्ट अर्थव्यवस्था ध्वस्त करने में मदद मिलेगी। भारतीय राजनीति एवं समाजनीति में जो कोई बेवकूफाना कल्पनाएं हैं, उनमें से स्विस बैंकों में काला धन यह भी एक कल्पना है।

पूर्व प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अर्थविद् थे। उनके जैसा अर्थविद् इन बातों को नहीं जानता था ऐसा नहीं है। लेकिन वे इस तरह की राजनीतिक हिम्मत और माद्दा रखने थे ऐसा दिखाई नहीं देता। उन्होंने इस बात को कभी सोचा ही नहीं कि देश में आर्थिक मामलों में कहां चूक हो रही है और उसमें किस तरह सुधार किया जाए। इस पृष्ठभूमि में एक दृढ़प्रतिज्ञ सरकार के रूप में ठोस निर्णय कर मोदी सरकार ने जो अतुल्य साहस दिखाया है, उसके सकारात्मक परिणाम भविष्य में अवश्य दिखाई देंगे ही। घर-घर में थोक में पड़े करोड़ों रु. के बड़े नोट बैंकों में जमा हो रहे हैं। इससे बैंकों में जमा धन में वृद्धि होगी। इसका एक अर्थ यह है कि विशुद्ध पैसा बढ़ेगा। जो पैसा पड़ा था वह लोगों को कर्ज के रूप में उपलब्ध होगा। यह पैसा प्रसार में रहना अर्थात लेनदेन में आना अत्यंत आवश्यक था। अतः इस विशुद्ध धन को हमारे लेनदेन में प्रवाही करने के लिए सरकार ने जो प्रयास किए गए हैं उससे भारत पर विदेशी कर्ज तो चुकता किया ही जाएगा, प्रत्येक भारतीय खुशहाल भी होगा।

यह सत्य है कि अचानक लिए गए इस निर्णय के कारण आम जनता को परेशानी उठानी पड रही है; हालांकि अधिकांश जनता की यह राय है कि देशहित के लिए यह निर्णय आवश्यक था। परंतु हमेशा एक दूसरे के विरोध में खडी रहने वाली राजनैतिक पार्टियां इस मुद्दे पर मोदी विरोध का नारा लगाते हुए एकजुट हो गई हैं। ये राजनेता मोदी के निर्णय का विरोध कर रहे हैं पर सामान्य जनता उनके इस विरोध का साथ नहीं दे रही है। इसका कारण है कि पिछले कई सालों से भारतीय जनता के मन में काला धन और भ्रष्टाचार को लेकर जो आक्रोश था उसे मोदी ने पहचाना। जो पिछले ६९ सालों में नहीं हो सका उसे करने का साहस मोदी कर सके।

लोकसभा चुनाव के दौरान काला धन खत्म करने का आश्वासन देने वाले नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधान मंत्री के रूप में किया गया यह ईमानदार प्रयास दिखाई देता है। इसके पूर्व अघोषित आय को घोषित करने की रियायत वे दे ही चुके हैं और इसके बावजूद भी जिन्होंने अपना काला धन छिपाने का प्रयास किया उन्हें जबरदस्त झटका देना भी जरूरी था। मोदीजी काले धन पर स्विस बैंक का केवल झुनझुना बजाते नहीं रहे, अपितु उस पर सीधे प्रहार करने वाला कदम उठाया। ६९ वर्षों से सरकारें आती रहीं, जाती रहीं; लेकिन किसी ने काले धन के खिलाफ इस तरह कोई प्रहारात्मक कठोर कदम उठाया हो यह दिखाई नहीं देता। स्वच्छ भारत अपना सपना है। इसी तरह ‘स्वच्छ आर्थिक भारत’ की दिशा में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाया गया यह सशक्त कदम आर्थिक विकृति पर अंकुश लगाने में बेहद उपयोगी सिद्ध होगा… क्योंकि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? इस प्रश्न का उत्तर खोजते ही रहने में क्या तुक है?

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